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धर्मेश

हाल ही में केंद्र ने दिल्ली हाई कोर्ट में कहा है कि समलैंगिक विवाह यानि सेम सेक्स विवाह को इसलिए मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि यह भारतीय समाज की परिवार की समझ और पहचान के ख़िलाफ़ है। केंद्र सरकार के वकील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह भी कहा कि विवाह एक ‘बायोलॉजिकल’ मेल और ‘बायोलॉजिकल’ फ़ीमेल के बीच होने वाला संबंध है। यहां बायोलॉजी के नाम पर ट्रांसजेंडर विरोधी हिंसा को सामान्य करने पर ध्यान दिए जाना ज़रूरी है। ये बातें स्पेशल मैरिज एक्ट और हिन्दू मैरिज एक्ट में संशोधन को लेकर दाखिल किए गए पेटिशन के जवाब में कही गईं थीं। एक तरह से देखे तो सॉलिसिटर जनरल की बात बिल्कुल सही है। हिन्दू धर्म में शादी ना केवल स्त्री पुरुष के बीच बच्चे पैदा करने के लिए होती है बल्कि जाति की पुनरावृत्ति के लिए भी होता है। साथ ही अगर हम इसे पूंजीवादी संस्था में देखे तो इसका एक उद्देश्य पूंजी की व्यवस्था की पुनरावृत्ति भी है। इन बातों को ध्यान रखते हुए हमें यह भी सोचने की ज़रूरत है कि क्या क्वीयर समुदाय को विवाह का अधिकार देना ही लोकतंत्र और समानता की अगली सीढ़ी है?

इस सवाल पर विमर्श करने से पहले हमें शादी की मौजूदा संस्था पर भी थोड़ा विचार करने की ज़रूरत है। हमारे समाज में विवाह ना केवल पूंजी और जाति को बचाए बनाए रखने का साधन है बल्कि महिलाओं को भी पितृसत्ता के ढांचे में बांधे रखने का एक साधन है। भारतीय समाज में विवाह चूंकि अधिकतर माता-पिता की मर्ज़ी से होता है और इसमें लड़कियों की हां या ना का कोई खास मतलब नहीं होता, ये उनके साथ होने वाली कई हिंसाओं की थाती भी बनता है। चाहे वह दहेज हिंसा हो या वैवाहिक यौन हिंसा। इस महान भारतीय समाज की स्थिति ऐसी है कि यहां वैवाहिक यौन हिंसा के लिए कोई कानून भी नहीं है। अगर कानून बन भी जाए तो ऐसा नहीं है कि सब कुछ ठीक हो जाएगा क्योंकि जिस तरह की हमारी पितृसत्तात्मक पूंजीवादी जातिवादी व्यवस्था है इसमें ‘शिकायत करने वाली औरत’ के लिए कोई जगह नहीं है। कहने का मतलब यह है कि अगर कोई महिला अपने साथ हुई किसी भी तरह की हिंसा की शिकायत करती है तो परिवार से लेकर पुलिस तक और कोर्ट से लेकर पड़ोसी तक, सब उसे ही नैतिकता और परिवार संभालने का पाठ पढ़ाते हैं। इन सबके अलावा भारत में बढ़ रहे हिन्दूत्ववादी हिंसात्मक विचारों का अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक विवाहों पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है। लव जिहाद का भूत पैदा कर मुस्लिम युवकों को जेलों में भरने के नए कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। साथ ही एक लंबे समय से इस देश में संस्कृति बचाने के नाम पर कई युवा जोड़ों के साथ मार-पीट की जाती है जो फ़रवरी के महीने में अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है। तो हम समझ सकते हैं कि जिस भारतीय संस्कृति की दुहाई दी जा रही है वह कितनी विरोधाभासी और जीर्ण है।

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अब हम हिन्दू मैरिज एक्ट पर आते हैं। यह कानून सबसे पहले खुद ही एक हिन्दू हेजेमनी स्थापित करता है और सिक्ख, बौद्ध, जैन, आदिवासी (हालांकि कानून शब्दशः यह कहता है कि यह ‘अनुसूचित जनजाति’ के लोगों पर लागू नहीं होगा लेकिन आदिवासियों को हिन्दू बनाने बताने के प्रयासों के तहत ये कानून भी हथियार बनता है) आदि को खुद में समाहित करने का गैर-लोकतांत्रिक प्रयास करता है। चुंकि यह कानून ‘हिंदूओं’ पर ही लागू होता है, इसमें यदि संशोधन हुआ तो उसके बाद केवल वही लोग विवाह करने में सक्षम होंगे जो हिंदू हैं। अब सबसे पहले इस कानून के तहत याचिका दाखिल करने वालों से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्होंने पहले से ही तय कर लिया है कि वे केवल हिंदूओं से ही विवाह करेंगे और अगर हां तो क्या ये उनकी जातिवादी और हिंदूत्ववादी सोच को नहीं दर्शाता?

हमारे समाज में विवाह ना केवल पूंजी और जाति को बचाए बनाए रखने का साधन है बल्कि महिलाओं को भी पितृसत्ता के ढांचे में बांधे रखने का एक साधन है।

ये बुनियादी बातें हैं जिनके बारे में एक तरह से विचार करना जरूरी है, लेकिन हम यहां समलैंगिकता को विवाह की संस्था के जरिए वैध करार देने की कोशिश पर भी बात करना चाहेंगे। सॉलिसिटर जनरल का कहना था कि विवाह को आदमी और औरत के बीच बनाए रखने में राज्य के वैधानिक हक निहित हैं जो सही भी है। आखिर राज्य की सत्ता और वैधता इससे तय होती है कि वह किस पर काबू रख रहा है। जो इस काबू के बाहर है, जो राज्य की आलोचना करे वह राज्य के लिए अवांछित है। क्वीयर समुदाय इस देश में ऐसे ही अनेक अवांछित समुदायों में से एक है। क्वीयर होना राज्य, जेंडर, नैतिकता, समाज, धर्म, जाति सभी की सत्ता को चैलेंज करता है। लेकिन विवाह या राज्य के अन्य ‘वेलफ़ेयर स्कीमों’ के तहत आने वाले क्वीयर राज्य की हिंसाओं का साधन भी बनते हैं। इस बारे में जसबीर पौर की किताब ‘टेररिस्ट असेम्बलेजेज़: होमोनेशनलिज़्म इन क्वीयर टाइम्स’ पढ़ी जा सकती है। पौर इस किताब में दिखाती हैं कि कैसे एक खास तरह के क्वीयर (व्हाइट, सिसजेंडर, सबल शरीर के युवा) को वैध करार दिया गया जो ना केवल ‘गलत तरह से क्वीयर’ और अन्य “अवैध” (ट्रांसजेंडर, ब्लैक, अफ़्रीकी, मुस्लिम, विकलांग, इमिग्रेंट आदि) लोगों पर होने वाली हिंसा को वैध बनाता है बल्कि राज्य को ऐसा करने की नैतिक छूट भी देता है। इसे हम इज़रायल की “क्वीयर सहयोगी” लेकिन “फ़िलिस्तीन विरोधी” नीतियों में साफ़ देख सकते हैं। जहां एक तरफ़ इज़रायल क्वीयर लोगों के लिए स्वर्ग होने का दावा करता है वहीं वह फ़िलिस्तीन में ना जाने कितने ही क्वीयर व्यक्तियों की हत्या भी करता है।

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हिन्दुस्तान में होमोनेशनिल्ज़्म का किस्सा बेहद दिलचस्प है। कम से कम, इज़रायल, अमेरिका, यूरोप के वाइट सिसजेंडर समलैंगिकों को कुछ अधिकार तो हैं, तो उन अधिकारों के बदले में उन्होंने क्वीयर आज़ादी के सपनों को आग लगा दी है तो इसे समझा जा सकता है लेकिन हिन्दुस्तान के सवर्ण सिसजेंडर समलैंगिक ऐसा क्यों कर रहे हैं? आखिर उन्हें इस हिन्दुत्ववादी राज्य ने क्या दिया है जो वे इसके हिमायती हैं? इसे समझने के लिए हमें अंबेडकर को समझना होगा। “जाति का उन्मूलन” में अंबेडकर कहते हैं कि, “सवर्ण हिन्दू को मानो जन्म में ऊंचाई का पट्टा मिला हुआ है, जिसके भोग में वह ऐसा प्रसक्त है कि वह शूद्रों के अभाव ग्रसित कष्टमय जीवन का अनुभव ही नहीं कर सकता।” आगे वह कहते हैं, “हिंदू वर्ण और जाति के अहंकार से ग्रसित हैं।” यह बातें सवर्ण समलैंगिकों पर भी सटीक लागू होती हैं। चूंकि हिन्दुत्वावादी राज्य ना केवल जाति को बनाए रखने बल्कि उसकी पकड़ को और मजबूत करने के पक्ष में है, सवर्ण समलैंगिको को यह राज्य क्वीयर आज़ादी से ज़्यादा प्रिय है। इसका उदाहरण हमने पिछले साल हुए मुंबई प्राइड में देखा जब कई सवर्ण सिसजेंडर समलैंगिकों ने मिलकर क्रिस समेत 50 क्वीयर व्यक्तियों पर शरजील इमाम के समर्थन में नारे लगाने के आरोप में एफ़आईआर और गिरफ़्तारी का समर्थन किया। 

जिस तरह से देश की राजनीति चल रही है और कई क्वीयर लोगों के अलावा तमाम लेफ़्ट, लिबरल और प्रोग्रेसिव लोग समलैंगिक विवाह को समानता का अगला पड़ाव मान रहे हैं यह संभव है कि आज नहीं तो कल इन विवाहों को वैधता मिल जाएगी। भले ही यह न्यायालयों के रास्ते हो, इसका श्रेय भी हिन्दुत्ववादी सरकार को जाएगा जैसा कई लोगों ने धारा 377 के खत्म होने पर किया। इस वैधता से पनपे समलैंगिक राष्ट्रवाद का यह अर्थ होगा कि विवाह और अन्य संस्थाओं के जरिए सिसजेंडर, सबल, सवर्ण हिन्दु समलैंगिकों को विवाह करने के अधिकार मिलेंगे और राज्य खुद को लिबरल और प्रोग्रेसिव दिखाते हुए कश्मीरियों, आदिवासियों समेत तमाम अन्य “सैवेज” करार दिए समुदायों पर नए तरह की हिंसा करेगा।

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इन सब के बावजूद अगर हम सेम सेक्स मैरिज को ही देखें तो भी ये कई सवाल खड़े करता है। पहला तो यह एक सिरे से ट्रांसजेंडर और अन्य दलित व्यक्तियों के घर, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि बुनियादी सवालों से कोई भी वास्ता नहीं रखता जो कि इस समय विवाह करने से ज़्यादा ज़रूरी सवाल हैं। दूसरा यह कि यह शब्द ‘सेम सेक्स’ सेक्स को केंद्रित करता है और सेक्स के परे बने कई तरह के अन्य क्वीयर रिश्तों को अवैध करता है। हम यहां कुछ उदाहरण देखें। मसलन अगर कोई दो व्यक्ति जिन्हें जन्म के समय स्त्री निर्धारित किया गया हो लेकिन वे अपना जेंडर पुरुष या जेंडरफ़्लुइड या कुछ और मानें और विवाह करना चाहें तो वे विवाह तो कर सकेंगे लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें उनकी जेंडर की पहचान को तिलांजलि देनी होगी। यह राज्य की जेंडर बाइनरी को मजबूत करने वाला ट्रांस विरोधी कदम होगा। इसके अलावा हम दूसरा उदाहरण देखें कि अगर कोई पॉलीएमरस व्यक्ति एक से अधिक लोगों से संबंध में हो तो भले ही वे सेम सेक्स हो या अलग, उनके रिश्ते की कोई वैधता नहीं होगी। अगर कोई व्यक्ति अपने दोस्तों के साथ भी घर बसाना चाहे तो भी उसके रिश्ते की कोई वैधता नहीं है। इसके साथ ही हाल ही में आया ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) कानून ट्रांसजेंडर परिवारों और घरानों को भी अवैध करार देता है।

यहां हमें यह बात भी समझनी होगी कि राज्य सत्ता से वैधता और अधिकार की मांग करने के अपने सवाल हैं। राज्य तभी आपको वैधता देता है जब वे किसी और को अवैध करार दे सके और राज्य अधिकार भी तब ही देता है जब वो आपसे या किसी और से कुछ छीन सके। वैधता की मार्फ़त हमने होमोनेशनलिज़्म की बात की, अधिकार की मार्फ़त हम यह सोचें कि आखिर वे कौन से अधिकार हैं जो शादीशुदा लोगों के पास हैं और आखिर क्या कारण है कि वे अधिकार अविवाहित लोगों को नहीं मिलने चाहिए? क्या एक लोकतांत्रिक और समानता का दावा करने वाले समाज को ये मंजूर होना चाहिए कि कुछ अधिकार एक खास वर्ग के लिए निश्चित हो और अगर हम उस खास वर्ग का हिस्सा ना बनना चाहें तो हमें वो अधिकार ना मिलें? हमें तो बल्कि यह मांग रखनी चाहिए कि अविवाहित लोगों और विवाहित लोगों में किसी तरह का भी भेदभाव ना हो चाहें उनकी जो भी जेंडर या यौनिक पहचान हो या वे किसी भी तरह के रिश्ते में हो।

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इस पूरी बातचीत में एक अहम मुद्दा यह भी है कि सिसजेंडर और हेट्रोसेक्शुअल लेफ़्ट, लिबरल, प्रोग्रेसिव या अन्य लोग क्वीयर आज़ादी में किस तरह का समर्थन दें? हम देख रहें हैं कि अधिकतर लोग समलैंगिक विवाह के पक्ष में हैं। ऐसा होना लाजमी भी है क्योंकि इन सब लोगों ने विवाह की संस्था को कभी भी सैद्धांतिक रूप से चुनौती नहीं दी। तो अब अगर वे समलैंगिक विवाह का विरोध करेंगे तो ये उनकी राजनीति के लिए घातक होगा। ऐसे में इन लोगों के लिए ज़रूरी है कि वे क्वीयर आंदोलन और आज़ादी के विरोधाभासों को समझने का प्रयास करें और अपने जीवन में विवाह समेत राज्य द्वारा दी हुई तमाम तरह की वैधताओं को चैलेंज करें। जहां और जितना संभव हो क्वीयर आज़ादी के लिए प्रतिबद्ध लोगों और संस्थाओं का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से सहयोग करें। सबसे महत्वपूर्ण अपने घरों में मौजूद पितृसत्ता और क्वीयर विरोधी माहौल को खत्म करें। ये काम लेफ़्ट के कामरेडों के लिए खास तौर पर मुश्किल होगा क्योंकि वे डायालेक्टिक मैटेरियलिज़्म पर डिस्कोर्स तो कर लेते हैं लेकिन बर्तन धोने के समय उन्हें पितृसत्ता के प्रदत्त नियम ही प्रिय लगते हैं। आखिर जैसे हिन्दू औरतों ने हिन्दू आदमियों के बच्चे पाले, उनका घर, जाति और धर्म संभाला वैसे ही लेफ़्ट की औरतों ने भी लेफ़्ट की आदमियों के बच्चे पाले, उनका घर, जाति और क्रांति संभाली है। समलैंगिक विवाह के मुद्दे में हमें इसके भावनात्मक पक्ष पर भी ध्यान देने की खास जरूरत है। जो भी समलैंगिक व्यक्ति शादी करना करना चाहते हैं या जो उनका समर्थन करते हैं उनके कई तर्क होते हैं। यहां हम ऐसे ही कुछ तर्क देखेंगे।

पहला तर्क : हेट्रोसेक्शुअल लोगों को विवाह करने का अधिकार है, ऐसे में समलैंगिक लोगों को शादी करने से रोकना भेदभाव है।

यह बात बिल्कुल सही है। सॉलिसिटर जनरल के वक्तव्य भी केंद्र सरकार के भेदभावपूर्ण रवैये को साफ़ दिखाते हैं। हम यहां यह बिल्कुल भी नहीं कहना चाहते कि समलैंगिक व्यक्तियों को विवाह करना चाहिए या नहीं। बल्कि हम तो विवाह की संस्था पर ही सैद्धांतिक रूप से प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। हम विवाह को क्वीयर आज़ादी का ना तो अगला और ना ही आखिरी पड़ाव मानते हैं। हमारा मत है कि विवाह की बजाय हमें सभी क्वीयर लोगों के सिविल अधिकारों की मांग ज़ोर शोर से उठानी चाहिए।

दूसरा तर्क : हेट्रोसेक्शुअल लोगों को विवाह करने से कई अधिकार मिलते हैं और समलैंगिक लोगों को इन अधिकारों से वंचित रखना भेदभाव है।

यह भी बिल्कुल सही है। केंद्र सरकार ने भी तर्क दिया है कि वे विवाह से मिलने वाले संवैधानिक और कानूनी हक समलैंगिक लोगों को नहीं दे सकते। इस बारे में हम पहले भी कह चुके हैं कि ऐसे जो भी अधिकार विवाहित लोगों को मिलते हैं और अविवाहित लोगों को नहीं वो अपने आप में भेदभावपूर्ण रवैया है और हमें इसके खिलाफ़ खड़े होना चाहिए और सभी को बराबर अधिकार मिलें इसकी मांग करनी चाहिए।

तीसरा तर्क : हमें कोई चाहिए जो ताउम्र हमारा साथ दे और जिसके साथ हम अपना घर बसा सकें और बूढ़े हो सकें। समलैंगिक विवाह को मान्यता मिलने से ऐसा हो सकेगा।

इस बात को समझने के लिए हमें अकेलापन और उससे निपटने में समुदाय की भूमिका की अहमियत को समझना होगा। यह संभव है कि समलैंगिक विवाह को मान्यता मिलने के बाद कई लोगों के लिए अपने साथी के साथ खुलकर जीना थोड़ा आसान हो जाए। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि साथी का मिलना ना मिलना किसी कानून पर तय नहीं करता। ना ही शादी का हो जाना जीवन भर साथ रहने की बाध्यता ही तय करता है और क्या वाकई हम किसी ऐसे रिश्ते में रहना चाहेंगे जो हमें बाध्य करे? हम जिन हेट्रोसेक्शुअल लोगों को देखकर सोचते हैं कि उनका जीवनभर का साथ है वो दरअसल उनके बीच प्यार की वजह से नहीं पितृसत्तात्मक समाज की वजह से है। यह “जीवन भर का साथ” महिलाओं के ऊपर हुए अनन्य अत्याचारों का गवाह है ना कि प्रेम का।

किसी साथी की इच्छा शायद हमारी सबसे गहरी इच्छाओं में से एक है। लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि ना तो शादी साथी पाने का कोई फूलप्रूफ़ प्लैन नहीं है और ना ही साथी का रहना अकेलापन ना रहने की गारंटी। क्या ये संभव नहीं कि साथी हो या ना हो हम एक ऐसा समुदाय बनाने का प्रयास करें, दोस्तों का एक ऐसा समूह बनाने की कोशिश करें जो दुख सुख में हमारा साथ दे और हम उनका? जो हमारे मन की उन दरारों को कम से कम भरें नहीं तो मरहम लगाएं जो इस क्वीयरविरोधी समाज ने हमें दिए हैं? क्या ये संभव नहीं कि हमारे दोस्त हमारी प्रेम की थाती बनें?

लव जिहाद, पितृसत्ता और जातिवादी मानसिकता के दौर में हमें यह सवाल बेहद मज़बूती से करना होगा कि सेम सेक्स मैरिज से किसका भला होगा? क्या पुलिस और प्रशासन मुस्लिम क्वीयर व्यक्तियों को लव जिहाद के  भूत से आतंकित नहीं करेंगे? क्या सवर्ण जैसे हेट्रोसेक्शुअल दलित दूल्हों को घोड़ी से उतारते हैं वैसे समलैंगिक दलित दूल्हों को नहीं उतारेंगे? क्या दहेज़ और वैवाहिक यौन हिंसा इन संबंधों में भी होंगे और उनकी कोई सुनवाई नहीं होगी? क्वीयर आज़ादी के लिए हमारी प्रतिबद्धता में पुलिस हिंसा, जेलों में कैद लोगों के साथ हो रहे अत्याचार आदि की बात होनी भी ज़रूरी है। इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि क्वीयर आज़ादी जाति, पितृसत्ता, धार्मिक विद्वेष, पूंजीवाद, एबलिज़्म आदि के उन्मूलन के साथ जुड़ी है।

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यह लेख धर्मेश ने लिखा है। धर्मेश ने अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए किया है और वो सेफ़ एक्सेस और इंडिया फ़ेलो रह चुके हैं। उन्होंने ज़मीनी स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य, व्यापक यौनिकता शिक्षा, जेंडर आधारित हिंसा और रोज़गार के मुद्दों पर काम किया है। उन्होंने ग्रिंडर के ऑनलाइन सेक्शुऐलिटी रिसोर्स, पीपल्स लिन्ग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया, निशिकान्त कोल्गे की किताब ‘गांधी अगेंस्ट कास्ट’ और बद्रीनारायण की किताब ‘फ़्रैक्चर्ड टेल्स’ के लिए अनुवाद किया है। उनके लेख और कविताएं फ़ेमिनिज़्म इन इंडिया, यूथ की आवाज़, वीमेन्स वेब, गेलैक्सी, बया, सदानीरा और क्रिटिक में प्रकाशित हैं। धर्मेश इलाहाबाद में क्वीयर समुदाय के साथ काम कर रहे हैं।


तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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