इंटरसेक्शनलजेंडर इन पांच उदाहरणों से समझिए क्या है आतंरिक स्त्रीद्वेष

इन पांच उदाहरणों से समझिए क्या है आतंरिक स्त्रीद्वेष

आसान शब्दों में हम अगर कहें तो वो पूर्वाग्रह जो एक महिला खुद पर और दूसरी महिलाओं पर थोपती है उसे आंतरिक स्त्रीद्वेष कहते हैं। इसका आधार भी पितृसत्ता ही है।

“औरतें ही औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं, मैं दूसरी लड़कियों की तरह नहीं हूं, मैं ये फेमिनिस्ट टाइप नहीं हूं, मैं तो सिर्फ बराबरी में भरोसा करती हूं, ये मेकअप लगाने वाली लड़कियां कितनी अजीब होती हैं न।” ये सभी उदाहरण आंतरिक स्त्रीद्वेष का ही हिस्सा हैं। आसान शब्दों में हम अगर कहें तो वो पूर्वाग्रह जो एक महिला खुद पर और दूसरी महिलाओं पर थोपती है उसे आंतरिक स्त्रीद्वेष कहते हैं। इसका आधार भी पितृसत्ता ही है। पितृसत्ता ने इसी आंतरिक स्त्रीद्वेष को अपनी ढाल बनाकर एक नया नैरेटिव पेश किया कि औरत ही औरत की दुश्मन है। आतंरिक स्त्रीद्वेष कैसे महिलाओं को दूसरी महिलाओं के ख़िलाफ़ खड़ा करता है इसे हम अलग-अलग उदाहरणों के ज़रिए इस लेख में समझने की कोशिश करते हैं।

1- ‘मर्द हमेशा मर्द ही रहेंगे’ 

हम यही सुनते हुए तो बड़े हुए हैं न कि मर्द हमेशा मर्द ही रहेंगे, उनसे बदलने की उम्मीद करने की जगह औरतों को ही खुद में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। एक औरत के जीवन की शुरुआत ही पितृसत्तात्मक समाज के बनाए गए इस ढांचे में होती है। इस ढांचे में अक्सर महिलाओं को यह घुट्टी पिलाकर बड़ा किया जाता है कि उनका जेंडर पुरुषों के मुकाबले हीन है, पुरुष उनसे हर मामले में बेहतर हैं। जैसे औरतों का यह कहना, “मैं लड़की हूं मैं फाइनेंस कैसे पढ़ सकती हूं, मेरे होते हुए मेरा पति क्यों खाना बनाएगा या बच्चे पालना तो एक मां का धर्म है।” खुद को कमतर मानना, अपने जेंडर के लिए पूर्वाग्रह रखना या पितृसत्तात्मक समाज द्वारा बनाई गई रूढ़ियों को आगे बढ़ाना और दूसरी औरतों पर भी इन्हें थोपना आतंरिक स्त्रीद्वेष है। इन पूर्वाग्रहों को अनलर्न यानि भूलने में वक्त लगता है। इसलिए स्त्रीद्वेष हमारे समाज में बहुत ही सामान्य है। आपने अक्सर कई औरतों, लड़कियों को इस बात की शिकायत करते हुए सुना होगा कि उनके घर की औरतें ही पितृसत्तात्मक मूल्यों को बढ़ावा देती हैं। यहां हम सीधा औरतों को गलत तो ठहरा देते हैं लेकिन इसके पीछे काम कर रहे पितृसत्ता के पावर के डायनैमिक्स को नहीं समझते।

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2- स्त्रीत्व को कमज़ोरी मानना

अक्सर स्त्रीत्व को कमतर आंका जाता है, इसे कमज़ोरी का पर्याय माना जाता है। इसलिए कई बार औरतें खुद भी स्त्रीत्व को कमतर आकंते हुए इससे दूरी बनाती हैं। इसी आधार पर कई बार क्वीर समुदाय को भी उनके पहनावे, उनके व्यवहार के लिए शर्मिंदा किया जाता है, जज किया जाता है। उदाहरण के तौर पर जब यह कहा जाता है कि क्या लड़कियों की तरह तैयार होने में इतनी देर लगा रहे, या क्यों लड़कियों की तरह रो रहे या कपड़े पहन रखे हैं। ये उदाहरण हमारे रोज़मर्रा के जीवन से ही लिए गए हैं जहां हर दिन स्त्री होने को कमज़ोर होने का पर्याय बताया जाता है लेकिन ये मापदंड तय किसने किए, पितृसत्ता के जेंडर नॉर्म्स ने ही। किसी का पहनावा, व्यवहार या आचरण कैसा हो ये उस व्यक्ति का निजी फैसला होना चाहिए न कि पितृसत्ता द्वारा बनाए गए मापदंड के आधार पर इसे तय किया जाना चाहिए।

आसान शब्दों में हम अगर कहें तो वो पूर्वाग्रह जो एक महिला खुद पर और दूसरी महिलाओं पर थोपती है उसे आंतरिक स्त्रीद्वेष कहते हैं। इसका आधार भी पितृसत्ता ही है।

3- नारीवाद को खारिज करना

अक्सर हमारी मुलाकात उन चंद औरतों से ज़रूर होती है जो नारीवाद को खारिज करती हैं, जिनकी पसंदीदा लाइन होती है कि वे बराबरी में विश्वास तो करती हैं लेकिन वे नारीवादी नहीं हैं या फिर उनके पास पढ़ने-लिखने, बाहर जाने और काम करने की आज़ादी है इसलिए उन्हें जेंडर के आधार पर होनेवाली गैर-बराबरी नहीं नज़र आती है। जब ये बातें औरतें कहती हैं तो इसमें से झलकता है प्रिविलेज यानि उनका विशेषाधिकार। सिर्फ इसलिए कि एक ख़ास तबके को पढ़ने, बाहर जाने, नौकरी करने का अधिकार मिला इसका मतलब ये तो नहीं कि हमारे देश या दुनिया की सारी महिलाओं को भी वे सभी अधिकार मिल गए जिनकी वे हकदार हैं। आज भी जाति, लिंग, वर्ग, यौनिकता, विकलांगता के आधार पर भेदभाव बदस्तूर जारी है। अगर सबकुछ आसान होता तो हाथरस में दलित गैंगरेप सर्वाइवर के साथ इतना क्रूर और अमानवीय व्यवहार सत्ता और प्रशासन द्वारा नहीं किया जाता, दलित महिलाओं के लिए न्याय तक पहुंच आसान होती। LGBTQAI+ समुदाय को अपनी पहचान के लिए हर रोज़ संघर्ष न करना पड़ता। लाखों लड़कियों को अनपेड केयरवर्क और पीरियड्स प्रॉडक्ट्स न मिलने के कारण स्कूल न छोड़ना पड़ता। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो ये बताते हैं कि जाति, वर्ग, यौनिकता, कॉन्फ्लिक्ट, विकलांगता आदि के आधार पर अनगिनत महिलाएं आज भी शोषण और गैरबराबरी का सामना कर रही हैं। अमरीकी नारीवादी लेखिका ऑड्रे लार्ड ने कहा था, “मैं तबतक आज़ाद नहीं हूं जब तक एक भी औरत कैद में है। भले ही उसकी बेड़ियां मेरी बेड़ियों से अलग हो।”

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4- ‘औरत ही औरत की दुश्मन है’

‘औरत ही औरत की दुश्मन है’ यह हमारे पितृसत्तात्मक समाज द्वारा औरतों को औरतों के खिलाफ़ खड़ा करने की सबसे पुरानी नीति है। उदाहरण के तौर पर जब भारत में #MeToo आंदोलन अपने चरम पर था, महिलाएं एक दूसरे के साथ खड़ी थी, एक दूसरे पर भरोसा कर रही थी, तब सबसे ज़्यादा परेशान ये पितृसत्तात्मक समाज ही था। आवाज़ उठानेवाली महिलाओं से लगातार सवाल किए जा रहे थे कि उन्होंने अब तक आवाज़ क्यों नहीं उठाई, वे इतने सालों तक चुप क्यों थीं। पितृसत्ता इस नीति को अपनाते हुए औरतों को औरतों के खिलाफ़ खड़ा करती है।

5-औरतों को चरित्र का प्रमाणपत्र बांटना या स्लट शेमिंग

स्लट शेमिंग भी आतंरिक स्त्रीद्वेष का एक बड़ा हिस्सा है जहां औरतें दूसरी औरतों को उनकी सेक्सुअल चॉइस, कपड़े पहनने के ढंग और खुले व्यवहार के लिए शर्मिंदा करती हैं। जाति, वर्ग, यौनिकता, यहां तक कि उनके पेशे के आधार पर भी अक्सर महिलाओं को शर्मिंदा किया जाता रहा है। स्लट शेमिंग की बुनियाद भी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की सोच से उपजी ‘शुद्धता’ ही है, जहां अक्सर ऊंची जाति की महिलाएं अन्य महिलाओं को इसी दकियानूसी शुद्धता की सोच के आधार पर स्लट शेम करती हैं।लेकिन जब मर्द ऐसा करते हैं तो उन्हें सेलिब्रेट किया जाता है।

ये तो सिर्फ पांच उदाहरण थे। ऐसे कई मौके आते हैं जहां महिलाएं खुद आतंरिक स्त्रीद्वेष का हिस्सा बन जाती हैं। आतंरिक स्त्रीद्वेष महिलाओं के बीच एक मुकाबला करवाता है, कई बार ये मुकाबले बेहद टॉक्सिक होते हैं और यह मुकाबला अक्सर मर्दों की स्वीकृति के लिए होता है। हालांकि ध्यान रहे कि इस प्रतियोगिता का जज पितृसत्ता ही है। इसलिए जब भी आप इसका हिस्सा बनें तो याद रखें कि ऐसा करके आप दूसरी औरतों को ही नहीं बल्कि खुद को भी पितृसत्ता के सामने कमतर दिखा रही हैं।

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About the author(s)

Ritika is the Managing Editor at Feminism in India (Hindi). Ritika is an award-winning multimedia journalist with over five years of experience. She is a passionate advocate for social justice and gender rights, and has been awarded the prestigious UN Laadli Media Awards twice and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing and reporting. She is also a fellow of Rise Up (Youth Championship Initiative).

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