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राइट टू एजुकेशन फोरम पॉलिसी ब्रीफ के अनुसार, भारत में एक करोड़ लड़कियां कोविड-19 महामारी के कारण माध्यमिक विद्यालय छोड़ सकती हैं। 11 से 14 साल की 16 लाख लड़कियां स्कूल से बाहर हैं। यह महामारी इन लड़कियों को कम उम्र में शादी, कम उम्र में गर्भधारण, गरीबी, तस्करी और हिंसा के जोखिम में डालकर उन्हें और अधिक प्रभावित कर सकती है। भारत में कोविड-19 महामारी के दौरान, 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के समूह में आज भी लड़कों (2.7) की तुलना में अधिक लड़कियां (3.2%) स्कूल से बाहर हैं। यह पॉलिसी ब्रीफ़ 22 जनवरी 2021 को ज़ूम प्लैटफॉर्म पर एक वेबिनार के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस और राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर जारी की गई थी। यह ब्रीफ़ भारत में महिला साक्षरता दर में भारी असमानता को दर्शाती है। इस रिपोर्ट में जुलाई 2020 में देश पांच राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, दिल्ली और असम के 3176 परिवारों पर सर्वे किया गया।

संविधान के 86वें संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा, अनुच्छेद 21-ए को भारत के संविधान में शामिल किया गया था। यह अनुच्छेद छह से चौदह वर्ष की उम्र के सभी बच्चों को मौलिक अधिकार के रूप में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करता है, जैसा कि राज्य कानून द्वारा निर्धारित कर सकता है। इसके बाद साल 2009 में राइट टू एजुकेशन (RTE) ऐक्ट पास किया गया। अनुच्छेद 21-ए और आरटीई अधिनियम 1 अप्रैल 2010 को भारत में लागू किए गए। आरटीई (बच्चों का मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार) अधिनियम 2009, जो अनुच्छेद 21-ए के तहत परिकल्पित परिणामी कानून का प्रतिनिधित्व करता है, का अर्थ है कि हर बच्चे को एक औपचारिक स्कूल में संतोषजनक और समान गुणवत्ता की पूर्णकालिक प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार है।

भारत में शिक्षा का अधिकार अधिनियम स्कूली शिक्षा के इतिहास में एक प्रमुख मोड़ था। आरटीई अधिनियम स्पष्ट करता है कि ‘अनिवार्य शिक्षा’ का अर्थ है कि उपयुक्त सरकार का दायित्व है कि वह मुफ्त प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करे और 6-14 आयु वर्ग के प्रत्येक बच्चे को अनिवार्य प्रवेश, उपस्थिति और प्रारंभिक शिक्षा पूरी करना सुनिश्चित करे। यहां ‘नि:शुल्क’ का अर्थ है कि कोई भी बच्चा किसी भी प्रकार के शुल्क या व्यय का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं होगा जो उसे प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने और पूरा करने से रोक सकता है। यह मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने और केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय और अन्य जिम्मेदारियों को साझा करने में उपयुक्त सरकारों, स्थानीय प्राधिकरण और माता-पिता के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को भी निर्दिष्ट करता है।

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आरटीई अधिनियम द्वारा स्कूली शिक्षा प्रणाली में सकारात्मक बदलाव लाए गए जिससे लड़कियों को लाभ हुआ। सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से, आरटीई अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए योजना, स्कूल तक पहुंच और समावेशन जैसी महत्वपूर्ण बाधाओं को काफी हद तक संबोधित किया गया। इससे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक दोनों स्तरों पर स्कूल में लड़कियों के नामांकन में वृद्धि हुई। इसके साथ ही राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और माध्यमिक शिक्षा के लिए लड़कियों को प्रोत्साहन की राष्ट्रीय योजना जैसी योजनाओं ने छात्रवृत्ति, सब्सिडी और प्रोत्साहन के माध्यम से लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा पर जोर दिया। साल 2014 में ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की शुरुआत के साथ लड़कियों की शिक्षा पर नए सिरे से ज़ोर दिया गया। हालांकि, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी, गंभीर क्षेत्रीय और सामाजिक समूह असमानताएं गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं।

कोविड-19 ने कैसे बढ़ाई चुनौतियां

भारत में बड़ी संख्या में बच्चे, विशेषकर लड़कियां शिक्षा के अधिकार का कोविड-19 महामारी के दौरान पूरी तरह से फायदा लेने में असमर्थ रहे हैं। यह इस महामारी के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने के उद्देश्य से किए गए वैध प्रयासों (लॉकडाउन, स्कूलों को बंद करना) का परिणाम है। प्राकृतिक आपदाओं, महामारी या नागरिक संघर्ष के कारण होने वाली आपात स्थिति लड़कों और लड़कियों दोनों को प्रभावित करती हैं। हालांकि यह लड़कियों को असमान रूप से प्रभावित करती है। लड़कियों के शैक्षिक अवसरों को सीमित करने वाले कारक अक्सर ऐसे संकट में तेज हो जाते हैं। ऐसे संकट के दौरान तस्करी और कम उम्र में शादी के रूप में आपात स्थितियों में लिंग आधारित हिंसा और यौन शोषण में वृद्धि देखी गई है।

अगर बहन और भाई दोनों की क्लास एक साथ चल रही हो और घर में एक ही मोबाइल हो तो माता-पिता अपने बेटे को मोबाइल देने पर ध्यान देते हैं। बेटी को घर के कामों में मां की मदद करने वाला भाषण सुनने को मिलता है।

प्राकृतिक आपदाओं, महामारी या नागरिक संघर्ष के कारण लड़कियों की स्कूली शिक्षा बाधित हो जाती है और उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने में समस्या होती है। भारत बाढ़, भूकंप और सूखे जैसी कई प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त है, और वहीं दूसरी ओर नागरिक संघर्ष से प्रभावित कुछ क्षेत्र भी हैं। दूरस्थ शिक्षा या ऑनलाइन शिक्षण के माध्यम के कारण छात्रों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उनमें से कई ऐसी समस्याएं हैं जिनसे वे कक्षा में हर दिन निपटते हैं। उदाहरण के तौर पर, घर पर इंटरनेट की कमी, संसाधनों की कमी, घर पर माता-पिता के समर्थन की कमी, घर में अराजकता, घर पर शेड्यूल की कमी, भोजन को लेकर अनिश्चितता, आवास को लेकर अनिश्चितता।

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ज्यादातर घरों में लड़कियों से ज्यादा लड़कों को प्राथमिकता दी जाती है। अगर बहन और भाई दोनों की क्लास एक साथ चल रही हो और घर में एक ही मोबाइल हो तो माता-पिता अपने बेटे को मोबाइल देने पर ध्यान देते हैं। बेटी को घर के कामों में मां की मदद करने वाला भाषण सुनने को मिलता है। बेटी ‘पराया धन के सिद्धांत’ ने भी इस कार्य को और गति दी है। ऐसे कई परिवारों में भी जिनके पास स्मार्टफोन नहीं हैं, उनके लिए ऑनलाइन पढ़ाने का कोई मतलब नहीं है। जिन परिवारों ने अपने पूरे जीवन में कभी स्मार्टफोन का इस्तेमाल नहीं किया है, तो वे इस पर क्लास कैसे ले सकते हैं? सरकार ने स्मार्टफोन के ज़रिए क्लास लेने का प्रावधान तो किया, लेकिन गरीब और ज़रूरतमंद परिवारों को स्मार्ट फोन मुहैया कराने की जिम्मेदारी पर ध्यान नहीं दिया। इस कारण बच्चों को अपनी पढ़ाई छोड़कर अपने माता-पिता के साथ अपनी आजीविका के लिए कमाई पर ध्यान देना पड़ा। राइट टू एजुकेशन फोरम सर्वे में शामिल 56 फीसद स्कूल जानेवाले लड़के और लड़कियां स्कूल वापस जाने को लेकर आशावान दिखें लेकिन 37 फीसद किशोर और किशोरियों ने मौजूदा समय की अनिश्चितताओं का हवाला देते हुए इस सवाल का जवाब नहीं दिया। कोविड-19 के जेंडर प्रभाव को लेकर इस रिपोर्ट की दो महत्वपूर्ण फाइडिंग्स बताती हैं कि इस महामारी के दौरान लड़कियां घर के कामों में अधिक शामिल रहीं। साथ ही स्मार्टफोन और अन्य डिवाइसेज़ तक उनकी पहुंच भी बेहद कम थी।

पॉलिसी ब्रीफ बालिका शिक्षा के महत्व के बारे में भी बात करता है। इसके अनुसार, लड़कियों को शिक्षित करने की आवश्यकता है क्योंकि यह उनका मूल अधिकार है। शिक्षा उन्हें जीवन जीने की इच्छा के प्रकार पर वास्तविक विकल्प बनाने में सक्षम बनाने के लिए उन्हें अधिक से अधिक शक्ति देने का निश्चित तरीका है। शिक्षित लड़कियों में कौशल, सूचना और आत्मविश्वास होगा जो उन्हें एक बेहतर कार्यकर्ता, नागरिक और माता-पिता बनने में मदद करता है। शिक्षा लड़कियों के जीवन को बदल देती है, वह सुरक्षित होती है, बेहतर पोषण करती है, कम भेदभाव का अनुभव करती है, अपने निर्णय खुद लेती है और अपने प्रजनन जीवन पर नियंत्रण रखती है। शिक्षा लड़कियों को अपने समुदाय और समाज में बड़े पैमाने पर नेतृत्व की भूमिका निभाने में मदद करती है।

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तस्वीर साभार : Yahoo India

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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