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बचपन से हम अपनी सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में पढ़ते आए हैं, ‘इंग्लिश चैनल पार करने वाली पहली एशियाई महिला आरती साहा थीं।’ यह एक लाइन पढ़कर, याद कर हम आगे बढ़ जाते हैं। कम ही हमारा ध्यान आरती साहा के इस ऐतिहासिक कारनामे पर जाता है। नए-नए कीर्तिमान तो दुनिया में हर दिन रचे जाते हैं पर आरती साहा, भारत की लंबी-दूरी की तैराक का 29 सिंतबर, 1959 में इंग्लिश चैनल पार कर लेना क्यों इतना हैरतंगेज़ और सराहनीय कारनामा है, आइए इस लेख के ज़रिये जानने की कोशिश करते हैं।

24 सितंबर, साल 1940 में आरती साहा गुप्ता का जन्म एक साधारण बंगाली परिवार में हुआ। महज़ ढाई साल की उम्र में ही उनकी माँ का देहांत हो गया था इसलिए उनका बचपन अधिकतर उनकी दादी के घर बीता। चार साल की उम्र में ही आरती को तैराकी का चस्का लग गया। वह हुगली नदी स्थित चम्पाटला घाट पर जमकर तैराकी करतीं। उनके चाचा ने यह हुनर देखकर आरती का दाखिला हटकोला स्विमिंग क्लब में करा दिया। एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक पाने वाले पहले भारतीय सचिन नाग ने भी आरती में अद्भूत जज़्बा देखा और उनको भरपूर प्रशिक्षण प्रदान किया। 

महज़ पाँच साल की उम्र में, ‘शैलेन्द्र मेमोरियल तैराकी प्रतियोगिता’ में आरती ने फ्रीस्टाइल कैटेगरी में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। 100 मीटर फ्रीस्टाइल, 100 मीटर ब्रैस्ट स्ट्रोक और 200 मीटर ब्रैस्ट स्ट्रोक में उन्होंने बचपन से ही महारथ हासिल कर ली थी। साल 1948 में मुंबई में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उन्होंने 100 मीटर फ्रीस्टाइल और 200 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में रजत पदक और 200 मीटर फ्रीस्टाइल में कांस्य पदक जीतकर आज़ाद भारत की अपनी पहली जीत अपने नाम की। 9 साल की उम्र में उन्होंने 100 मीटर तैराकी में अखिल भारतीय रिकॉर्ड दर्ज किया। साल 1945 से 1951 के दौरान उन्होंने 22 राज्यस्तरीय प्रतियोगिताएं जीत ली थी।

साल 1952 में हेलसिंकी में आयोजित ग्रीष्मकालीन ओलंपिक्स में उन्होंने भाग लिया जिसमें एशिया से सिर्फ चार महिलाओं ने हिस्सा लिया था। उस वक़्त उनकी उम्र सिर्फ़ बारह साल थी। इतना तो सब जान गए थे कि आरती कोई साधारण बाल तैराक नहीं हैं पर आगे आरती क्या गज़ब कारनामा करने वाली थीं, इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।

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आरती साहा पर गूगल द्वारा बनाया गया डूडल, तस्वीर साभार: Google

इंग्लिश चैनल पार करने की प्रेरणा

महान तैराक ब्रोजेन दास साल 1958 में ‘बुटलिन अंतरराष्ट्रीय क्रॉस चैनल स्विमिंग रेस’ में इंग्लिश चैनल पार करके ब्रोजेन भारतीय उपमहाद्वीप से ऐसा करने वाले पहले पुरुष थे। आरती ने ब्रोजेन को बधाई देने के लिए एक पत्र लिखा। पत्र का जवाब आया, ‘आप भी ऐसा कर सकती हैं।’ फिर क्या, आरती ने क्लब के अधिकारियों से अपनी ख्वाहिश साझा की। मिहिर सेन जो कि साल 1958 में इंग्लिश चैनल पार करने वाले पहले भारतीय पुरुष थे उनसे लेकर नेहरू ने आरती का भरपूर सहयोग किया और उनको हर सम्भव ज़रूरत मुहैया कराई। बता दें कि एक इंटरव्यू में आरती साहा ने बताया था कि वह मिहिर सेन को अपना प्रेरणास्रोत मानती थीं। ब्रोजेन सेन ने ही उनका नाम बुटलिन अंतरराष्ट्रीय क्रॉस चैनल स्विमिंग में दर्ज करवाया। आरती देशबंधु पार्क के तालाब में घंटों तैराकी करतीं। वह अब 16-16 घंटे बिना थके स्विमिंग कर सकती थीं।

तस्वीर साभार: Times of India

चुनौतियों से भरा पानी

‘स्विमिंग का माउंट एवेरेस्ट’ कहलाने वाले इंग्लिश चैनल को पार करना कोई सामान्य बात नहीं है। 27 अगस्त 1959 को 58 प्रतिभागियों के साथ आरती ने ‘बुटलिन अंतरराष्ट्रीय क्रॉस चैनल स्विमिंग रेस’ में हिस्सा लिया। सब खिलाड़ी फ्रांसीसी तट पर रेस शरू करने को उत्सुक थे। दुर्भाग्यवश आरती की ‘पायलट बोट’ 40 मिनिट देर से पहुंची इसलिए आरती को बहुमूल्य समय और उपयुक्त परिस्थितियों से हाथ धोना पड़ गया और इंग्लैंड के तट पर पहुंचने से महज दो किलोमीटर पहले एक तेज़ लहर के कारण वह आगे नहीं तैर पाईं।

आरती साहा पर जारी किया गया डाक टिकट

इन विपरीत परिस्थितियों में भी आरती ने अपना धैर्य नहीं छोड़ा। वह और मेहनत लगाकर अभ्यास करतीं। कुछ एक महीने बाद ही, 29 सिंतबर 1959 को ही उन्होंने अपना दूसरा प्रयास किया। 16 घंटे 20 मिनट लगातार तैराकी करके, फ़्रांस से इंग्लैंड के तट के बीच 42 माइल्स पार करके आरती साहा ने वह कीर्तिमान स्थापित किया जो कि किसी भी एशियाई महिला ने हासिल नहीं किया था। उन्होंने शान से इंग्लैंड के तट पर तिरंगा फहराया। इस समय वह महज़ 19 साल की थीं। आरती के इंग्लिश चैनल पार करते ही पूरे भारत में खुशी की लहर दौड़ गई। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी व्यक्तिगत तौर पर आरती को बधाई दी। 30 सितंबर को आकाशवाणी पर आरती के कारनामों का समाचार भारतवासियों को दिया गया। 1960 में आरती साहा को पद्मश्री से नवाज़ा गया। इसके साथ ही उन्होंने एक और इतिहास रच दिया। वह पद्मश्री पाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी थीं। 

23 अगस्त 1994 को 53 साल की उम्र में पीलिया के कारण उनका स्वर्गवास हो गया। साल 1998 में उनके सम्मान में डाक टिकिट भी निकला गया। 24 सितंबर 2020 को गूगल ने अपने डूडल के माध्यम से हिंदुस्तानी जलपरी को श्रद्धांजलि देकर उनकी 80वीं जयंती मनाई। आरती साहा ने करोड़ों भारतीय महिलाओं को सपने देखने और उन्हें सच करने का रास्ता दिखाया। आज भी खेल क्षेत्र पुरुष प्रधान है। ऐसे में आरती साहा जैसी दिग्गजों से प्रेरणा लेकर निरंतर आगे बढ़ते रहना अनुकरणीय है।

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सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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