इंटरसेक्शनलLGBTQIA+ क्वीयर बच्चों पर एडवर्स चाइल्डहूड एक्सपीरियंस का असर

क्वीयर बच्चों पर एडवर्स चाइल्डहूड एक्सपीरियंस का असर

अधिकतर क्वीयर बच्चे जेंडर के सामाजिक दायरों में फिट नहीं बैठते जिसके कारण वे ना केवल घर और बाहर तमाम तरह की हिंसाएं झेलते हैं बल्कि वे किसी से इस बारे में बात भी नहीं कर सकते हैं।

नडिन बर्क हैरिस अपनी किताब ‘द डीपेस्ट वेल‘ में बताती हैं कि कैसे स्वास्थ्य से जुड़े रिस्क फैक्टर्स में एडवर्स चाइल्डहूड एक्सपीरियंस (एस/ ACE) एक बड़ा योगदान देने के बाद भी डॉक्टरों के रडार पर नहीं आते। हैरिस के अनुसार चार या उससे अधिक एस वाले व्यक्तियों में हार्ट अटैक, कैंसर और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े तमाम तरह के खतरे कई गुना बढ़ जाते हैं।

एडवर्स चाइल्डहूड एक्स्पिरियेंस क्या है?

अमेरिका के कैसर परमानेंट मेडिकल एयर प्रोग्राम में शोधकर्ताओं ने नेशनल सेंटर फ़ॉर क्रॉनिक डीज़िज़ प्रीवेंशन एंड हेल्थ प्रोमोशन के साथ मिलकर 17,000 लोगों पर किए गए एक शोध में बताया कि बचपन के रिस्क फ़ैक्टर (शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा, लापरवाही, घरेलू हिंसा या किसी करीबी की मानसिक बिमारी, उनका जेल जाना या नशा करना आदि) वयस्क रोगों से जुड़े हुए हैं। ये अनुभव एडवर्स चाइल्डहूड एक्स्पिरियेंस (एस/ ACE) कहलाते हैं और दस सवालों के आधार पर इनका स्कोर तय होता है। ये अनुभव कई तरह से मानसिक और शारीरिक विकास को प्रभावित करते हैं।

नेशनल कमीशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइटस द्वारा साल 2012 में किए गए एक सर्वे के अनुसार 99 फ़ीसद बच्चों के साथ स्कूलों में अध्यापक शारीरिक और मानसिक हिंसा करते हैं। वहीं, इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर रीसर्च ऑन वीमेन के अनुसार 45 फ़ीसद बच्चों (लड़कों) के माता-पिता ने उनके साथ शारीरिक हिंसा की है। इसके अलावा बच्चों के साथ हुए यौन हिंसा के मामलों में 94.6 फ़ीसद बच्चे दोषी को जानते थे, जबकि 53.7 फ़ीसद मामलों में दोषी परिवार के सदस्य थे। इसके अलावा संघर्ष क्षेत्रों, जेलों और कार्यस्थलों में भी बच्चों के साथ तमाम हिंसाएं होती हैं।

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ऐसी हिंसाओं का असर बच्चों के शरीर पर कैसे होता है इसे समझाने के लिए हैरिस बताती हैं कि अगर आप किसी भालू को देखेंगे तो आप या तो भागेंगे या उससे लड़ेंगे। इस समय हमारे शरीर में कई तरह के हार्मोन घट-बढ़ रहे होंगे जिससे वो लड़ने या भागने में सक्षम होगा। ये शरीर का किसी भी समस्या के लिए खुद को तैयार करने का सामान्य तरीका है। भालू के चले जाने के बाद आपके हार्मोन स्तर सामान्य हो जाएंगे। लेकिन मान लीजिए आप किसी जंगल में रहते हो और तमाम तरह के भालूओं से घिरे हुए हो। ऐसे में आपका शरीर हमेशा भागने या लड़ने के लिए तैयार रहेगा, जिसके लिए वो लगातार सामान्य से अधिक हार्मोन तैयार करेगा। अब अगर आप जंगल से चले भी जाएं तो भी इन हार्मोन्स की अधिकता आगे चलकर कई समस्याओं का कारण बनेंगी।

अधिकतर क्वीयर बच्चे जेंडर के सामाजिक दायरों में फिट नहीं बैठते जिसके कारण वे ना केवल घर और बाहर तमाम तरह की हिंसाएं झेलते हैं बल्कि वे किसी से इस बारे में बात भी नहीं कर सकते हैं।

ACE क्वीयर व्यक्तियों को कैसे प्रभावित करता है?

ज़ाहिर है दिए गए आंकड़ों में क्वीयर बच्चे भी शामिल हैं जो अन्य बच्चों के मुकाबले चार गुना अधिक हिंसा झेलते हैं। अमेरिका के तीन राज्यों में हुए एक शोध के अनुसार लेस्बियन/ गे लोगों के एस स्कोर 1.7 गुना अधिक हैं जबकि बाइसेक्शुअल लोगों के स्कोर 1.6 गुना अधिक हैं। अधिकतर क्वीयर बच्चे जेंडर के सामाजिक दायरों में फिट नहीं बैठते जिसके कारण वे ना केवल घर और बाहर तमाम तरह की हिंसाएं झेलते हैं बल्कि वे किसी से इस बारे में बात भी नहीं कर सकते हैं।

हमारे देश में क्वीयर लोगों के एडवर्स चाइल्डहूड एक्सपीरियंस स्कोर पर आधारित कोई शोधकार्य नहीं हुआ है, बल्कि एस स्कोर पर ही शोध अपने शुरुआती दौर में है। ऐसे में किसी भी तरह की टिप्पणी करना ठीक नहीं है। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि अगर हम क्वीयर व्यक्तियों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए प्रतिबद्ध हैं तो हमें शोधकर्ताओं, सरकारों समेत स्वास्थ्य प्रदाताओं का ध्यान इस ओर खींचना होगा।

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हमारे पास क्या उपाय हैं?

हैरिस बताती हैं कि एस स्क्रीनिंग अगर सभी तरह के स्वास्थ्य चेक अप्स का हिस्सा बने तो हम ना केवल जागरूक हो सकते हैं बल्कि इन समस्याओं से निपटने के लिए तैयार भी हो सकेंगे। ज़ाहिर है भारत जैसे देश में इस तरह के स्क्रीनिंग प्रैक्टिस को लागू करना आसान नहीं है, खासतौर पर ऐसे समय में जब स्वास्थ्य सुविधाओं का निजीकरण अपने ज़ोर पर है। ऐसे में क्वीयर व्यक्तियों को अन्य समूहों के साथ मिलकर एस स्कोर को स्वास्थ्य चेकअप्स में शामिल करने के साथ ही सभी तरह की स्वास्थ्य सुविधाओं को सब तक सुचारू रूप से पहुंचाने के लिए सरकारों पर दबाव डालना होगा।

हमें यहां एक और बात समझनी होगी कि एस पीढ़ीगत होते हैं यानि अगर मां बाप के एस स्कोर अधिक हैं तो बच्चों के एस स्कोर अधिक होने की संभावना है। ऐसे में अगर हमें बच्चों के एस स्कोर कम रखने हैं तो उनके माता पिता के एस स्कोर को जानकर उनसे होने वाले खतरों के प्रति आगाह करना होगा। जहां बात क्वीयर बच्चों की आती है, उनके एस स्कोर कम रखने के लिए सभी अभिभावकों को क्वीयर अफिर्मेटिव परवरिश (बच्चों में जेंडर के आधार पर भेदभाव ना करना, जेंडर के सामाजिक नियमों से अलग व्यवहार करने पर उन्हें डांटने या मारने की बजाय उनका सहयोग करना, उनसे खुलकर क्वीयर विषयों पर सकारात्मक चर्चा करना आदि) के साथ स्कूलों में व्यापक यौनिकता शिक्षा लागू करने और खुद के थेरेपी, बेहतर स्वास्थ्य और भोजन आदि पर भी ध्यान देना होगा।

एडवर्स चाइल्डहूड एक्सपीरियंस स्कोर हमारे जीवन का सिर्फ एक हिस्सा है, जैसे ब्लड प्रेशर। इसका कम ज़्यादा होना हमारे सेहत पर असर तो डालता है लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि हम इसे अपने जीवन की बागडोर सौंप दें। अगर हम खुद के साथ हुई हिंसाओं को न तो सामान्य माने न ही उसे अपने बच्चों पर दोहराएं, अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नज़र रखें, एस स्कोर टेस्टिंग को सभी स्वास्थ्य चेक अप्स का जरूरी हिस्सा बनाने पर ज़ोर दें, अपने आस-पास ऐसे दोस्तों और लोगों को रखें जो हमें समझते हो और हमें प्यार करते हो। साथ ही हम यह समझें कि यह एक ऐसी समस्या है जिसका हमें मिलकर सामना करना होगा तो हम कई जानलेवा बीमारियों के असर को कम कर सकते हैं।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

About the author(s)

धर्मेश ने अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए किया है और वो सेफ़ एक्सेस और इंडिया फ़ेलो रह चुके हैं। वह इलाहाबाद में क्वीयर समुदाय के साथ काम कर रहे हैं।

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