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‘हर शहर में एक बदनाम औरत होती है, अक्सर वह पढ़ी-लिखी प्रगल्भ तथा अपेक्षाकृत खुली हुई होती है।’ यह पंक्तियां हिंदी के प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे की कविता से ली गई हैं। यह बहुत ही सटीक तरीके से पढ़ी-लिखी औरतों के प्रति हमारे समाज की मानसिकता को बयां करती हैं। शिक्षा का अधिकार पाने के लिए औरतों ने बहुत संघर्ष किया है। पहले के बरक्स अब लोग अपनी लड़कियों को पढ़ाना चाहते हैं, उन्हें शिक्षित करना चाहते हैं लेकिन एक दायरे में रहकर। यह दायरा वह पितृसत्तात्मक रेखा है जो शिक्षित-अशिक्षित, हर औरत को अपनी मुट्ठी में बांधे रखना चाहती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए अब वह चाहते है कि हम लड़कियां, अनपढ़ रहकर नहीं, पढ़-लिखकर घर को संभालें।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 21A छह से 14 वर्ष के सभी बच्चों को पढ़ने का अधिकार देता है लेकिन यह अधिकार सबको समान तरीके से नहीं मिल पाता। लिंग के आधार पर शिक्षा के स्तर में असमानता एक बड़ी खाई है। हमारे समाज की सामाजिक संरचना पितृसत्तात्मक स्तम्भों पर टिकी है, जो स्त्रियों को कैद करके रखती है। सभी लड़कियों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि पढ़ाई-लिखाई तो होती रहेगी, पहले रसोई में रोटी पकाना सीखो। ज्यादातर परिवारों में आज भी शिक्षा के मुद्दे पर लड़कों को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि लड़की को तो शादी करके दूसरे घर जाना है, उसे पढ़ाकर क्या करेंगे?  शिक्षा का महत्व कभी भी हमारे लिए प्राथमिक नहीं रहा। जेंडर के आधार पर दो स्तरों में इतना बड़ा अंतर है कि दलित, बहुजन, आदिवासी और अन्य अल्पसंख्यक तबकों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सेवाएं आज भी एक लग्ज़री हैं, विशेषाधिकार हैं। हमारे देश में कम आय वाले, गरीब परिवार तो शिक्षा ख़ासकर उच्च शिक्षा जैसी ‘लग्ज़री’ को अपना ही नहीं पाते हैं।

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ऐसा कहा जाता है कि स्त्रियों को शिक्षा देना इसलिए नहीं शुरू किया गया था ताकि इससे उनकी अपनी निजी ज़िंदगी में बदलाव आ सके बल्कि इसलिए दिया गया ताकि वे शिक्षा ग्रहण कर ‘अच्छी पत्नियां और मां’ बन सकें।

शिक्षा के इस अधिकार को पाने के लिए औरतों को कितने संघर्षों का सामना करना पड़ा। ऐसा कहा जाता है कि स्त्रियों को शिक्षा देना इसलिए नहीं शुरू किया गया था ताकि इससे उनकी ज़िंदगी में बदलाव आ सके बल्कि शिक्षा ग्रहण कर वे अच्छी पत्नियां और मां बन सकें। यूनेस्को के मुताबिक लड़कियों में माध्यमिक शिक्षा को छोड़ने का बड़ा कारण लड़कियों की छोटी उम्र में शादी और उनका गर्भवती होना है। शिक्षा में कमी उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव डालती है। हमारे आस-पास ऐसी कितनी लड़कियां हैं, जिनकी बारहवीं क्लास के बाद ही उनके मां-बाप उनकी शादी करवा देते हैं। वजह पूछने पर जवाब मिलता है, “ज़माना बहुत ख़राब है। इससे पहले कुछ अनहोनी हो, जल्दी शादी करना ही सही है।” चूंकि हमारे समाज में महिलाओं के ख़िलाफ़ अत्याचार बढ़ रहे हैं तो इसका हल यही निकाला गया कि उनकी आज़ादी को छीन लिया जाए। लड़की के ‘हाथ से निकलने’ से पहले उसकी शादी करवा दी जाए। 

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हमारे समाज की सामाजिक संरचना पितृसत्तात्मक स्तम्भों पर टिकी है, जो स्त्रियों को कैद करके रखती है। सभी लड़कियों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि पढ़ाई-लिखाई तो होती रहेगी, पहले रसोई में रोटी पकाना सीखो।

शिक्षा न मिलने के कारण औरतों को कितनी चीज़ों से वंचित रखा जाता है यह इन्हें ख़ुद भी पता नहीं रहता। यह समाज कितनी ही बातें औरतों को अपनी सहूलियत के अनुसार सिखाता है। उन्हें यह बताते हैं कि रसोई में रहोगी और घर का काम करोगी तो सब तुम्हारी इज़्ज़त करेंगे। इसके विपरीत यदि अधिक पढ़-लिखकर सवाल-जवाब करोगी तो कोई इज़्ज़त नहीं देगा। इस तरह स्त्रियां अपनी सारी जिंदगी परिवार के लिए जी कर निकाल देती हैं और ख़ुद को समय नहीं देती।

शिक्षा से औरतें अपनी यौनिकता के प्रति जागरूक होती हैं। वे सही और गलत में अंतर करना सीख जाती हैं। वे जानती हैं कि कब वह बच्चा जनने या शादी करने के लिए तैयार हैं और कब नहीं। यूनाइटेड नेशन्स की के मुताबिक ‘स्त्री शिक्षा के बहुत फायदे हैं। इससे मातृत्व स्वास्थ्य स्वस्थ रहता है, शिशु मृत्यु दर घटती है और फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर में भी सुधार की संभावना रहती है। यदि औरतें शिक्षित होंगी तो वे एड्स जैसी बीमारियों के बारे में भी जागरूक होंगीं।’ इससे ऐसी हानिकारक बीमारियों से भी बचा जा सकता है। यौनिकता के प्रति जागरूक होना और सेक्स आदि के मुद्दे पर बात करना तो हमारे समाज में जैसे अपराध है। हमने खुद अपने घरों में अपने मां-बाप को यह कहते हुए सुना है कि घरवाले इतना भरोसा करके लड़कियों को बाहर पढ़ने भेजते हैं और बड़े शहरों में पढ़कर ये लड़कियां गलत कामों में पड़ जाती हैं। गलत कामों से उनका मतलब अपनी यौनिकता, आज़ादी के प्रति जागरूक होना है, अपने पसंद के कपड़े पहनना है, अपनी इच्छाओं को पूरा करना है। 

बहुत जगहों पर हम यह भी देखते हैं कि जहाँ औरतें पढ़-लिखकर काम करती हैं, ऑफिस जाती हैं तो काम करने की जगह पर उन्हें कई तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। बहुत जगहों पर योग्य होने के बावजूद भी उन्हें ऊंचे पदों पर प्रोमोट नहीं किया जाता क्योंकि उससे इस जगह पर काम कर रहे पुरुषों की मेल-ईगो बीच में आ जाती है। न सिर्फ़ इतना, शादी के बाद औरतें काम करेंगी या नहीं, यह फ़ैसला भी खुद औरत के हाथ में नहीं होता। अगर वह काम करने जाती भी हैं तो उन पर पचास तरीके की पाबंदियां लगाई जाती हैं और यह शर्त रखी जाती है कि दफ्तर से आकर घर का काम, खाना, बच्चे की ज़िम्मेदारी औरत की ही होगी।

हमने खुद अपने घरों में अपने मां-बाप को यह कहते हुए सुना है कि घरवाले इतना भरोसा करके लड़कियों को बाहर पढ़ने भेजते हैं और बड़े शहरों में पढ़कर ये लड़कियां गलत कामों में पड़ जाती हैं। गलत कामों से उनका मतलब अपनी यौनिकता, आज़ादी के प्रति जागरूक होना है, अपने पसंद के कपड़े पहनना है, अपनी इच्छाओं को पूरा करना है। 

समाज की पितृसत्तात्मक ‘घर चलाने’ की अवधारणा स्त्रियों के पढ़ने के अधिकार के बीच एक बहुत बड़ी रुकावट है। इस सोच के मुताबिक पुरुषों को घर से बाहर जाकर काम करके, पैसा कमाकर घर चलाना होता है, जबकि स्त्रियों को घर पर ही रह कर घर चलाना चाहिए। घर चलाने की इस नीति को चुनौती देती जो लड़कियां अच्छी शिक्षा लेकर अपने अधिकार मांगती हैं, उन्हें ‘असभ्य और बिगड़ी हुई’ का खिताब दे दिया जाता है। 

शिक्षा की बात है तो हम सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख़ का नाम कैसे भूल सकते हैं। यह हमारे देश की पहली स्त्रियों में से एक थीं जिन्होंने लड़कियों को पढ़ाया और उन्हें प्रोत्साहित किया। इन्हें रोकने के कितने प्रयास किए गए। अनेक तरह की दलीलें दी गई। यह कहा जाने लगा कि यदि महिलाएं पढ़ने लगीं तो वह हर किसी को तरह-तरह की चिट्ठियां लिखने लगेंगीं। चूंकि सावित्रीबाई फुले लड़कियों को पढ़ाती थी तो उन पर लोग गोबर और पत्थर फेंका करते थे। यह बात 19वीं शताब्दी की है। थोड़ा आगे बढ़कर नज़र घुमाएं तो साल 2012 में 15 साल की मलाला नाम की एक लड़की के सिर पर गोली दाग दी जाती है क्योंकि इसने पढ़कर सवाल करने शुरू किए। उसने अन्य लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। आज भी स्थिति कुछ बदली नहीं है। आज भी कितनी ही लड़कियों को मां-बाप सिर्फ़ इसलिए पढ़ाते हैं ताकि उनकी अच्छे घर में शादी हो जाए और वह ‘सेट’ हो जाएं। हमें इस ‘सेट’ होने की अवधारणा को बदलकर लड़कियों को पढ़ाकर, उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र करना होगा, उन्हें उनके हक़ कर बारे में जागरूक करवाना होगा, तभी वास्तव में स्त्री शिक्षा का उद्देश्य साकार हो सकेगा। 

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तस्वीर साभार : Global Giving

प्रेरणा हिंदी साहित्य की विद्यार्थी हैं। यह दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। इन्होंने अनुवाद में डिप्लोमा किया है। अनुवाद और लेखन कार्यों में रुचि रखने के इलावा इन्हें चित्रकारी भी पसंद है। नारीवाद, समलैंगिकता, भाषा, साहित्य और राजनैतिक मुद्दों में इनकी विशेष रुचि है।

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