“लड़की होकर पॉलिटिक्स की इतनी अच्छी जानकारी। वाह तुम्हें स्टॉक मार्केट के बारे में पता है, इकॉनमिक्स में दिचस्पी भी है!! भरोसा ही नहीं होता!! औरतें तो ममता, करुणा, दया, प्यार की मूरत होती हैं, उनके हाथों में अन्नपूर्णा होती हैं।” सुनने में तारीफ़ जैसी ही लगती हैं ये बातें। अक्सर जब कोई आपकी सराहना करने की शुरुआत कुछ इन लाइनों से करता है- “औरत होकर भी” इससे पहले की सामने वाला अपनी अगली लाइन पर जाए आप उसे वहीं रोक दीजिए क्योंकि दरअसल, तारीफ की शक्ल में ये ‘Benevolent Sexism’ है यानी परोपकारी लिंगभेद ही है। दूसरे शब्दों में परोपकारी लिंगभेद का मतलब है लिंगभेद को मीठे-मीठे शब्दों की चाशनी में डुबोकर पेश करना। यह सेक्सिज़म के ज़रिये पैदा हुआ उसका एक अलग रूप है। दरअसल, पितृसत्ता द्वारा तय किए गए मानकों को तोड़कर जब महिलाएं पुरुषों के आधिपत्य वाले क्षेत्र में दखल देती हैं तो पुरुषों को आश्चर्य तो होता ही है। महिलाओं की दखल को स्वीकार करना पितृसत्ता के लिए नामुमकिन काम है। इसका ही नतीजा हमें लिगंभेद तो कभी परोपकारी लिंगभेद के रूप में देखने को मिलता है।
अक्सर हम भी इन बातों को लैंगिक भेदभाव नहीं मानते। लेकिन क्या आपको पता है कि परोपकारी लिंगभेद जेंडर के आधार पर पहले से मौजूद रूढ़ीवादी पितृसत्तात्मक सोच को और मज़बूत करता है। यह सीधे-सीधे भेदभाव करने की जगह ऐसी तारीफों के ज़रिये महिलाओं को उनके जेंडर के आधार पर कमतर साबित करता है। कभी-कभी ये महिलाओं को सबसे ऊंचा दर्जा देकर उन्हें महान भी बताता है। साल 1996 में प्रोफेसर सुज़ैन फिस्क और प्रोफेसर पीटर ग्लिक ने ऐम्बिवेलेंट सेक्सिज़म पर एक पेपर लिखा और उसका निष्कर्ष ये निकाला कि लैंगिक भेदभाव करने के 2 अलग-अलग तरीके होते हैं। पहला- होस्टाइल सेक्सिज़म जहां एक इंसान सीधे तौर पर एक महिला के जेंडर के आधार पर उसके ख़िलाफ़ नफरत, द्वेष, भेदभाव की भावना रखता है। वहीं, दूसरा था बेनॉवलेंट सेक्सिज़म यानि परोपकारी लिंगभेद जहां महिलाओं को उसी रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक नज़रिये से देखा जाता है लेकिन थोड़ी नज़ाकत के साथ।
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परोपकारी लिंगभेद भी कैसे महिलाओं को उतना ही नुकसान पहुंचाता है इसे हम दो अलग-अलग उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं :
“औरतें फूलों सी नाजुक होती हैं, इसलिए एक मर्द को हमेशा उनकी हिफाज़त करनी चाहिए।” यह पासा ही है ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का जिसे वह शब्दों की चाशनी में लपेटकर हमारी तरह फेंकता है। अब इन लाइनों को हम आपके लिए डिकोड करते हैं। औरतें पुरुषों की निजी संपत्ति होती हैं, उनके शरीर, उनके विचार, उनकी यौनिकता, उनके पहनावे, चलने-फिरने आने-जाने सब पर एक मर्द का अधिकार होना चाहिए। इसी साल जनवरी के महीने में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान रखते हुए ये ऐलान किया था कि जो भी महिला काम के सिलसिले में अपने राज्य से बाहर जाएगी उसे अपना रजिस्ट्रेशन लोकल पुलिस स्टेशन में कराना होता। उसे ट्रैक किया जाएगा उनकी सुरक्षा के लिए, सुरक्षा के नाम पर झट से आपकी निजता का अधिकार छीन लिया गया।
परोपकारी लिंगभेद जेंडर के आधार पर पहले से मौजूद रूढ़ीवादी पितृसत्तात्मक सोच को और मज़बूत करता है। यह सीधे-सीधे भेदभाव करने की जगह ऐसी तारीफों के ज़रिये महिलाओं को उनके जेंडर के आधार पर कमतर साबित करता है।
“मां के हाथ से सिल बट्टे पर पीसी चटनी, उनके हाथों का अचार, उनके हाथों की दाल, उनके न रहने से घर कितना गंदा है, 4 दिनों से कपड़े नहीं धुले।” हमारा पितृसत्तात्मक समाज हमेशा मां को कुछ इसी तरह याद करता है न, और करे भी क्यों न, ये समाज औरतों के अनपेड लेबर पर ही तो टिका हुआ है। यहां अनपेड लेबर वर्क को अच्छे-अच्छे शब्दों से सजाकर आपके सामने रख दिया गया है। यह ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज अपनी राजनीति बेहतर समझता है। यह परोपकारी लिंगभेद ही हैं जहां पितृसत्तात्मक समाज त्याग, ममता आदि को सिर्फ महिलाओं से जोड़कर देखता है। घर के काम करना, खाना बनाना, सबकी देखभाल करना सिर्फ और सिर्फ औरतों की ज़िम्मेदारी मानता है। इस लिंगभेद को बनाए रखने के लिए पितृसत्ता महिलाओं को ऐसी ही तारीफों के ज़रिये महान साबित करती रहती है ताकि उसकी यह शोषणकारी व्यवस्था आसानी से चलती रहे।
परोपकारी लिंगभेद औरतों को जेंडर के आधार पर एक कमज़ोर समुदाय के रूप में देखता है। इसका मानना है कि औरतों की जगह सिर्फ घर में होती है। वे हमेशा दूसरों पर यानि मर्दों पर निर्भर होती हैं। इसलिए ये उतना ही महिला विरोधी है जितना ही सीधे पर किए जाने वाला लिंगभेद। साल 2002 में टेंडाय विकी और डॉमनिक अब्राहम द्वारा की गई रिसर्च बताती है कि जो लोग परोपकारी लिंगभेद के विचार रखते हैं वे औरतों को अच्छी और बुरी औरतों के खांचें में बांट देते हैं। ऐसे लोग ये भी मानते हैं कि महिलाओं के साथ होनेवाली यौन हिंसा की ज़िम्मेदार भी वे खुद होती हैं। इसलिए इसे गंभीरता से ज़रूर लीजिए और अगली बार जब कोई कहे ‘औरत होकर भी’ बस उसे वहीं रोक दीजिए।
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About the author(s)
Ritika is the Managing Editor at Feminism in India (Hindi). Ritika is an award-winning multimedia journalist with over five years of experience. She is a passionate advocate for social justice and gender rights, and has been awarded the prestigious UN Laadli Media Awards twice and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing and reporting. She is also a fellow of Rise Up (Youth Championship Initiative).

