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इंसानों के शरीर पर 5,00,000 के लगभग रोम छिद्र होते हैं। ये बाल या रोएं शरीर के तापमान को नियंत्रित करने के साथ बाहरी धूल, प्रदूषण, कीटाणु से बचाव करने का काम करते हैं। शरीर के बाल जब इतने अहम हैं तो ऐसे में सोचना जरूरी है कि आख़िर क्यों महिलाएं इन्हें हटाने के लिए परेशान रहती हैं या क्यों देश-विदेश के इतने सारे विज्ञापनों में औरत के बिना बाल वाले शरीर को उसकी खूबसूरती का पैमाना दिखाया जाता है। समाज की बनाई ‘खूबसूरत औरत’ की परिभाषा पर गौर करें तो कई ऐसे ही बातें देखने को मिलेंगी। चीन की एक परंपरा के अनुसार लगभग आठ शताब्दियों तक औरतों के छोटे पैरों को सुंदर माना जाता था। शादी के वक्त उनके पैर देखकर फैसला लिया जाता था। छोटे पैरों को लड़की के सभ्य और ऊंचे खानदान से होने की निशानी मानी जाती था। लेकिन इसके लिए लड़कियों को छोटी उम्र से ही एक दर्दनाक प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता था। बचपन में ही चीनी लड़कियों के पैर मोटे कपड़ों से बांध दिए जाते थे ताकि जब उनके शारीरिक विकास हो रहा हो तब उनके पैर 3-4 इंच से ज्यादा न बढ़ें।

वहीं, यूरोप में कॉर्सेट के चलन का उदाहरण देखा जा सकता है। कॉर्सेट एक बहुत ही कसा हुआ परिधान होता है जिसे पहनने पर कमर पतली नज़र आती है। यूरोप के समाज में तब औरतों की कम से कम इंच की कमर उनके ज्यादा से ज्यादा आकर्षक होने का मापदंड तय करती थी। ये सभी प्रथाएं महिला के शरीर को बंधक महसूस करवाने और कष्ट देने के अलावा उन्हें एक शो पीस के तौर परजाने वाली सुंदर चीज़ के रूप में तैयार करने की मंशा से प्रेरित थी। ऐसा ही एक अभ्यास है शरीर के बाल यानी बॉडी हेयर हटाया जाना।

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कैसे गढ़ी गई बॉडी हेयर के प्रति औरतों में हीनता

यह चलन कोई नई बात नहीं है। प्राचीन रोम और मिश्र सभ्यताओं से हमें औरतों द्वारा सपने शरीर के बाल हटाएं जाने के प्रमाण मिलेंगे। मिश्र और भारत में 3000 बीसी काल के तांबे से बने रेज़र मौजूद हैं। मिश्र की औरतें अपने सिर के बाल हटाया करती थीं। वे प्यूबिक हेयर के बड़े होने को असम्भ्य मानती थीं। रोम की उच्च कुल की महिलाएं भी ऐसा करती थी। क्लेओपात्रा के दौर के मिश्र में चीनी के घोल से बाल वैक्स करने की प्रक्रिया इस कड़ी में जुड़ चुकी थी। हालांकि कई स्कॉलर्स की मानें तो शरीर के बाल हटाना पुराने समय की कई सभ्यताओं में केवल एक जेंडर तक सीमित नहीं था। 

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तस्वीर साभार , गेट्टी इमेजेज़

सन 1500 में यूरोप की महिलाओं पर क्वीन एलिजाबेथ के बने नियम लागू थे जिसके अनुसार उन्हें अपने भौहों को एक आकार में रखना, चेहरे, होंठ के ऊपर उगते बालों को हटाना होता था। लंबे ललाट भी अच्छे माने जाने लगे, अमीर घरों की मांएं बेटियों के ललाट पर अखरोट का तेल रगड़ती, निचले आर्थिक वर्गों में इसी काम के लिए अमोनिया में डुबाया कपड़ा इस्तेमाल किया जाता।

आधुनिक समय में इस अभ्यास को बढ़ावा मिला चार्ल्स डार्विन के ‘रेवोलुशनरी जेनेटिक्स‘ के काम के कारण। साल 1871 में डार्विन की किताब ‘डिसेंट ऑफ मैन’ ने औरतों के शरीर के बाल के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला जब उन्होंने लिखा, “एक औरत के शरीर में मर्दों के मुकाबले कम रोएं होते हैं और यह बात हर देश, सभ्यता, जनजाति की औरत पर लागू होती है।” उस समय के वैज्ञानिकों ने कई सर्वे इस बात को साबित करने के लिए किए कि मर्दों और औरतों के बीच शरीर के बाल का ज्यादा या कम होना एक जरूरी फ़र्क है।

आज भी स्त्रियों अपने शरीर पर बालों के होने को लेकर सहज नहीं हैं। सोचा जाना चाहिए कि क्या महिलाओं द्वारा अपने-आप को घिसे-पिटे पुराने मर्दाने चश्मे से देखने की जरूरत है।

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अमरीका के बाज़ार ने बड़ी तेज़ी से इस नैरेटिव को पकड़ा। सन् 1900 के शुरुआती सालों के आते-आते उच्च और मध्य वर्गीय अमरीकी महिलाएं बिना बाल, साफ चिकने शरीर को आकर्षक दिखने का पर्याय मान चुकी थीं। हालांकि बाल हटाने से जुड़ी इंडस्ट्री तीन भागों में काम कर रही थी, औरतों के शरीर से जुड़ी, मर्दों के शरीर से जुड़ी, फ़ैशन पत्रिकाएं, इन सबका लक्ष्य इस नए ग्राहक वर्ग जो थीं औरतें, उन से अधिक से अधिक मुनाफ़ा कामना था। बिना बाजू वाले कपड़े फैशन में थे, बिना बाल के हाथ और बगल क दिखाया जाने लगा। साल 1915 में जीलेट कंपनी औरतों के लिए विशेष तौर पर बना पहला रेज़र लेकर बाज़ार में आया। उनके विज्ञापन में मिलेडी डेकोलेट महिलाओं से कहती थीं, “शर्मिंदा कराने वाले रोएं जो चेहरे, गर्दन और बाजू पर उग आते हैं उनसे छुटकारा दिलाया जा सकेगा।” साल 1917 तक एक मिलियन रेज़र बिक चुके थे। इस प्रोडक्ट को नए समय में औरत की जरूरत के तौर पर पेश किया गया।

तस्वीर साभार : वेला.

ब्रुबेर्ग ने लिखा है, “1920 के दौर में शरीर ही फ़ैशन बन चुका था”, साल 1920 से 1930 के अंतराल में बाल हटाने के लिए कुछ बहुत हानिकारक कदम उठाने की घटनाएं भी सुनने में आती हैं। कुछ महिलाएं सैंड पेपर और कोरेमलु (चूहे मारने की दवाई) का प्रयोग करने लगी थीं। चमड़े में जलन की समस्या से लेकर हज़ारों की संख्या में मौत इसके परिणाम रहे। कोरेमलु के कारण शरीर के हिस्से का क्षतिग्रस्त होना, आंखों की रोशनी चले जाना एक आम घटना थी। इस सब के बीच जीलेट की मांग बनी हुई थी।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब अमेरिका में नायलॉन की कमी होने लगी तब स्टॉकिंग्स का उत्पादन कम हो गया। इसका मतलब था अब औरतों को पैरों के बाल छिपा लेने का रास्ता भी बंद हो चुका था। वे घरों से बाहर काम करने निकल रही थीं। अपने पुरुष सहकर्मियों के बीच अपने आप को सुसज्जित दिखाने का भार उनपर आ चुका था। 1960 में मिनी स्कर्ट का ट्रेन्ड आने से पहले ही औरतें अपने व्यवहार में पैरों से रोयें हटाने को शामिल कर चुकी थीं। ‘वीमेन म्यूज़ियम ऑफ कैल्फोनिया’ और ‘द ऐटलैंटिक’ के लेखों के मुताबिक 1964 तक 98 प्रतिशत औरतें ऐसा कर रही थीं। 1946 में बिकनी पहनने की शुरुआत हुई, तब प्यूबिक एरिया के बालों को हटाना इस लिस्ट में जुड़ गया। ‘प्लेयबॉय’ पत्रिका में लॉन्जरे पहनी हेयरलेस मॉडल छाई हुई थी। इस पत्रिका ने समाज में आकर्षण का यह पैमाना खूब प्रचलित किया। साल 1960 से 1970 के बीच बालों का उगना ज्यादा समय तक कम कराने या बंद कराने के लिए डॉक्टर्स हार्मोनल ड्रग लिख रहे थे। इन ड्रग्स के साइड इफ़ेक्टस में दिल का दौरा पड़ने और कैंसर होने की संभावनाएं रहती थी। साल 1999 तक लेज़र तरीक़े से बाल हटवाना अमेरिका का तीसरा सबसे बड़ा सौंदर्य उद्योग बन गया था।

तस्वीर साभार , गूगल.

साल 1970 के दौर में नारीवादी आंदोलन की द्वितीय लहर ने इस अभ्यास पर हमला था। लैंगिक समानता के लिए लड़ाई लड़ रही महिलाओं के लिए शरीर पर बाल का होना अपनी सुंदरता खुद तय करना और एक संघर्ष चिह्न की तरह बन गया था। हालांकि यह विरोध मुख्यधारा की बातचीत और विमर्श में शामिल नहीं हो पाया। कुछ पुराने ख़्याल की पारंपरिक नारीवादियों ने इस नई पीढ़ी की शरीर पर बाल रखने और इस कारण हीन ना महसूस करने की सोच को ‘अतिवादी’ करार दिया। 1987 में ब्राज़ील की जे.बहनों ने न्यूयॉर्क के अपने सैलून में ब्राज़ीलियन वैक्स लाकर पहले से मौजूद बाल हटाने के कई साधनों में एक और तरीका जोड़ दिया। साल 2017 में एडिडास का एक कैंपेन मॉडल अरविडा बिस्ट्रोम ने बिना अपने पैरों से बाल हटाए किया था। सोशल मीडिया पर उनकीन बहुत ट्रोलिंग हुई और उन्हें रेप की धमकियां तक मिलने लगी। उसी साल पेरिस जैक्सन ने वीएमएम के रेड कारपेट पर अपने बगलों बाल बिना हटाए उतरीं। ‘अलुयर ‘ से साथ बातचीत के दौरान कहा था, “मैं लेज़र तरीक़े से बाल हटवाने की कायल हूं, मेरे पैर, हाथ, बाजू, कांख, कहीं बाल नहीं। मेरा शरीर ‘हेयरलेस’ है।”

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शरीर के बाल हटाना क्यों एक स्वतंत्र इच्छा नहीं रह जाती है?

यह इंडस्ट्री जब एक बिलियन डॉलर से ज्यादा की बन चुकी है हम अपने आसपास ऐसी बातें बहुत सुनते हैं, “उसके चेहरे पर लड़कों तरह मूंछें उग आई हैं”, “पैरों में भालू जैसे बाल हैं।” ऐसा कहने वाले हमारे मज़ाकिया दोस्त या कोई चिंतित रिश्तेदार या अपने मां-बाप जैसे क़रीबी होते हैं। कहीं न कहीं हमारे दिमाग़ में समाज यह बात डाल चुका होता है कि ‘हेयरलेस बॉडी’ स्त्रीवत्व के नज़दीक है। आज-कल ये प्रोडक्ट्स औरतों को चॉइस की तरह बताकर बेचे जा रहे हैं। सशक्त/कामकाजी/अपने फैसले खुद लेने वाली किसी महिला के चॉइस के रूप में विज्ञापन के शब्दों की पैकेजिंग की जाने लगी है। हमें सोचने की जरूरत है कि क्या सच में यह एक स्वतंत्र चुनाव है या एक पितृसतात्मक समाजिक परिवेश से जन्मी इच्छा है। ‘एल्ले’ के ब्लॉग पर एक लेख में कई भारतीय महिलाएं कहती हैं कि वे ऑफिस में ‘अनप्रोफेसनल’ या गैरजिम्मेदार नहीं दिखना चाहती हैं इसलिए वैक्सिंग करती हैं। कई बार वे अपनी उर्ज़ा शरीर के बालों पर किए गए मज़ाक, सवाल, टिप्पणी के जवाब देने में ख़र्च करने से बचने के लिए ऐसा करती हैं। वे पूछती हैं कि क्या उनके पुरुष सहकर्मियों को इस बात की इतनी चिंता करनी पड़ती है कि वे बढ़िया काम करने और जानने के बावजूद बाहरी तौर पर कैसे दिख रहे हैं, दाढ़ी कितनी बढ़ी है, इत्यादि। औरतों के परिपेक्ष्य में शरीर के प्राकृतिक रोएं को ‘साफ़ सुथरे’ नहीं रहने से जोड़ा जाना नाइंसाफी है। इन्हें हटाने में बेवजह बहुत समय, ऊर्जा और अर्थ ख़र्च होता है इस बात से वे नकारती नहीं हैं।

तस्वीर साभार, गूगल

इस प्रक्रिया को चॉइस कहने से पहले हमें बॉलीवुड का वो दौर याद आना चाहिए जब हीरो के छाती के बाल ‘माचो मैन’ की इमेज बेच रहे थे। तब भी नायिकाओं के लिए हेयरलेस होना ‘सुंदरता’ थी, 2020 में हीरो छाती के बाल अपनी मर्ज़ी से रखना या हटाना चुन सकता है लेकिन मुख्यधारा में नायिकाएं आज भी हेयरलेस ही सुंदर मानी जाती हैं। चूंकि सबसे ज़्यादा समय तक बाल हटाने के अभ्यास को लैंगिक दिखाया गया है, स्त्री के खूबसूरती का रास्ता बताया गया है और आज भी स्त्रियों अपने शरीर पर बालों के होने को लेकर सहज नहीं हैं। सोचा जाना चाहिए कि क्या महिलाओं द्वारा अपने-आप को घिसे-पिटे पुराने मर्दाने चश्मे से देखने की जरूरत है।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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