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शुरुआती दौर में उर्दू ज़ुबान में बहुत कम लेखिकाओं ने अपनी जगह बनाई लेकिन जितनों ने इस ज़ुबान में अपनी रचनाएं लिखीं, सबने नारीवाद की मिसाल को पेश करते हुए, उर्दू साहित्य में एक अहम भूमिका निभाई है। उनमें से एक जाना-पहचाना नाम वाजिदा तबस्सुम है। वाजिदा उर्दू की अपने समय की मशहूर अफ़साना निगार शायर और कवि थी। वाजिदा की पैदाइश 16 मार्च 1935, महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले में हुई थी। अपने चुनिंदा नज़रिए, लिखावट और क्रांति विचारों के ज़रिये वाजिदा ने दुनिया में एक ख़ास पहचान बनाई है।

उर्दू विषय में अपनी पढ़ाई ओस्मानिया विश्वविद्यालय से पूरी करने के बाद, वाजिदा और उनका परिवार साल 1947 में हैदराबाद चला आया था। तबस्सुम की शादी अशफ़ाक़ अहमद से हुई थी, जिसके बाद वह मुंबई अपने बच्चों के साथ रहने लगी थी। वाजिदा ने उर्दू ज़ुबान में कहानी लिखने की शुरुआत साल 1940 से ही कर दी थी। उनके द्वारा लिखी गई कहानियां एक मासिक मैगज़ीन ‘बीसवी सदी’ में छपा करती थीं। धीरे-धीरे उनकी पहचान बननी शुरू हो चुकी थी । उनके कुछ काम पाकिस्तानी मैगज़ीन में भी आया करते थे।

वाजिदा ने बहुत कम समय में साहित्य जगत में अपना मुक़ाम बुलंद कर लिया था। तबस्सुम अपने अफ़सानों के ज़रिए समाज में प्रचलित कुरीतियों और रूढ़ीवादी प्रथाओं को अक्सर दिखाया करती थीं जिसके वजह से उन्हें, कई बार कड़ी आलोचनों का भी सामना करना पड़ता था।

वाजिदा की परवरिश हैदराबाद में होने के कारण, उन्हें वहां के माहौल का पूरा इल्म था। उनकी कहानियों में नवाबों, उनके रहन-सहन, अत्याचार और जीवन शैली का नमूना आसानी से मिल जाया करता है। वाजिदा के कुल 27 किताब प्रकाशित हुए थे। उनकी कहानियां का संकलन साल 1960 में एक किताब ‘शहर-ए-ममनु’ के नाम से छपी थी। इस किताब को उसमे अपने बचपन,अपनी ज़िंदगी और खुदने से जुड़ी कुछ और बातों का भी ज़िक्र किया है। बहुत कम लोगों को पता है कि वाजिदा परदा किया करती थीं लेकिन साथ ही साथ अपने काम से जुड़ी बातें भी खुलकर किया करती थीं। उनमें अक्सर, अपने अफ़सानों और लेखों के मद्देनज़र आत्मविश्वास देखने को मिलता था। वाजिदा ने अपनी कहानियों में औरतों के किरदारों को काफ़ी मज़बूती और नयेपन के साथ पेश किया है जो शायद कोई और ना कर सकता।

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वाजिदा ने बहुत कम समय में साहित्य जगत में अपना मुक़ाम बुलंद कर लिया था। तबस्सुम अपने अफ़सानों के ज़रिए समाज में प्रचलित कुरीतियों और रूढ़ीवादी प्रथाओं को अक्सर दिखाया करती थीं जिसके वजह से उन्हें, कई बार कड़ी आलोचनों का भी सामना करना पड़ता था। उनकी कहानी ‘उतरन’ ने उन्हें कई आलोचक दिए थे। इसमें उन्होंने नवाब के घर में पली बढ़ी, एक ख़ादिमा की बेटी की दास्तां बयान की है, जो इस बात से उदास थी कि उसे अपने मालिक की बेटी की उतरन पहननी पड़ती है। हालांकि, नवाब और ख़ादिमा की बेटी एक साथ पली-बढ़ी थीं लेकिन ख़ादिमा की बेटी के भीतर एक कोना उतरन पहनने की मजबूरी से मैला हो गया था। साल 1988 में इस कहानी पर आधारित एक सीरियल भी बनाया गया था।

तबस्सुम की कहानियों ने समाज को आइना दिखाया है। शायद इसलिए अब उनकी कहानियों को भुलाया जा रहा है।

उतरन के अलावा उनकी कई कहानियां जैसे, ‘मंज़िल’, ‘शोले’, ‘ज़रा और ऊपर’, ‘जन्नती जोड़ा’, ‘धनक के रंग’, ‘ज़कात’, ‘नथ उतराई’ लोगों के बीच खूब पसंद की गईं। तबस्सुम की कहानियों ने समाज को आइना दिखाया है। शायद इसलिए अब उनकी कहानियों को भुलाया जा रहा है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक हैदराबाद के पुरानी हवेली के हुदा बुक स्टोर के मैनेजर के अनुसार उनकी किताबें पिछले कुछ सालों तक आसानी से मिल जाया करती थी लेकिन अब पढ़ने वालों की तादाद कम होने से वाजिदा की किताब पहले से आर्डर करनी पड़ती हैं।

साहित्यिक आलोचक मुजतबा हुसैन के अनुसार, इस्मत चुग़ताई के बाद वाजिदा तबस्सुम को ‘साहिब-ए-असलूब’ का ख़िताब दिया जा सकता है। हालांकि उनका यह भी कहना है कि वाजिदा ने अपनी कहानियों में अदब और तमीज़ की सीमाएं लांघी हैं। ज़ाहिर है,वाजिदा की कहानियों में औरतों के शोषण और मुस्लिम परिवेशों में औरतों की जगह साफ़ तौर पर ज़ाहिर रहती थी। साथ ही साथ उनमें चार दीवारी के अंदर होने वाले मसलों, नफसियाती और समाजी मसलों का भी ज़िक्र हुआ करता था। अफ़सानों के अलावा उन्होंने कुछ शेर, नज़्म और उद्धरण भी लिखे थे। वाजिदा तबस्सुम के तल्ख़ अंदाज़ और कुरीतियों का विरोध और उनका खुलापन समाज के कई लोगों को बुरा लगता था जिसके कारण लेखन के रास्ते में उनके सामने कई रुकावटें आया करती थीं। ख़ुद पर बेबाकी और नंगेपन का इल्ज़ाम होने के बावजूद उन्होंने अपनी क़लम को नारीवाद की दिशा में अक्सर आगे बढ़ाया है। 7 दिसंबर 2011 में हुई थी।

और पढ़ें : अंग्रेज़ी में इस लेख को पढ़ने के लिए क्लिक करें


Poet-writer with a pinch of sarcasm.

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