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फेमिनिज़म इन इंडिया अपने बेहतरीन लेखकों में से एक लेखक को हर महीने उनके योगदान का आभार जताने के लिए फीचर करता है। लेखकों के योगदान के बिना फेमिनिज़म इन इंडिया का सफ़र अधूरा होता। अगस्त की फीचर्ड राइटर ऑफ द मंथ हैं आशिका शिवांगी सिंह। आशिका ने लैंगिक हिंसा, जातिगत भेदभाव व शोषण, फिल्म और कला जैसे मुद्दों पर कई बेहतरीन लेख लिखे हैं। मेरी कहानी : ‘जब दिल्ली पढ़ने आई एक लड़की को अपनी जाति छिपानी पड़ी’, ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ जिसने भारत की जाति व्यवस्था की परतें उधेड़कर रख दी, दलित महिलाएं, सवर्ण महिलाओं के मुकाबले कम क्यों जीती हैं? उनके कुछ बेहतरीन लेख में शामिल हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया : अपने बारे में हमें बताएं और आप क्या करती हैं?

आशिका शिवांगी सिंह : मुझसे अब तक जहां, जिस भी तरह से सवाल किए गए, यह उन सभी में से सबसे पेचीदा सवाल है क्योंकि मुझे अपने बारे में बताना है। अपने बारे में बताने पर यह सवाल भी दिमाग में कौंधता है कि अपने बारे में क्या बताया जाए और क्या नहीं। क्योंकि मैंने राजनैतिक सामाजिक मुद्दों पर लेख लिखे हैं तब मैं उसी परिपेक्ष में अपने बारे में बताती हूं क्योंकि मेरा परिवार पॉलिटिकली अवेयर परिवार रहा है इसीलिए सामाजिक ढांचे में मेरी लोकेशन एक दलित लड़की के तौर पर है। यह मुझे 12-13 साल की उम्र से स्पष्ट है। मैं साहित्य में रुचि रखने वाली लड़की हूं, कविताएं लिखती हूं, इसी 12-13 साल की उम्र से कविताएं लिखना शुरू हुआ जिसके बाद सामाजिक विषय का इस्फेयर बढ़ता गया और अब ये नया जानने सीखने के साथ बढ़ता रहेगा। यही कारण है कि मैं हर रोज एंटी कास्ट और फेमिनिस्ट होते रहने की प्रक्रिया में खुद को डाले रखती हूं। बहुत लोग इस चीज को एक पक्षीय या बायस्ड होना कहते हैं तब मैं यह भी साफ तौर से कहूंगी कि मैं निष्पक्ष नहीं हूं, निष्पक्षता मेरे लिए बहुत बेहतर कॉन्सेप्ट नहीं है। मैं इस समाज के शोषित वर्ग के पक्ष में हूं, मैं उनके साथ खड़ी हूं और उनके खिलाफ जो खड़ा है मैं उसके खिलाफ हूं। इसीलिए मेरा लेखन भी चाहे साहित्यिक हो, सामाजिक राजनीतिक हो, शोषितों के अधिकारों के पक्ष में है। भौगोलिक स्थिति की बात की जाए तो उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर से हूं। बारहवीं तक यहीं के स्कूलों में पढ़ी। बारहवीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाना हुआ और इस वक्त दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूं। यह मेरे स्नातक का तीसरा वर्ष चल रहा है।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आप फेमिनिज़म इन इंडिया से बतौर लेखक कैसे जुड़ीं?

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आशिका शिवांगी सिंह : सोशल मीडिया पर फेमिनिजम इन इंडिया को बहुत समय से फॉलो कर रही थी लेकिन इसमें इंटर्नशिप भी कर सकते हैं यह बात मुझे पिछले साल मेरी दोस्त ने बताई जो खुद इस वक्त फेमिनिजम इन इंडिया में कंट्रीब्यूटिंग राइटर है। पिछले साल मैं जब तक इंटर्नशिप के लिए आवेदन भरती कि बैच में शामिल होने की डेडलाइन निकल चुकी थी। फिर इस साल मई के बैच की इंटर्नशिप में आवेदन किया। आवेदन को स्वीकृति मिली और तीन महीने तक इंटर्नशिप चली। इंटर्नशिप के खत्म होते के साथ बतौर गेस्ट राइटर लिखने का ऑप्शन दिया गया और अब मैं फेमिनिजम इन इंडिया में बतौर लेखक लेख लिख रही हूं जिससे बहुत कुछ सीख रही हूं और एक अच्छा अनुभव मेरे जीवन में शामिल हो रहा है।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आप कब और कैसे एक नारीवादी बनीं? नारीवाद से जुड़े कौन से मुद्दे आपके बेहद करीब हैं?

आशिका शिवांगी सिंह : मैंने नारीवाद एक विषय के तौर पर कॉलेज में आकर ही पढ़ा। लेकिन जब पढ़ा, जाना तो ये भी समझ आया कि नारीवाद को किसी जड़ परिभाषा में बांधा नहीं जा सकता। ये व्यापक है और हर महिला इसे अपनी तरह से अपने जीवन में शामिल करती है चाहे वो इसे एकेडमिक रूप से न ही जानती हो। अब मुझे ये एकेडमिक तौर पर भी मालूम है लेकिन जब मालूम नहीं था तब जिन विषय को लेकर दिमाग में और आसपास भी हलचल कर रही थी मसलन मर्द घर में झाड़ू लगा ले तो ये सामान्य बात ही है, औरत घूंघट न करे तो इसमें किसी की इज्जत जाना जैसी कोई बात नहीं है, जब मैं घर की छोटी बड़ी लड़ाइयों में महिलाओं के पक्ष में थी, किसी भी लड़की के लिए अपशब्द न कहे जाएं की पैरवी कर रही थी तब दरअसल मैं नारीवादी ही बन रही थी। मेरी नजर में ये एक प्रक्रिया है जिसमें हर रोज खुद को डालना है, प्रैक्टिस करना है। इसीलिए मैं यह स्पष्ट नहीं कर पाऊंगी कि किस विशेष अवसर या वक्त पर मैं नारीवादी बनी। मैं खुद को जिन मुद्दों से जुड़ा पाती हूं उन्हीं नारीवादी मुद्दों को अपने करीब पाती हूं जैसे नारीवाद में कास्ट और क्लास का इंटरसेक्शन, आर्ट, आंदोलन, साहित्य, राजनीति, सिनेमा।

फेमिनिज़म इन इंडिया : हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित आपके लेखों में से कौन सा लेख आपको सबसे अधिक पसंद है?

आशिका शिवांगी सिंह : फेमिनिजम इन इंडिया में 20 से ज्यादा लेख अब तक लिखे हैं, सभी लेखों के विषय मेरे करीब हैं, सभी पर रिसर्च किया, मेहनत की तो बहुत मुश्किल जरूर हो रही है कि अपने ही लिखे लेखों में से कोई एक पसंदीदा लेख बताना है। फिर भी सभी को ध्यान में रखते हुए, जो लेख सबसे पहले याद आ रहा है वो है जिसमें मैंने ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा जूठन का रिव्यू किया है। इस लेख को लिखने के कुछ ही हफ्तों पहले मैने जूठन के दोनों भाग पढ़कर खत्म किए थे। इसे पढ़ना तमाम सवालों, जाति की क्रूरतम सच्चाइयों को जानते हुए भावनाओं के भंवर से होकर गुजरने जैसा है, जहां एक पन्ना पढ़कर, शून्य में जाने से खुद को बचाना होता है लेकिन संवेदनाएं कि फूटने को आतुर रहती हैं। यह शायद अतिशयोक्ति लगे लेकिन सच है कि इस लेख को लिखने में मुझे पांच घंटे का वक्त लगा था क्योंकि उसको लिखना वापस पूरे भंवर से गुजरना था। मैं जूठन को इंसान की संवेदनाएं परखने का लिटमस टेस्ट कृति कहती हूं, उसे पढ़कर संवेदनाएं और सवाल न फूटे तो मेरी नज़र में इंसानी तौर पर खुद में बेहतरी की जरूरत है।

फेमिनिज़म इन इंडिया : जब आप नारीवादी मुद्दों, जेंडर, सामाजिक न्याय पर नहीं लिख रही होती तब आप क्या करती हैं?

आशिका शिवांगी सिंह : जब मैं नारीवादी मुद्दों, सामाजिक न्याय, जेंडर पर नहीं लिख रही होती हूं तब मैं अपनी पसंद के काम करती हूं ताकि दिमाग की उथल-पुथल कुछ देर शांत रहे। मुझे काफ़ी चीजों का शौक है। मेरी छोटी-सी सफेद पन्नों की डायरी है जिसमें मुझे छोटी छोटी पेंटिंग्स और स्केच बनाना पसंद है, साहित्य में भी कविताएं पढ़ना ज्यादा पसंद है सो कविताएं पढ़कर खुद के लिए ही रिकॉर्ड भी करती हूं, गाने सुनना और सुनाना पसंद है जिसमें मुझे रेट्रो, रेज म्यूजिक और भीम गीत सुनना पसंद हैं। हिंदी कैलीग्राफी भी करती हूं, और एक काम ये भी है कि जब आस पास की स्थितियां कुछ ज्यादा ही उदासी मेरे अंदर भरती हैं तब मैं शांत होकर अपनी डायरी में चस्पा बाबा साहब अम्बेडकर की तस्वीर को देखती हूं। यही कुछ चीजें हैं जो पसंद हैं और उदासी में शांति भरने का काम करती हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपको फेमिनिज़म इन इंडिया और हमारे काम के बारे में क्या पसंद है? आप हमसे और किन-किन चीज़ों की उम्मीद करती हैं?

आशिका शिवांगी सिंह : मुझे फेमिनिजम इन इंडिया में भी हिंदी टीम का काम खासा पसंद है। लेखों के विषयों का चुनाव और उन्हें तकरीबन हर डाइमेंशन से लेकर लिखा जाना सुनिश्चित करना एक ऐसा काम है जो अच्छा है जिसमें वे सुधार का स्पेस भी लेकर चलते हैं। मुझे उम्मीद है कि आप ऐसे ही काम करते रहेंगे, समावेशी होने के दायरे को बढ़ाते हुए दलित, बहुजन, आदिवासी महिलाओं एवं क्वियर समुदाय का प्रतिनिधित्व बढ़ाते हुए सुनिश्चित करेंगे। आपको शुभकामनाएं।

(फेमिनिज़म इन इंडिया आशिका का उनके योगदान और उनके बेहतरीन लेखन के लिए आभार व्यक्त करता है। हमें बेहद खुशी है कि वह हमारी लेखकों में से एक हैं। आप आशिका को ट्विटर और इंस्टाग्राम पर फॉलो कर सकते हैं.)

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