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एक औरत न तो जन्म लेने से पहले सुरक्षित होती है और न ही जन्म लेने के बाद। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब सुबह अख़बार पढ़ते वक्त देश के कोने- कोने से आई रेप की खबरों से हम रूबरू नहीं होते। खबरों में अपराध वही रहते हैं बस बदलता है तो आरोपी और सर्वाइवर का नाम। देश में यौन शोषण इतना व्यापक हो चुका है कि अब इसे सामान्य खबर मानकर नज़रअंदाज कर दिया जाता है। सबसे वीभत्स केस ही लोगों के अंतर्मन को कचोट पाते हैं लेकिन वे भी कुछ दिन बाद बुकमार्क बनकर रह जाते हैं और अक्सर भुला दिए जाते हैं। महिलाओं के साथ रेप अब लोगों के लिए बदला लेने का, अपना दबदबा कायम करने का उपकरण बन चुका है। अपनी धौंस जमाने के लिए दलित और पिछड़ी जातियों को आतंकित करने की बात हो या फिर शासक वर्ग का सत्ता में रहने के लिए लैंगिक हिंसा का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल। वजह चाहे जो भी होती हो, निशाना औरत की देह को ही बनाया जाता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2019 में हर दिन रेप के 87 मामले सामने आए। ये मामले सिर्फ सरकारी आंकड़ों की कहानी कहते हैं, ज्यादातर रेप के केस ऐसे हैं जिनमें एफआईआर तक दर्ज नहीं हो पाती हैं।

इन्हीं सब मुद्दों पर प्रकाश डालती है, पत्रकार प्रियंका दुबे की किताब, ‘नो नेशन फॉर वुमेन’। प्रिंयका दुबे अपनी किताब में भारत की सर्वसामान्य त्रासदी ‘रेप’ की सच्ची घटनाओं को विस्तृत रूप में पेश करती हैं। किताब में देश के अलग- अलग हिस्सों से यौन शोषण की कहानियां हैं जिनको प्रियंका दुबे ने एक रिपोर्टर के तौर पर कवर किया था। नो नेशन फॉर वूमेन में दी हुई कुछ घटनाएं तो जानी-पहचानी हैं, जो देश के हर अख़बार और टेलीविजन पर दिखाई गई थीं। इनमें से बदायूं में दो बहनों के साथ हुआ गैंगरेप और भगाना रेप केस खासे चर्चित रहे थे। वहीं, कुछ ऐसी कहानियां ऐसे इलाकों की भी हैं जहां तक नेशनल मीडिया कभी पहुंचा ही नहीं। अपनी किताब में प्रियंका घटना के बाद की कहानियों को भी हमारे सामने लाती हैं कि कैसे रेप की सर्वाइवर महिला या उसके परिवारवालों की कोर्ट- कचहरी के चक्कर लगाते हुए चप्पलें घिस जाती हैं लेकिन न्याय नहीं मिलता है। कभी तारीख आगे बढ़ा दी जाती हैं तो कभी जज बदल जाते हैं। किताब में कई जगहों पर आप रेप को लेकर समाज की दकियानूसी सोच और महिलाओं की स्थिति पर मंथन करने को मजबूर होते हैं। 

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किताब की शुरुआत होती है बुंदेलखंड से जिसे प्रियंका ‘नो वीमन्स लैंड’ कहकर संबोधित करती हैं। वह लिखती हैं कि कैसे शादी से इनकार करने पर रोहिणी के साथ रेप किया गया और उसे जिंदा जला दिया गया। वहीं, कामायनी जो हाई स्कूल जाने वाली चुनिंदा लड़कियों में से एक थी, जिसे उसके पिता अपने पैरों पर खड़े होते  देखना चाहते थे, गांव के ही किसी व्यक्ति ने उसके साथ रेप किया और जब कामायनी ने इसकी रिपोर्ट पुलिस को की तो उसे अगले दिन जिंदा जला दिया गया। इसके अलावा त्रिपुरा में महिलाओं के राजनीतिक झुकाव होने की वजह से हुए रेप, मध्यप्रदेश में आदिवासी समुदाय को उनकी औकात दिखाने के लिए किए गए रेप, कस्टडी रेप, बच्चियों के साथ यौन हिंसा, जाति संबंधित रेप, लड़कियों की तस्करी और भारतीय पुलिस में गहरे से पैठ जमाया लैंगिक भेदभाव, इन सभी की कहानियां बयां करती है नो नेशन फॉर वूमेन। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सत्ता के खेल में भी सबसे पहले पीड़ित महिलाऐं और बच्चे ही होते हैं। प्रियंका त्रिपुरा की उन महिलाओं की आपबीती कहती हैं जिन्होंने चुनाव में खड़े होने का साहस किया और प्रतिद्वंदी राजनेताओं ने उनके साथ रेप किया। मीनाक्षी जिसका इस आधार पर रेप किया गया कि उसने लेफ्ट छोड़कर बीजेपी में शामिल होने का साहस किया। 

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प्रियंका दुबे भारतीय महिला पुलिस बल के साथ हो रहे भेदभाव की बात भी करती हैं। जैसे- महिला पुलिसकर्मियों को उचित प्रशिक्षण का न मिलना, महिला शौचालयों की कमी, पुरुष पुलिसकर्मियों की तुलना में दोगुनी मेहनत। यदि महिलाएं इस प्रोफेशन में आगे बढ़ने का प्रयास करती हैं तो उन्हें दस गुना अधिक दुर्व्यवहार और लिंगवाद का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही प्रिंयका अपनी किताब में आंतरिक स्त्रीद्वेष यानी इंटरनलाइज्ड मिसोजिनी के बारे में भी बताती हैं कि कैसे महिला पुलिसकर्मी भी सहकर्मियों के बीच अपनी साख बनाने के लिए पितृसत्ता में जकड़ी हुई हैं और लैंगिक भेदभाव का परिचय देती हैं। वे कॉलेज जाने वाली लड़कियों को ‘फैशनेबल’  कपड़े पहनने और मेकअप करने की वजह से गिरफ्तार कर लेती हैं। यह आत्मघाती सोच अपने आसपास के माहौल को देखते हुए महिलाओं में इतनी घर कर जाती है कि वे अन्य स्त्रियों के व्यवहार को पितृसत्ता के सिद्धांतों के पैमाने पर रखकर सही- गलत की परिभाषा गढ़ती हैं। 

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रेप के बाद सर्वाइवर को क्या–क्या सहना पड़ता है, उसकी भी बात करती है यह किताब। किसी महिला के साथ यौन हिंसा होने पर समाज में सबसे पहले उसी की गलती ढूंढ़ी जाती है। सर्वाइऴर के परिजनों को समाज के ताने सुनने पड़ते हैं। अपराधी कोई और होता है और सज़ा उल्टे सर्वाइवर को भुगतनी पड़ती है। किताब में एक रेप सर्वाइवर बच्ची की मां की कही इस मानसिक प्रताड़ना को सही से व्यक्त करती हैं, “आरोपी ने मेरी बेटी को चॉकलेट और चिप्स का लालच देकर अपने बेसमेंट रूम में बुलाया। वह एक बच्ची है। उसने उन पर भरोसा किया इसलिए वह अंदर चली गई। लेकिन कुछ पड़ोसी कहते हैं कि हमने अपने बच्चों की अच्छी देखभाल नहीं की और मेरी बेटी लालची थी। हम इन तानों से इतना परेशान हो चुके थे कि हमें वह इलाका छोड़ना पड़ा।” इसके अलावा कई मामलों में तो सर्वाइवर्स को अपने ही परिवारों से दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए किताब के इस अंश को पढ़ें, “चार साल बीत चुके हैं। लेकिन जब भी मेरे पति को सड़क किनारे सस्ती शराब खरीदने के लिए कुछ पैसे मिलते हैं, तो वह नशे में धुत हो जाता है और फिर वह गुस्सा करता है और चिल्लाता है। वह कहता है कि मेरे साथ गैंगरेप किया गया और फिर इसी बात पर मारपीट करता है। मुझे पता है कि वह उन लोगों का कुछ नहीं कर सकता जिन्होंने उस रात मेरे साथ बलात्कार किया लेकिन वह मुझ पर बहुत गुस्सा करता है। ऐसे में उसके लिए सबसे आसान काम है मुझे पीटना। इसलिए वह मुझे गालियां देता है और पीटता है।”

प्रियंका दुबे सवाल करती हैं कि इज्ज़त किसी इंसान की जिंदगी से बढ़कर कैसे हो सकती है? किसने ये नियम बनाए? पुरुषों ने ये नियम बनाए हैं? परिवार की इज्ज़त एक महिला की योनि में रखने के नियम? मैं कहना चाहती हूं कि एक महिला उसकी योनि से कहीं ज्यादा है।

प्रिंयका लिखती हैं कि एक अकेली मां कैसे अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए लड़ती है। ज़ोया की मां राबिया पर केस वापिस लेने के लिए चारों तरफ से दबाब डाला जाता है, उसके साथ बुरा बर्ताव किया जाता है लेकिन राबिया पीछे नहीं हटती है। जब घर का कोई मर्द ज़ोया को न्याय दिलाने के लिए खड़ा नहीं होता है, तब राबिया अकेले खड़े होने की हिम्मत करती है। अपनी बेटी ज़ोया के साथ हुई ज्यादती और हत्या ने रबिया को अपने पैरों में बंधी पितृसत्ता की बेड़ियों को देखने की हिम्मत दी। जब प्रियंका से बातचीत में राबिया का पति शिकायत करता है कि लड़की का केस लड़ने का मतलब ये तो नहीं कि बाहर गैर लोगों से मिलती रहो और घर और बच्चों को छोड़ दो तो इसके जवाब में राबिया कहती है कि जब औरत आवाज़ उठाती है तो आदमी उसको दबाता है क्योंकि उसका मकसद औरत के न्याय के लिए लड़ना नहीं है। वह सिर्फ उसे घर पर बांधकर रखना चाहता है। इनको मेरी हर बात से दिक्कत है। अपनी बेटी के लिए मैं नहीं लड़ूंगी तो कौन लड़ेगा और वहीं कैसे बेटी के साथ हुई यौन हिंसा की खबर मिलते ही एक पिता के सबसे पहले शब्द होते हैं,  ‘वे ले कैसे गए लड़की को? हम मार डालेंगे तुमको वापस आकर।” वह इस सबके लिए लड़की की मां को जिम्मेदार ठहराता है। 

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प्रियंका दुबे लिखती हैं कि कैसे एक पिता अपनी बेटी के साथ हुए अपराध को अपनी इज्ज़त के साथ जोड़कर देखता है और जीते जी यह सहन नहीं कर पाता है। इस पर प्रियंका दुबे सवाल करती हैं कि इज्ज़त किसी इंसान की जिंदगी से बढ़कर कैसे हो सकती है? किसने ये नियम बनाए? पुरुषों ने ये नियम बनाए हैं? परिवार की इज्ज़त एक महिला की योनि में रखने के नियम? मैं कहना चाहती हूं कि एक महिला उसकी योनि से कहीं ज्यादा है। रेप के साथ जुड़ी तथाकथित इज्जत के कारण देश में, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में अभी भी अनेक पिता मरते हैं और लड़कियां खुद को उनकी मौत की वजह मानती हैं और अपनी मौत की कामना करती हैं। प्रिंयका अपनी किताब में रेप के दौरान सर्वाइवर की प्रतिक्रिया को लेकर लोगों की सोच के बारे में भी सवाल करती हैं। मामले की जांच करने वालों के मुताबिक रेप के दौरान अगर कोई महिला रो रही है, चीख रही है, चिल्ला रही है तो मतलब उसके साथ गलत हुआ है, अन्यथा जो उसके साथ हुआ है, वह रेप है ही नहीं। जैसा कि पुलिस कांस्टेबल नीतू के केस में असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर रामेश्वर सिंह प्रियंका से कहते हैं, “घटना के बाद वो सबसे पहले हमारे पास क्यों नहीं आई। रेप होने के बाद वह घर पर जाकर आराम कैसे कर सकती है। हमने केस दर्ज किया, उसका मेडिकल टेस्ट करवाया लेकिन लगता है कि उसकी न्याय पाने में कोई दिलचस्पी ही नहीं है। जब उसका रेप हो रहा था तो उसने विरोध तक नहीं किया। यहां हर कोई जानता है कि उसके कितने सारे अफेयर चल रहे थे। मैं आपको गिना भी सकता हूं।”

इसके जवाब में प्रियंका नीतू का पक्ष सामने रखती हैं। नीतू कहती हैं, “मैं पहले ही अपने पति को एक झगड़े में खो चुकी हूं। उस दिन मेरी बहन की हत्या कर दी गई थी। हमारे परिवार ने बहुत अधिक हिंसा देखी है। इसलिए जब उन्होंने मुझे गाड़ी से खींचकर बाहर निकाला, तो मैं चुपचाप उनके साथ चली गई। जो लोग सवाल करते हैं कि मैंने विरोध क्यों नहीं किया, मैं उनसे पूछती हूं कि क्या वे मेरे बच्चों को खिलाने आते अगर उन लोगों ने मुझे मार डाला होता? मैं विरोध करने की हालत में नहीं थी। मैंने विरोध करने के लिए जीवन में बहुत कुछ खो दिया है। मैं जीना चाहती थी क्योंकि घर पर बच्चे मेरा इंतजार कर रहे थे।” वह अपनी किताब में मानव तस्करी से पीड़ित लड़कियों के बारे में भी लिखती हैं। बता दें कि मानव तस्करी के अपराधों में सबसे ज्यादा पीड़ित महिलाऐं और छोटी बच्चियां ही होती हैं। मध्यप्रदेश की काजरी, सावनी और सुगंधी के केस की रिपोर्टिंग करते वक्त प्रियंका महसूस करती हैं कि आदिवासी समुदाय के लोग अपनी तथाकथित इज्ज़त के बजाय अपने बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में ज्यादा फिक्र करते हैं। वह कहती हैं कि काश शहरी लोग भी इन लोगों से कुछ बातें सीख पाते। 

किताब के अंत में प्रियंका रेप पीड़िताओं के पुनर्वास के महत्व पर जोर देती हैं क्योंकि भारत में रेप ही एक ऐसा अपराध है जिसमें सर्वाइवर को दोषी ठहराया जाता है। यह समाज एक रेप पीड़िता के साथ अपराधी से भी बुरा बर्ताव करता है। उसके साथ बातचीत बंद कर दी जाती है, उसे अजीब सी नजरों से देखा जाता है, ताने मारे जाते हैं और घर में ही कैद रहने को मजबूर कर दिया जाता है। पुनर्वास की नीतियों से भारतीय महिला में यह विश्वास जागेगा कि रेप के बाद भी महिला का जीवन होता है। इससे महिलाएं अपने साथ हुई हिंसा के खिलाफ खड़े होने का साहस कर सकेंगी। 

लेखिका के बारे में, बता दें कि प्रियंका दुबे भोपाल से हैं, रहती दिल्ली में हैं। सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों पर की गई उनकी इंवेस्टिगेटिंग रिपोर्टिंग ने कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं, जिनमें नाइट इंटरनेशनल जर्नलिज्म अवार्ड,  इंटरनेशनल कुर्त शोर्क अवॉर्ड, रेड इंक अवार्ड फॉर एक्सीलेंस इन इंडियन जर्नलिज्म, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडियाज़ अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म और रामनाथ गोयनका अवॉर्ड शामिल हैं। प्रियंका तीन बार लाडली मीडिया अवार्ड विजेता भी रही हैं।

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मेरा नाम पारुल शर्मा है। आईआईएमसी, नई दिल्ली से 'हिंदी पत्रकारिता' में स्नातकोत्तर डिप्लोमा और गुरु जांबेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार से मास कम्युनिकेशन में एम.ए. किया है। शौक की बात करें तो किताबें पढ़ना, फोटोग्राफी, शतरंज खेलना और कंटेंपरेरी डांस बेहद पसंद है।

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