समाजकानून और नीति सम्पत्ति में बेटी को अधिकार देने का संघर्ष या समाज का फ़ेलियर| नारीवादी चश्मा

सम्पत्ति में बेटी को अधिकार देने का संघर्ष या समाज का फ़ेलियर| नारीवादी चश्मा

ये अपने समाज की कड़वी सच्चाई है कि महिला अधिकारों की लंबी लड़ाई के बाद महिलाओं को मिले अधिकारों को आजतक हम सरोकार से नहीं जोड़ पाए।

बनारस शहर में रहने वाले महेश कुमार (बदला हुआ नाम) सरकारी विभाग में ऊँचे पद पर कार्यरत है। दो बच्चे (एक बेटा और एक बेटी) और पत्नी के छोटे से परिवार वाले महेश कुमार ने यों तो कभी भी बेटा-बेटी की परवरिश में कोई फ़र्क़ नहीं किया। दोनों को शिक्षा और विकास के समान अवसर उपलब्ध करवाए, लेकिन सामाजिक परिवेश ने हमेशा से बेटे को समाज में पितृसत्ता के बताए मर्द और उत्तराधिकार के नियमों के लबरेज़ व्यक्तित्व के रूप में तैयार किया। महेश कुमार और उनकी पत्नी दोनों ही खुले विचारों के है, उन्होंने कभी भी समाज के बनाए नियमों को नहीं माना और बेटा-बेटी को समान अधिकार दिया। बेटी की शादी में खर्च की बजाय उसे सम्पत्ति का अधिकार दिया।

पर दुर्भाग्यवश आज महेश और उनकी पत्नी बेटी को उसका सम्पत्ति का अधिकार देने की क़ीमत हर दिन चुका रहे है, उनके हर रोज़ अपने बेटे-बहु के मानसिक और सामाजिक अत्याचारों को सहना पड़ रहा है। बहु लगातार उनपर अपनी बाक़ी की सम्पत्ति अपने नाम करवाने के लिए दबाव बना रही है और ऐसा न करने पर उनपर दहेज और घरेलू हिंसा क़ानून के तहत मुक़दमा दर्ज करवाने की धमकी दे रही है। चूँकि महेश अभी भी सरकारी विभाग के ऊँचे ओहदे के अफ़सर है, साथ ही, उनकी और उनके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा भी है, जिसकी वजह से वे हर दिन कोर्ट-कचहरी के चक्कर से बचने के लिए इसकी क़ीमत अदा करने को मजबूर है। हर दिन ढलती उम्र के साथ उनका मनोबल कमजोर पड़ता जा रहा है और इस दौर में बहु-बेटे का ये दबाव उन्हें मानसिक और सामाजिक स्तर पर लगातार प्रभावित कर रहा है।

भारतीय संविधान में हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) नियम 2005 के अंतर्गत हिन्दू, सिक्ख,बौद्ध और जैन बेटियों का पारिवारिक सम्पत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना बेटों का। इसके अलावा संयुक्त परिवार में भी सम्पत्ति पर बेटियों के बेटों के बराबर के अधिकार हैं। साल 2005 के पहले  शादीशुदा महिलाओं का अपने मायके में (कानूनी रूप से) निवास अधिकार भी नहीं था। क़ानून भी महिलाओं का असल घर ससुराल को ही मानता था। पर साल 2005 में इसको बदला गया और शादी के बाद भी बेटियों को मायके की संपत्ति पर बराबर के अधिकार दिए गए। 

और पढ़ें : पितृसत्ता और लैंगिक भेदभाव की गहरी जड़ें दिखाती ‘सिटी ऑफ़ ड्रीम्स’| नारीवादी चश्मा

माँ के घर वापस जाने का यह अधिकार विवाह में घरेलू हिंसा से शोषित औरतों के लिए राहत के  रूप में आया। बीना अग्रवाल (जिनके नेतृत्व में 2005 में क़ानून बदलने का अभियान चला) ने केरल में एक शोध किया जिसमें यह सामने आया कि सम्पत्तिहीन महिलाओं में 49 फ़ीसद महिलाएं  घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं और सम्पत्तिवान महिलाओं में ये आंकड़ा सिर्फ़ 6 फ़ीसद है। इससे यह साबित होता है कि संपत्ति पर अधिकार न केवल महिलाओं को एक अपमानजनक और हिंसात्मक  विवाह छोड़ने का विकल्प देता है पर उनपर होती हिंसा पर रोक भी लगाता है।

ये अपने समाज की कड़वी सच्चाई है कि महिला अधिकारों की लंबी लड़ाई के बाद महिलाओं को मिले अधिकारों को आजतक हम सरोकार से नहीं जोड़ पाए।

सम्पत्ति पर बेटियों के अधिकार बेशक महिलाओं को मज़बूती देता है। पर जब बात इसे लागू करने, सरोकर से जोड़ने की आती है तो हम एक गहरी खाई देखते है। अधिकतर जगहों में शादी के खर्च के नामपर बेटियों को पूरी तरह सम्पत्ति से दूर कर दिया जाता है। पर बदलाव और आधुनिकीकरण के इस दौर में जब कुछ परिवार अपनी बेटी के भविष्य को मज़बूत करने की दिशा में कदम आगे बढ़ाते है तो कई बार समाज और उनका परिवार ही उनके लिए सबसे बड़ा रोड़ा बनने लगता है। महेश कुमार अपने परिवार में महिला अधिकार के दो सिरे के बीच में है, उन्होंने एक तरफ़ अपनी बेटी के  सम्पत्ति के अधिकार को सुनिश्चित किया, जिससे उसका भविष्य सुरक्षित हो सके। लेकिन दूसरी तरफ़ महिला हिंसा के क़ानून के दबाव में उनका परिवार बहु और बेटे के अत्याचारों को सहने के लिए मजबूर है।

महेश कुमार जैसे कई परिवार है, जो बेटियों के सम्पत्ति का अधिकार सुनिश्चित करने के बाद समाज और परिवार के दबाव झेलते है, जो लड़ पाते है वे लड़ते है पर ज़्यादातर हार जाते है। क्योंकि ये अपने समाज की कड़वी सच्चाई है कि महिला अधिकारों की लंबी लड़ाई के बाद महिलाओं को मिले अधिकारों को आजतक हम सरोकार से नहीं जोड़ पाए, क्योंकि हमने न्याय व्यवस्था और क़ानूनी धाराओं में बदलाव के लिए तो बहुत ज़ोर लगाया और काफ़ी हद तक कामयाब भी हुए लेकिन इसे समाज से जोड़ने की दिशा में हमारा प्रयास आज भी विफल है।

हमें समझना होगा कि आज जब हम सोशल मीडिया और महिला अधिकार के भाषणों में जब बेटी के सम्पत्ति के अधिकार की बात करते है, ठीक उसी समय महेश कुमार जैसे परिवार उसे अपने परिवार लागू कर रहे होते है। लेकिन जब ऐसे में परिवार में विवाद इन्हीं अधिकारों के आधार पर होने लगते है तो महेश कुमार के परिवार का कमजोर पड़ता मनोबल आसपास के लोगों और समाज को सीधेतौर पर प्रभावित करता है, जिससे लोग बेटियों को सम्पत्ति का अधिकार चाहते हुए भी न देने को मजबूर होने लगते है। हमें सोचना होगा कि अपनी बेटियों को सम्पत्ति में अधिकार देने वाले माता-पिता का संघर्ष कहीं हमारे समाज का फ़ेलियर तो नहीं ?  

और पढ़ें : शादी ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिष्ठा का सवाल है| नारीवादी चश्मा


तस्वीर साभार : indiatoday

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content