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सर्दियों में बैंक की लाइन में एक लड़की पर एक बुज़ुर्ग आदमी ने फब्तियां कसनी शुरू कर दीं। लड़की ने जींस और जैकेट डाल रखी थी। उस लड़की के विरोध जताने पर आसपास के लोग उसे ही संस्कार का पाठ पढ़ाकर चुप रहने की हिदाहत देते नजर आए। हाल ही में उत्तर प्रदेश में एक लड़की को केवल इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि वह अपनी पंसद के कपड़े जींस पहनना चुनती है। लड़की को उसके ही दादा और चाचा ने पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि उसने उनकी पंसद के कपड़े पहनने से इनकार कर दिया था। यह आज के भारत की हकीकत है। लड़की को सिर्फ उसके कपड़ों की पंसद के कारण मार दिया गया। एक इंसान को अपनी पंसद के कपड़े पहनने के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी। आपको वाक्य का दोहराव लग रहा होगा, लेकिन आप सोचकर देखिए महज कपड़ों के कारण लड़की को उसके ही परिवारवालों ने मार गिराया।

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के गांव संवरेजी खर्ग में 17 साल की नेहा पासवान अब इस दुनिया में नहीं रही। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक छुट्टियों में लुधियाना से अपने गांव आई हुई नेहा ने कभी नहीं सोचा होगा कि उसके ही घर वाले उसे सिर्फ इसलिए मार डालेंगे क्योंकि उसने जींस पहनना चुना है। शहर की तरह गांव में भी जींस पहने पर दादा और चाचा की बात न मानने के बाद उसे इतनी बुरी तरह पीटा कि उसकी मौत हो गई। मौत पर अफसोस न होने के बाद परिवारजनों ने उसकी लाश को नदी में फेंक दिया। उसकी लाश नदी में न गिरकर पुल के सरियों पर लटकी हुई मिली तो पूरी घटना सामने आई। लड़की की मां और भाई ने परिवारवालों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी है। भारतीय न्याय व्यवस्था से शायद उसे न्याय भी मिल जाएगा लेकिन फैसले में क्या यह लिखा जाएगा कि जींस पहनना अपराध नहीं है।

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पता नहीं कितनी लड़कियां हैं, जिन्हें कभी जींस पहनने पर तो कभी प्यार करने पर, खुद की पंसद से दूसरी जाति, धर्म में शादी करने पर मौत के घाट उतार दिया गया। यहां मारने वाला कोई और नहीं लड़की के ही परिवार वाले सगे माता-पिता, भाई, चाचा, ताऊ होते हैं, जो उसे एक दिन उसकी पंसद की वजह से उसे अपने ही हाथों से मार देते हैं। भारतीय समाज पितृसत्ता और जातिवादी सोच से ग्रसित समाज है। यह सोच महिला और लड़कियों पर पुरुष के वर्चस्व को स्थापित करते पर बल देती है। संस्कार की नीतियों में जकड़कर छोटी लड़कियों से लेकर वयस्क महिलाओं पर शासन किया जाता है। धर्म और रीति-रिवाज के नाम पर महिलाओं की हर चीज को नियंत्रित किया जाता है। वैसे तो लड़कियां या महिलाएं निजी तौर पर अपना कुछ भी करें, वे पितृसत्ता का सामना हर चीज़ में करती हैं। उनके पहनावे को ही लेकर उन पर तमाम तरह की पांबदियां और बयानबाजी की जाती है। आम हो या खास हर वर्ग के पुरुष इस तरह की बात करते नजर आ जाते हैं। आए दिन कोई न कोई नेता ऊंचे मंचों से जनसभा को संबोधित करते हुए महिला के पहनावे पर गर्व से बयान देता है। अपने ही घर और गली-मोहल्ले में लड़कियों के कपड़ों पर बवाल मचा दिया जाता है। चरित्र के प्रमाणपत्र एक लड़की को सिर्फ उसके कपड़ो की पसंद पर जारी कर दिए जाते हैं। ‘बेशर्म, लूज करैक्टर, बॉडी शेमिंग’ की बातें लड़कियों को उनके कपड़ो की पंसद के कारण सुनने को मिलती हैं।

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पता नहीं कितनी लड़कियां हैं, जिन्हें कभी जींस पहनने पर तो कभी प्यार करने पर, खुद की पंसद से शादी करने न करने पर मौत के घाट उतार दिया गया। यहां मारने वाला कोई और नहीं लड़की के ही परिवार वाले सगे माता-पिता, भाई, चाचा, ताऊ होते हैं, जो उसे एक दिन उसकी पंसद की वजह से उसे अपने ही हाथों से मार देते हैं।

‘इज्ज़त’ के नाम पर भारत में लड़कियों को मामूली सी बात पर मार दिया साधारण सी बात हो गई है। घर की तथाकथित ‘इज्ज़त’ का सारा बोझ महिलाओं पर लादकर पुरुष का वास्ता इसमें केवल महिला पर नज़र रखना होता है। केवर एक ना कहने पर महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। बात जब पहनावे की हो रही है तो चाहे पुरुष हो या महिला हर किसी को अपनी पंसद और सहजता के अनुसार अपने कपड़े चुनने का अधिकार है। लेकिन हमारे देश की सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था इसके इतर है। एक पुरुष ने शायद ही कभी अपने कपड़ों की वजह से इस तरह के व्यवहार का सामना किया होगा जैसा एक महिला को करना पड़ता है। छोटी-छोटी बच्चियों से लेकर एक वृद्ध महिला तक को उस पहनावे को अपनाना पड़ता है जो उनकी गतिविधियों को सीमित करता है। एक वक्त के बाद लड़कियों को सीना ढककर चलना होता है, ब्रा का स्ट्रैप दिखना गुनाह हो जाता है, जींस पहने वाली लड़कियां बुरी लड़कियां होती हैं, छोटे कपड़े पहनकर वह बाहर क्यों निकली थी, सारी परेशानी का कारण ही यही हैं।

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ऐसी तमाम सलाहें हैं जिनमें महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा को उनके कपड़ों से जोड़कर आरोप उन पर ही लगा दिए जाते हैं। किसी एक बयान की बात करनी भी यहां बेमानी होगी। राजनीतिक, प्रशासनिक या अन्य बड़े ओहदे पर बैठे लोग महिलाओं के कपड़ों को ही उनके खिलाफ होने वाली हिंसा के लिए ज़िम्मेदार बता देते हैं। घर हो या बाहर, अपने हो या पराये हर वह इंसान जो महिलाओं को एक जागीर समझता है वह उनकी इच्छाओं और आज़ादी को खत्म करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है। महज़ कपड़ों के ही आधार पर महिलाएं लैंगिक भेदभाव का सामना करती हैं। दुनिया में भारत वह देश हैं जिसकी स्थिति लैंगिक भेदभाव में लगातार नीचे गिर रही है। यहां महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। नेशनल क्राइम ब्यूरो 2019 के आंकड़ो के अनुसार कुल 32,260 केस बलात्कार के दर्ज हुए थे। उत्तर-प्रदेश में सबसे ज्यादा 3131 केस दर्ज हुए थे।

भारतीय समाज पितृसत्ता और जातिवादी सोच से ग्रसित समाज है। यह सोच महिला और लड़कियों पर पुरुष के वर्चस्व को स्थापित करते पर बल देती है। संस्कार की नीतियों में जकड़कर छोटी लड़कियों से लेकर व्यस्क महिलाओं पर शासन किया जाता है।

एनसीआरबी-2019 के ही आंकड़ों के अनुसार 94 फ़ीसद बलात्कार के अपराध में महिला के जानने वाले में से कोई एक शामिल होता है। हर साल कितनी लड़कियों को ऑनर किलिंग के चलते अपनी जान गंवानी पड़ती है। इन जानों में नेहा पासवान जैसी लड़कियां होती है जिनको उनके कपड़ो की पंसद जैसी मामूली सी बात पर उसके परिवार वाले मार देते हैं। खुद की पंसद से पढ़ना, काम करना, शादी या प्यार करना भी इन हत्याओं के कारण होते हैं। हिंदी पट्टी खासकर उत्तर-प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के कई इलाकों में खाप पंचायतें अक्सर महिलाओं के कपड़ों पर पाबंदी लगाती नजर आती हैं। यही नहीं उत्तर प्रदेश में तो बकायदा ‘एंटी- रोमियो स्क्वैड‘ बनाया गया ताकि प्यार करने करने वाले युवक-युवतियों पर नज़र रखी जा सके, उन्हें सरेआम पीटा जा सके। यह सब उस बर्बरता को दर्शाता है जो हमारे समाज में एक महिला की ‘पसंद’ के लिए किए जाते हैं।   

सवाल यह है कि कब तक मान-मर्यादा, जी-हजू़री की गिरफ्त में एक महिला को बांधा जाता रहेगा। ऐसी एक व्यवस्था कब बनेगी जहां पर वह अपनी समझ से रह सके, कह सके और जी सके। समाज में कब तक पुरुष उस पर तथाकथि मर्यादाएं और इच्छाएं थोपता रहेगा। आज़ाद भारत में महिलाएं कब जा कर इस जिम्मेदारियों से आज़ाद हो सकेंगी। महज खुद की पंसद के कपड़े पहने के कारण महिलाएं देश में अपनी जान गंवा रही हैं। पहनावे की ऐसी बाध्यता क्यों उन पर थोपी जा रही है जो उनको पीछे धकेल रही है, उनके आत्मविश्वास को कमज़ोर कर रही है। महिला के पहनावे को क्यों अस्मिता से जोड़ा जा रहा है। यहां जितने एक पुरुष के पास अधिकार है उतने ही एक स्त्री के पास भी अधिकार है फिर क्यों उसे उसकी ‘फ्रीडम ऑफ च्वाइस’ से रोका जा रहा है और कब तक?

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तस्वीर साभार : The New Indian Express

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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