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भारत में अपने शरीर को लेकर जागरूकता एक दिलचस्प और जटिल विषय है। अमूमन न तो हम अपने शरीर के लिए अपने अनुसार फैसले लेते हैं, न ही हमारे कपड़ों या सौन्दर्य प्रसाधनों को अपनी जरूरतों के हिसाब से चुनते हैं। अक्सर ये फैसले बाज़ार में आए नए उत्पाद, उभरता फ़ैशन या दूसरों के सुझाव से प्रेरित होते हैं। हमारे पितृसत्तात्मक समाज ने सब के लिए ही सुंदरता के मानक तय कर दिए हैं लेकिन महिलाओं के मामले में यह और भी अधिक अस्वाभाविक और अप्राकृतिक है। सदियों से महिलाओं को केवल ‘शरीर’ के रूप में चिन्हित किया गया है। उनके लिए सुंदर, कोमल या नाज़ुक जैसे विशेषणों का इस्तेमाल हुआ है। इसलिए सुंदरता के निश्चित मानकों के अनुसार होने का दबाव पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर कहीं अधिक होता है। हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां महिलाओं के शरीर को संस्कृति से जोड़ा जाता है। यह लोगों की निंदा, जजमेंट, निर्णय और अस्वाभाविक सुंदरता के मानदंडों का पात्र बन चुका है। इसलिए पुरुषों की तुलना में महिलाओं की कहीं अधिक बॉडी शेमिंग होता है। बॉडी शेमिंग सुनने और कहने में जितना आसान है, इसकी थिअरी उतनी ही जटिल है। आज घरों से लेकर फिल्मी दुनिया, खेल के मैदान से लेकर दफ्तरों तक कहीं भी लोग इससे बचे नहीं हैं। बाज़ार ऐसे उत्पादों से भरा पड़ा है जो हमारे अच्छे दिखने और रहन-सहन को बढ़ावा देते हैं लेकिन खुद का ख्याल रखने के नामपर यह लोगों को वैसा शरीर चुनने के लिए मजबूर करते हैं जो सुंदरता के निश्चित मानदंड के अनुसार हो।

बॉडी शेमिंग और पूंजीवाद

बॉडी शेमिंग का पितृसत्ता से ही नहीं, उपभोक्तावाद और पूंजीवाद से भी गहरा संबंध है। आज बाज़ार डिमांड और सप्लाइ की दलील पर चल रहा है। ऐसे में लोगों के बीच अपने शरीर की बाहरी सुंदरता के प्रति अत्यधिक चिंता का होना हर मल्टीनैशनल कंपनी के उत्पाद की बिक्री का मूल बन चुका है। बाज़ार सिर्फ उन शरीर या चेहरों को सुंदर दिखाता है जो पहले से प्रतिष्ठित मानदंडों के अनुरूप हैं या वैसा बनने की चाहत रखते हैं। लिहाज़ा, इस तर्क से उस मानसिकता या मानदंडों से अलग लोगों की बॉडी शेमिंग होना अनिवार्य है। आमतौर पर यह एक सिस्टम की तरह काम करता है जिससे लोगों का इससे अलग सोच रखना या निकलना मुश्किल हो जाता है। अपने निजी जीवन में इस बात का एहसास मुझे अनेक बार हुआ है।

उपभोगतावाद और पूंजीवाद एक दूसरे के पूरक की तरह काम करते हैं। जहां पितृसत्ता हर किसी के शरीर की सुंदरता की परिभाषा निश्चित करती है, वहीं उपभोगतावाद हमें वैसा बनने के लिए उत्पाद पकड़ाता है।

पिछले कई दिनों से मैं अलग-अलग ब्रैंड्स की कोई ऐसी क्रीम खोज रही थी जो ‘गोरा चेहरा या निखार’ का दावा न करे। दुर्भाग्यवश, महंगे से महंगे ब्रैंड्स भी भले अपने विज्ञापन में इन शब्दों का इस्तेमाल न करते हो, लेकिन प्रॉडक्ट डिटेल्स देखने पर आप समझेंगे कि वे भी कुछ अलग नहीं। मुझे हर चेहरे को अवास्तविक और अप्राकृतिक रूप से गोरा या बेदाग दिखाने की कोशिश से आपत्ति है। घर से लेकर बाहर तक; हर जगह लड़कियों को बेदाग और गोरे चेहरे के लिए घरेलू नुस्खे या फेस मास्क जैसे हजारों अन्य चीजों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया जाता है। गोरे रंग से हमारे देश में प्यार कोई नई बात नहीं। जन्म से लेकर शादी का पूरा बाजार ही गोरे रंग की चाहत पर टिका है। लेकिन आज बाज़ार में गोरा रंग ही नहीं, लोगों को खूबसूरत, आकर्षक, पतला, लंबा होने की आवश्यकता की दलीलों के साथ उत्पादों की बिक्री हो रही है।

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हमारा देश पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से चलता है। जैसा कि जर्मन दार्शनिक और समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवाद एक व्यवस्था से कहीं बढ़कर है। यह एक ‘निश्चित जीवन शैली’ है। इस जीवनशैली की आड़ में हमें ऐसे उत्पादों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया जाता है जो असल में हमारी ज़रूरत नहीं हैं। इसमें पितृसत्ता, उपभोगतावाद और पूंजीवाद एक दूसरे के पूरक की तरह काम करते हैं। जहां पितृसत्ता हर किसी के शरीर की सुंदरता की परिभाषा निश्चित करती है, वहीं उपभोगतावाद हमें वैसा बनने के लिए उत्पाद पकड़ाता है। सुंदर दिखने की चाह में अक्सर इंसान के व्यक्तित्व, गुण और स्वभाव को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया जाता है। नियोलिबरल कंज्यूमरिज़म यानि नव-उदारवादी उपभोगतावाद के बाद देश के अर्थव्यवस्था में तेजी से बदलाव हुए और इसके साथ-साथ सुंदरता और फ़ैशन के मायनों में भी जबरदस्त परिवर्तन हुआ।

आज फ़ेस क्रीम से लेकर कॉर्नफ़्लेक्स, ऑलिव ऑइल या ग्रीन टी से लेकर आटे या ब्रेड और स्वच्छता उत्पादों की लगभग सभी कंपनियां अपने विज्ञापन में उन महिलाओं को दिखाती है जो गोरी या पतली है और इन उत्पादों से उनकी यह सुंदरता बनी रहेगी।

वित्तीय वर्ष 2020 में भारत की कॉस्मेटिक्स मार्केट का मूल्य 13191 मिलियन अमेरीकी डॉलर था जबकि इसमें वित्तीय वर्ष 2026 तक 16 फ़ीसद से भी अधिक सालाना बढ़त (सीएजीआर) का अनुमान है। भारतीय उपभोक्ताओं, विशेष कर महिलाओं के बीच हर्बल कॉस्मेटिक उत्पादों की बढ़ती मांग, शारीरिक सुंदरता के प्रति अत्यधिक चिंता और जागरूकता कॉस्मेटिक उत्पादों का सबसे बड़ा बाज़ार बना रहा है। साल 2012 में सौन्दर्य उत्पादों की बिक्री के लिए ऑनलाइन प्लैटफ़ार्म नायका की सफलता इस बात का प्रमाण है कि सौन्दर्य प्रसाधनों के इस्तेमाल में बढ़त एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन चुकी है। भारत की एक प्रमुख FMCG कंपनी पतंजलि आयुर्वेद ने साल 2019-20 में अपने मुनाफे में 22 फ़ीसद तक वृद्धि दर्ज की। आज फ़ेस क्रीम से लेकर कॉर्नफ़्लेक्स, ऑलिव ऑइल या ग्रीन टी से लेकर आटे या ब्रेड और स्वच्छता उत्पादों की लगभग सभी कंपनियां अपने विज्ञापन में उन महिलाओं को दिखाती है जो गोरी या पतली है और इन उत्पादों से उनकी यह सुंदरता बनी रहेगी।

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कोरोना महामारी से पहले भी देश में फिटनेस इंडिस्ट्री रफ्तार पकड़ रही थी। हेल्थिफ़ाई मी जैसे कई ऑनलाइन माध्यमों पर कसरत और योग आम हो चुके थे। कई फिल्मी कलाकारों द्वारा भी ऐप के माध्यम से सुंदर और फिट रहने के उपाए बताए जा रहे थे लेकिन दुर्भाग्यवश लगभग सभी कंपनियों ने फिटनेस को पतले होने से जोड़ा और उसी का प्रचार किया। कोरोना महामारी ने अब आम जनता को स्वास्थ्य के प्रति सजग तो किया है लेकिन उपभोगक्तवाद के बाज़ार में यह सुंदर और पतला होने तक ही सीमित हो जाते हैं। फाइनेंनसियल एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 में लगभग 71 हजार नए फिटनेस और स्वास्थ्य ऐप लॉन्च किए गए जो साल 2019 की तुलना में 13 फ़ीसद अधिक थे।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार विश्व भर में स्वास्थ्य और फिटनेस ऐप के डाउनलोड के मामले में साल 2020 में 46 फ़ीसद की वृद्धि हुई। यह बढ़त साल 2020 के पहले और दूसरे तिमाही में भारत में सबसे अधिक 156 फ़ीसद रही। स्वास्थ्य और फिटनेस ऐप हेयल्थीफ़ाई मी का उदाहरण लें तो लगभग इसके सभी विज्ञापनों में अपने मोटापा से छुटकारा पाए का पुरुष या महिला प्रचार करते नजर आते हैं। महामारी के दौरान इस ऐप के उपयोगकर्ताओं में 5 मिलियन तक वृद्धि हुई जो इसके सभी उपयोगकर्ता का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। हालांकि आज मिंत्रा, ऐमजॉन जैसी कई कंपनियां प्लस साइज़ के कपडों की बिक्री करती हैं लेकिन विज्ञापनों का महत्वपूर्ण माध्यम टीवी पर दिखाए जा रहे विज्ञापनों से समझा जा सकता है कि आज भी हमारी सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। शायद इसीलिए चुस्त और सुंदर शरीर के लिए बॉडी शेमिंग में फैट शेमिंग की जगह सबसे ऊपर है।

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तस्वीर साभार: Shape Magazine

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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