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हमलोग जेंडर, यौनिकता और महिला अधिकार के मुद्दे की एक ट्रेनिंग में हिस्सा ले रहे थे। वह ट्रेनिंग का तीसरा दिन था। समाजकार्य में लगे कई समाजसेवी इस ट्रेनिंग में हिस्सा ले रहे थे। उस दिन मेरी ब्रा की स्ट्रेप ब्लाउज़ से बाहर अचानक से दिखी और जैसे ही अन्य महिला प्रतिभागियों की नज़र मेरी ब्रा स्ट्रेप पर पड़ी वे तुरंत इसे अपने हाथ से ढकने लगी। ब्रा स्ट्रैप को कवर करते हुए उन्होंने मुझसे कहा, ‘ऐसे ठीक नहीं लगता है। थोड़ा ध्यान रखा करो, सबकी नज़र पड़ती है।’ उनकी यह बात मुझे आज तक याद है। ये कोई पहला वाक़या नहीं था जब मैंने ऐसी रोक-टोक का अनुभव किया था। लेकिन चूँकि ये बात मेरे साथ एक महिला अधिकार से जुड़ी ट्रेनिंग में भागीदारी कर रहे प्रतिभागियों के साथ हुई, इसलिए ये बात मेरे दिमाग़ में मानो छप-सी गई। ये अनुभव मुझे निराश करने वाला था, क्योंकि ये हमारे में समाज में मज़बूती से पैठ जमायी पितृसत्तात्मक सोच का उदाहरण था।

महिलाओं के शरीर को हमेशा से हमारे घर और पूरे समाज में एक रहस्यमयी विषय बनाया जाता रहा है। महिलाओं के लिए इज़्ज़त को गहना बताकर हर पल उनके शरीर को ढककर रखने की सलाह दी जाती है। ऐसे में जैसे ही महिला के शरीर के किसी भी अंग या उस अंग के कपड़े की झलक सामने पड़ती है तो ऐसा लगने लगता है, जैसे कोई प्रलय आ गया हो। इन कपड़ों में से एक है – ब्रा।

जी हाँ ब्रा। वही ब्रा जिसका ज़िक्र होते ही हमलोगों की नज़रें झुक जाती है। जिसकी एक मामूली-सी स्ट्रेप दिखते ही अपने घर, परिवार और आसपास के सारे इज़्ज़त के ठेकेदार उसे ढकने के लिए टूट पड़ते है। पर एक बात ये समझ नहीं आती कि इसमें इतने हैरान करने वाली क्या बात है? ब्रा का इस्तेमाल महिलाएँ अपने स्तन को ढकने के लिए करती है, जो उनके शरीर का एक हिस्सा है। जिस तरह शरीर को ढकने के लिए हमलोग साड़ी-सूट-पैंट का इस्तेमाल करते है, ठीक उसी तरह अपने शरीर के अन्य हिस्सों के लिए अलग कपड़ों का इस्तेमाल करते है, जो सामान्य कपड़े ही है।  

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कुछ समय पहले एक्ट्रेस सलोनी चोपड़ा ने सोशल मीडिया में महिला-संबंधित इन्हीं मुद्दों को केंद्रित करते हुए लिखा कि ‘जिंदगी एक ब्रा की तरह है।’ महिलाओं को अपनी सेक्सुअलटी  (यौनिकता) को लेकर और ज्यादा ओपन होने की जरूरत है। जिस भी बेतुके शख्स ने यह फैसला किया कि पुरुष बिना शर्ट के सीना ताने इधर-उधर छुट्टा घूम सकते हैं, लेकिन लड़कियां अपने ब्रा में भी नहीं नजर आ सकतीं, ऐसे लोगों ने निश्चित तौर पर स्त्री-परुष समानता और महिला अधिकारों को ठेस पहुंचाई है। 

क्या आपको पता है कि अब भी ऐसे कई लोग हैं, जिन्हें महिलाओं की ब्रा की स्ट्रेप नजर आने भर से समस्या है? लोगों को यह पसंद नहीं आता, जब आपकी टॉप से या ब्लाउज से ब्रा की शेप नजर आती है। क्या ऐसा वे अपनी मां और बहन के लिबास के पीछे भी वही देखते हैं जो उन्हें बाहर की लड़कियों में दिखता है? भाई, चुन्नी या चोली के पीछे मां या बहन भी तो होती है!

स्तन महिला शरीर से जुड़ा एक अंग है, जो प्राकृतिक और सामान्य है, इसलिए स्तन को कोई हौवा बनाने की ज़रूरत नहीं है।

मैं ऐसे बीमार लोगों से मिली हूं। आप यकीन नहीं सकते कि वे किस कदर संकरी सोच से प्रभावित हैं, जब आप उनसे पहली बार मिलते हैं। वे सामान्य ही नजर आते हैं। वे शुरुआत में आपको अच्छा महसूस कराते हैं। ये वही लोग हैं जो इन्स्टाग्राम पर बोल्ड मॉडल्स को फॉलो करते हैं और मोबाइल में पोर्न रखते हैं। वे बेहद खुले विचार वाले लोगों की तरह पेश आते हैं। ऐसे लोग आपसे फ़ेमिनिज़्म और ग्लोबल वॉर्मिंग पर बातें करते हैं। और यकीन मानिए कि वे सबसे पहले ब्रा की स्ट्रेप देख कर ही उत्तेजित हो जाते हैं। लानत है इन पर।‘

सलोनी की इस बात को पढ़ने के बाद यही लगा कि ऐसा नहीं कि इज़्ज़त का पाठ सिर्फ़ हम जैसे आमजन को ही पढ़ाया जाता है। बल्कि इसका किसी ख़ास वर्ग से कोई ताल्लुक़ नहीं है, क्योंकि बात जब समाज की बतायी इज़्ज़त की परिभाषा और इनके मानक की आती है तो सभी जगह सुर एक जैसे होते है। महिलाओं के शरीर को रहस्य बनाकर पेश करने की आदत समाज में चल रही सारी चीजों को महिलाओं के शरीर से जोड़ कर देखती और दिखाने की कोशिश करती है। हमलोग अक्सर अपने घर में, स्कूल में और आसपास में ये कहते सुनते है कि – लड़कियों को ढंग से कपड़े पहनने चाहिए। जब लड़कियों के अंग दिखेंगें तो बलात्कार और छेड़छाड़ तो होगा है। वग़ैरह-वग़ैरह। महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा में अधिकतर उनके पहनावे को ज़रूर केंद्रित किया जाता है।

स्तन महिला शरीर से जुड़ा एक अंग है, जो प्राकृतिक और सामान्य है, इसलिए स्तन को कोई हौवा बनाने की ज़रूरत नहीं है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जब हमलोग किसी चीज़ को ज़्यादा छिपाने या रहस्यमयी बनाने की कोशिश करते है तो ये हमेशा लोगों को हौवा लगने लगती है। जब महिला शरीर से जुड़ी इन चीजों को इतने असामान्य नज़र से देखा जाता है तो ये महिलाओं को और भी ज़्यादा असहज कर देता है। बहुत बार ये असहजता इतनी ज़्यादा होती है कि महिलाएँ अपने शरीर के भूगोल में ही उलझने लगती है।

हमलोग जब लैंगिक समानता और लैंगिक संवेदनशीलता की बात करते है तो ये तब तक ज़मीन से नहीं जुड़ सकता है जब तक हमलोग इसे अपनी सोच में लागू नहीं करते है। सोच के साथ-साथ इन्हें अपने व्यवहार में लाना भी इतना ही ज़रूरी है। इसलिए अगली बार से किसी की ब्रा स्ट्रेप दिखने पर आप इतने असहज मत होईए। ये अपनी पसंद-नापसंद और सहजता का सवाल है, अगर इंसान ख़ुद किसी चीज़ से असहज होगा तो वो उसे अपने अनुसार सहज कर लेगा।

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तस्वीर साभार : thehansindia

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