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15 जून 1935 को नीलिमा घोष का जन्म हुआ। नीलिमा घोष ने अपने जीवन के शुरुआती साल प्रशिक्षण और एक अनुभवी एथलीट बनने में बिताया। यह उनकी मेहनत का नतीजा ही था कि महज़ 17 साल की उम्र में उन्होंने इतिहास भी रच दिया था दिया। नीलिमा घोष और मैरी डिसूजा दोनों साथ-साथ ओलंपिक एथलीट्स के रूप में योग्यता प्राप्त करने और प्रतिस्पर्धा करने वाली पहली भारतीय महिलाएं बनी। दोनों महिलाओं ने फिनलैंड के हेलसिंकी में आयोजित साल 1952 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भाग लिया था। नीलिमा घोष ने दो स्पर्धाओं में भाग लिया, 100 मीटर स्प्रिंट और 80 मीटर दौड़ में और डीसूज़ा ने 100 मीटर दौड़ में भाग लिया था। चूंकि नीलिमा 100 मीटर रेस में डिसूज़ा से आगे थी इसलिए उन्हें ओलंपिक में प्रतिस्पर्धा करने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट माना जाता है।

नीलिमा ने 100 मीटर ट्रैक को 13.8 सेकंड में पूरा किया, हालांकि वह अगले दौर में नहीं पहुंच पाई थी। 80 मीटर हर्डल रेस में, वह विजेता से लगभग 2 सेकंड पीछे रह गई थी और घोष को कोई रैंक भी नहीं मिला था लेकिन उनकी उपस्थिति ने एक मिसाल कायम की। साल 1952 के ओलंपिक के बाद किसी अन्य शौकिया या पेशेवर खेल प्रतिस्पर्धाओं ने नीलिमा घोष ने मुकाबला नहीं किया हुआ। हालांकि इस आयोजन में भाग लेकर खासकर अपने जीवन के प्रारंभिक चरण में, उन्होंने महिला खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल और उम्मीद कायम ज़रूर कर दी थी।

50 के दशक में अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ खेल के क्षेत्र में भी महिलाओं के सामने कई चुनौतियां और बाधाएं मौजूद थी। भारत और दुनिया की सभी जगह खासकर खेल की संस्कृति और यह पूरा क्षेत्र में प्रमुख रूप से पुरुष प्रधान था। इसलिए 50 के दशक के दौरान रूढ़िवादी और पारंपरिक लैंगिक भूमिकाएं और व्यवहार में देखने को मिलती थी जिनमें से आज भी कई चीज़ें कायम हैं। वास्तव में ऐतिहासिक रूप से महिला एथलीटों को स्त्रीत्व का विरोधी माना जाता रहा है। प्रशिक्षण के अलावा व्यापक स्तर पर एक महिला के रूप में खेल से जुड़ी गतिविधियों और व्यवहारों के बारे में प्रचलित रूढ़िवादी सोच को, ऐसे पुरुष प्रधान क्षेत्र को चुनौती देने के लिए नीलिमा घोष जैसी महिलाओं की हमेशा ज़रूरत बनी रहेगी। वह नीलिमा घोष जिन्होंने बहुत सारी सामाजिक लिंग भूमिकाओं को तोड़ा और इस सोच को बदलने का काम किया कि खेल सिर्फ पुरुषों का क्षेत्र है।

50 के दशक में अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ खेल के क्षेत्र में भी महिलाओं के सामने कई चुनौतियां और बाधाएं मौजूद थी। भारत और दुनिया की सभी जगह खासकर खेल की संस्कृति और यह पूरा क्षेत्र में प्रमुख रूप से पुरुष प्रधान था।

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महिलाएं एक ओलंपिक स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती इस धारणा को और पुरानी सोच की बदलने की शुरुआत की। यहां तक ​​कि 50 के दशक में ऐसी महिलाएं थीं जिन्होंने सैन्य प्रशिक्षण और खेल आयोजनों में भाग लिया। इतिहास को पलटें तो हम पाएंगे कि महिलाओं ने भी खेल में गहरी दिलचस्पी ली है। चाहे कितनी ही बाधाएं रहीं हो जिन्होंने उनकी भागीदारी में बाधा डाली हो। ये बाधाएं आज भी मौजूद हैं जैसे, प्रोत्साहन की कमी, अवसर की कमी, धन और संसाधनों की कमी आदि। बेशक कई और भी महिलाएं सामने आ रही हैं जो प्रतियोगी खेलों में भाग ले रही हैं या दर्शकों अब उन्हें एक खिलाड़ी के रूप उन्हें देखना पसंद करते हैं।

नीलिमा घोष ने न केवल हमारे अंधेरे वर्तमान क्षण में प्रकाश लाने काम किया है बल्कि उन्होंने मजबूत और सफल भारतीय एथलीटों के लिए एक मार्ग प्रशस्त करने का भी काम भी किया है। एक विरासत के रूप में उनकी वह प्रतिस्पर्धा हमेशा जीवित रहेगी। आश्चर्यजनक रूप से 70 साल पहले मौजूद कई बाधाओं में से कई बाधाएं आज समाज में महिला खिलाड़ियों के सामने मौजूद हैं। हालांकि नीलिमा घोष जैसी कई एथलीट अब पूरी दुनिया और हमारे देश में इन बाधाओं को चुनौती देकर आगे बढ़ चुकी हैं और अन्य के लिए भी ऐसा करना संभव हो उसका रास्ता दिखा रही हैं। एथलीट आज पहले के मुकाबले बेहतर और मजबूत हो रहे हैं। उम्मीद है कि यह चलन कायम रहेगा और बढ़ेगा। 

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