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चेतावनी : बलात्कार, जातिगत हिंसा

वह बच्ची थी, सुबह से लेकर शाम तक अपने मोहल्ले की गलियों में खेलती रहती थी। वह अपने बचपन में थी, वह केवल नौ साल की थी। कूड़ा बीनने वाले मां-बाप के लिए उनका भविष्य थी। लेकिन आज आज वह दुनिया में नहीं है। एक दलित लड़की होने के कारण उसका नौ साल की उम्र में बलात्कार होता है और फिर उसे मार दिया जाता है। राष्ट्रीय राजधानी के दिल्ली के कैंट इलाके के नांगल गांव में बीते 1 अगस्त को नौ साल की दलित बच्ची पर कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार के बाद संदिग्ध मौत और आनन-फानन में उसका जबरन उसे जला देने का मामला सामने आया है। पीड़ित माता-पिता का कहना है कि उनकी सहमति के बिना उनकी बच्ची के शव को जबरन जला दिया। परिवार और गांव वाले सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करते हुए इंसाफ की गुहार लगा रहे हैं। लोगों के सड़कों पर प्रदर्शन के बाद चार आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

क्या है पूरी घटना ?

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक बच्ची के पिता का कहना है कि रविवार की शाम करीब 5.30 बजे उन्होंने अपनी बेटी को श्मशान घाट से पीने के लिए ठंडे पानी लेने के लिए भेजा था। मीडिया में चल रही खबरें और प्राथमिकी रिपोर्ट के अनुसार बहुत देर तक न लौटने के बाद उसकी मां आसपास में पूछताछ करने के बाद उसे ढूंढते हुए श्मशान घाट पंहुच गई। वहां उन्होंने अपनी बेटी को बेजान देखा जिसके नाक से खून निकल रहा था, होंठ नीले हो चुके थे। बदन पर खराशें थी और कपड़े गीले थे। परिवार के पूछने पर कि उसे क्या हुआ तो श्मशान के पुजारी ने कहा कि वॉटर कूलर में करंट आने की वजह से बच्ची की मौत हो गई।

बच्ची के पिता का कहना है कि जब उन्होंने बेटी को डॉक्टर के ले जाने को कहा तो आरोपियों ने उन्हें जाने के लिए मना किया और पुलिस के पास भी जाने से रोका गया। जांच के दौरान बच्ची के शरीर के अंगों को चुरा लिया जाएगा जैसी बात कहकर तुंरत ही उसके शव को जलाने का दबाव बनाया। बाद में बच्ची के माता-पिता ने इस घटना की पुलिस में जानकारी दी। ग्रामीण लोगों के प्रदर्शन के बाद मामला दर्ज किया गया। इस मामले में 302 (हत्या), 376 (बलात्कार) और 576 (अपराधिक धमकी) के अलावा यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। घटना के बाद से लगातार गांव वालों के प्रदर्शन जारी है वह जल्दी से न्याय की मांग करते हुए दोषियों के लिए फांसी की सज़ा की मांग कर रहे हैं। इस घटना में दिल्ली पुलिस की लाहपरवाही के लिए उन पर भी कार्रवाई की भी मांग कि जा रही है। परिवारजनों का आरोप है कि पुलिस भी मामले को रफा-दफा करना चाहती थी।

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घटना के खिलाफ जारी प्रदर्शन, तस्वीर साभार: Mid Day

केस में पीड़ित की जाति का ज़िक्र क्यों है ज़रूरी 

इस धरती पर महिलाओं का शोषण सबसे ज्यादा होता है। घर और बाहर हर जगह वे अपने जेंडर की वजह से तमाम तरह की हिंसा का सामना करती हैं। वहीं अगर महिला दलित, बहुजन आदिवासी या अल्पसंख्यक है तो वह और अधिक शोषण का सामना करती है। अभी हाथरस की घटना को एक साल भी नहीं बीता और दिल्ली में बच्ची के साथ बलात्कार और उसके जबरन शव जलाने की एक ओर घटना सामने आ गई है। दोंनो घटनाओं का पैटर्न बिल्कुल मिलता-जुलता है। इस बीच हर दिन महिला और बच्चियों के खिलाफ होने वाली हिंसा की खबरें आती रहती हैं। हाथरस मामले में सुस्त जांच अब तक किसी फैसले पर नहीं पंहुची है। हाथरस के केस में पुलिसवाले ही अंधेरे में बिना घरवालों की मौजूदगी के उसका अंतिम संस्कार कर देते हैं।

महिलाओं का शोषण उनके महिला होने के कारण होता है लेकिन दलित महिलाओं का शोषण उनकी जाति के कारण भी होता है। ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज में एक महिला उसकी जाति के कारण और अधिक वलनरेबल हो जाती है। तमाम आँकड़े और विश्लेषण भी यह बताते हैं कि दलित महिलाओं पर हिंसा की घटना में उनकी जाति एक बड़ी वजह होती है।

जब एक दलित महिला के साथ शोषण और हिंसा की घटना होती है तो विरोध करनेवालों में से एक तबका यह भी कहता है कि इसमें जाति का मामले से कोई लेना नहीं है। इस मामले में भी अधिकारी और सवर्ण मीडिया के पत्रकारों ने कहा कि यौन हिंसा का जाति से कोई लेना-देना नहीं है। समाज का एक बड़ा तबका यौन हिंसा पर जाति से जोड़ने को गलत कहता है। महिलाओं का शोषण उनके महिला होने के कारण होता है लेकिन दलित महिलाओं का शोषण उनकी जाति के कारण भी होता है। ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज में एक महिला उसकी जाति के कारण और अधिक वलनरेबल हो जाती है। तमाम आकंडे और विश्लेषण भी यह बताते हैं कि दलित महिलाओं पर हिंसा की घटना में उनकी जाति एक बड़ी वजह होती है।

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ब्राह्मणवादी व्यवस्था के कारण दलितों के संघर्ष, उनकी परेशानियों स्तर कई गुना अधिक होता है। तमाम संगठन और अनुसूचित जाति कल्याण के मंत्रालयों के बावजूद दलितों को उनके खिलाफ होने वाली हिंसा की प्राथमिकी ही दर्ज कराने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जब तक सड़कों पर प्रदर्शन नहीं होता तब तक पुलिस उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं करती है। प्रशासनिक कारवाई से इतर भावनाओं के रूप में भी जब एक दलित महिला के साथ हिंसा होती है तो समाज की प्रतिक्रियाओं में भी अंतर देखने को मिलता है। महिला या बच्ची के दलित हो जाने के कारण ही उसके लिए न्याय की मांग करते कुछ लोगों की बात धीमी और सुस्त भी हो जाती है तो कुछ पीड़िता की जाति के कारण ही चुप्पी साध लेते हैं।

आम जनता में भी दलित और सवर्ण जैसे दो गुट बन जाते हैं जो हमें हाथरस की घटना के बाद देखने को मिला। उसी गांव के लोग सिर्फ आरोपियों को इसलिए बचा रहे थे क्योंकि वे उस ऊंची सवर्ण जाति ठाकुर से थे। दलित महिलाओं के साथ हो रही हिंसा पर समाज नसीहत देता है कि लड़की तो लड़की है उसमें जाति का क्या मामला है। लेकिन दलित, बहुजन, आदिवासी और हर वंचित और हाशिये पर गए समुदाय के साथ होनेवाली हिंसा पर उनकी सामाजिक पहचान का ज़िक्र करना ज़रूरी है। दलितों को उनका अधिकार तभी मिलेगा जब वह अपनी जाति, अपनी पहचान का ज्रिक करेंगे। दूसरा इससे उन सवर्ण जातियों का असली चेहरा सामने आएगा जो खुद को श्रेष्ठ मानकर कर दलितों को अछूत बताती है।

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क्या कहते हैं आंकड़े ?

आंकड़े भी कहते है कि दलित महिलाएं बलात्कार और अन्य हिंसा का अधिक सामना करती हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2019 के आंकड़े के अनुसार पूरे देश में 32,033 बलात्कार के केस दर्ज हुए थे। एनसीआरबी के ही मुताबिक औसतन हर दिन भारत में 10 दलित महिलाओं का बलात्कार होता है। ध्यान रहे कि ये मामले सिर्फ वे हैं जिनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई जाती है। इक्वैलिटी नाउ और स्वाभिमान सोसाइटी की रिपोर्ट, ‘न्याय से वंचित: यौन हिंसा और इंटरसेक्शनल भेदभाव हरियाणा में दलित लड़कियों और महिलाओं तक न्याय तक पहुंचने में आने वाली बाधाएं’ हरियाणा में दलित महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ 40 बलात्कार के मामलों की आपराधिक न्याय प्रणाली के माध्यम से प्रगति का विश्लेषण किया। पिछले एक दशक में, स्वाभिमान सोसाइटी ने तथ्य खोजने वाली रिपोर्टों पर काम किया और यौन हिंसा के सर्वाइवर्स का साक्षात्कार किया। इस रिपोर्ट में हरियाणा में दलित महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ यौन हिंसा की प्रकृति का विश्लेषण, इन्हीं निष्कर्षों पर आधारित है। साथ ही रिपोर्ट में उन बाधाओं को भी शामिल किया गया जिनका सर्वाइवर्स को आपराधिक न्याय प्रणाली तक पहुंचने में सामना करना पड़ता है।

यह रिपोर्ट बताती है कि लगभग सभी मामलों में, यौन हिंसा के सर्वाइवर्स की आवाज़ को दबा देने के लिए उन्हें कलंक, प्रतिशोध, धमकी, हिंसा और अत्यधिक दबाव के अधीन किया जाता है। यौन हिंसा के सर्वाइवर्स दलितों को अक्सर दबंग जाति के अपराधियों द्वारा प्रतिशोध और हिंसा के खतरों का सामना करना पड़ता है। लगभग 60 फ़ीसद सर्वाइवर्स को समझौते के लिए मजबूर किया गया। खाप पंचायतों (अनौपचारिक ग्राम सभा) द्वारा भी कम से कम 80 फ़ीसद मामलों में हस्तक्षेप किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक यौन हिंसा के दलित सर्वाइवर्स को पुलिस की निष्क्रियता, पीड़ित-दोष और जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पुलिस या तो एफआईआर फाइल करने से इनकार करती है, सर्वाइवर्स को उनके अधिकारों से वंचित करती है, या SC & ST (PoA) अधिनियम के तहत दलित सर्वाइवर्स के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों को दर्ज करने के लिए अनिच्छुक होती हैं। लिंगवाद और जातिवादी दृष्टिकोण के कारण, पुलिस पीड़ितों को भी दोषी ठहराती है और सर्वाइवर्स के खिलाफ अपमानजनक भाषा और जातिवादी गालियों का उपयोग करती है।

दलितों के प्रति भारतीय समाज का रवैया अभी भी वही है जो आज से सैकड़ों साल पहले था। उनका दर्द, परेशानी और उनपर होने वाले अत्याचार को सिर्फ इस लिए नजरअंदाज़ कर दिया जाता है क्योंकि वह उस जाति से आते हैं, जिसे मनुवाद ने छोटा, नीच और अछूत कहा है। भारत आज भी अपने ही देश के नागरिकों को इसलिए अनदेखा करता है क्योंकि वे जाति से दलित हैं। चुनाव के वक्त दलित के यहां खाना खाने के लिए पिक्चर इवेंट तक मौजूद सरकारों की जिम्मेदारी समाज में इस खाई को गहरा कर रही है और दलित के प्रति हिंसा में बढ़ोत्तरी लगातार हो रही है। तमाम संगठन और मंत्रालय गठित होने के बावजूद जाति के कारण ही पीड़ित एक अदद एफआईआर के लिए भी संघर्ष करता है। न्याय मिलने की प्रक्रिया में दलित होने के कारण ही न्याय दूर की बात हो जाती है।

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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