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“कैंसर तो अमीरों की बीमारी है। ये गरीब-मज़दूरों को नहीं होती।” अधेड़ उम्र के एक आदमी ने हम लोगों की एक मीटिंग के दौरान यह बात कही थी, जब मैं गांव की महिलाओं और किशोरियों को सर्वाइकल कैंसर के बारे में जागरूक करने गई थी। मुझे उनकी यह बात बेहद बुरी लगी, लेकिन इसमें अच्छा यह हुआ कि मीटिंग में आई तीन महिलाओं ने एक साथ उस पुरुष को ज़वाब देते हुए बताया कि इस साल उनके अपने गांव में चार औरतों और दो आदमी की मौत कैंसर से हुई। इसके बाद वह आदमी लज्जित होकर चला गया।

कैंसर एक जानलेवा बीमारी है, जो लाज़मी है कि कोई जाति, धर्म या वर्ग नहीं देखती। इसका वास्ता इंसान के शरीर से है पर इसके बावजूद अक्सर गांव में कैंसर के बारे में लेकर से सुनने को मिलता है कि ये सिर्फ़ अमीर या शहरी लोगों को होता है लेकिन सच्चाई ये नहीं बल्कि कुछ और है। मेरे गाँव की अनीता (बदला हुआ नाम) भाभी को पहले बच्चे के बाद ही बच्चेदानी के कैंसर की शिकायत हुई। सफ़ेद पानी की समस्या को नज़रंदाज़ करते-करते कैंसर के अंतिम स्टेज पर उन्हें इस बीमारी का पता चला। शुरुआत में गाँव के एक डॉक्टर उनकी बच्चेदानी निकाल दी, इसके बाद संक्रमण बढ़ता गया और कुछ ही महीनों में उनकी मौत हो गई। उनके पति ने बताया कि उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

गांव में कैंसर को लेकर जागरूकता बहुत सीमित है, जिसका ख़ामियाज़ा लोगों को भुगतना पड़ता है। गांव में महिलाओं के बीच बच्चेदानी के कैंसर की समस्या धीरे-धीरे आम हो गई, जिसकी वजह से कई महिलाओं को अपनी जान गंवानी पड़ती है। ऐसे लक्षणों की शुरुआत को अधिकतर महिलाएं गंभीरता से नहीं लेती। कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका पता ज़्यादातर देरी चलता है, जब यह बीमारी दूसरे या आख़िरी स्टेज में होती है। कई बार इसके शुरुआती लक्षण उतने ही हल्के होते हैं, जिसे लोग आसानी से नज़रंदाज़ करते जाते हैं। जागरूकता और जानकारी का अभाव भी एक बड़ी वजह है। इसके चलते जब बीमारी का पता चलता है, तब तक बहुत देरी हो चुकी है। चूंकि कैंसर से लड़ने के लिए हमारे देश में मज़बूत स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं है, ऐसे में जब इंसान को कैंसर होने का पता चलता है तब से लेकर अस्पताल खोजने और इसके महंगे इलाज के लिए पैसे जुटाने तक में बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए आर्थिक रूप से कमज़ोर इंसान की पहुंच आज भी हमारे देश में कैंसर के इलाज तक नहीं है।

“जब हम लोग ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर को लेकर जागरूकता बढ़ाने की दिशा में काम करते हैं तो अक्सर अलग-अलग मिथ्य अपने आप में चुनौती बनने लगते हैं जिन्हें दूर करना भी बेहद ज़रूरी है।”

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इसकी वजह से गांव में कई बार झाड़-फूंक को भी बढ़ावा मिलता है। गरीब-मज़दूर परिवार की पहुंच अच्छे इलाज तक नहीं हो पाती, जानकारी का अभाव होता है। ऐसे में झाड़-फूंक के पाखंड में वे फंस जाते हैं। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी झाड़-फूंक और अंधविश्वास को चिकित्सा से ज़्यादा भरोसेमंद समझा जाता है। जब हम लोग ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर को लेकर जागरूकता बढ़ाने की दिशा में काम करते हैं तो अक्सर अलग-अलग मिथ्य अपने आप में चुनौती बनने लगते हैं जिन्हें दूर करना भी बेहद ज़रूरी है। स्वास्थ्य सेवाओं का न होना, इलाज का महंगा होना, जागरूकता का अभाव आदि कारणों के साथ-साथ ये मिथ्य भी इस बीमारी को हमारे ग्रामीण भारत में विकराल रूप देने में अहम भूमिक निभाते हैं।

राष्‍ट्रीय कैंसर संस्‍थान, झज्जर द्वारा तैयार की गई प्राथमिक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 में 8,37,997 लोगों की मौत हुई यानि हर दिन देश के अलग-अलग हिस्‍सों में 2,296 लोगों की कैंसर की वजह से मौत हुई। साल 2019 में 16 लाख से अधिक लोग कैंसर की गंभीर स्थिति (टर्सरी लेवल) में थे। भारतीय चिकित्‍सा अनुसंधान परिषद की राष्‍ट्रीय कैंसर रजिस्‍ट्री कार्यक्रम के मुताबिक, देश में बढ़ती हुई उम्र की आबादी, तंबाकू उत्‍पादों का उपयोग, स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले आहार के कारण स्‍तन कैंसर, गर्भाशय कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, मुख कैंसर, प्रोस्‍टेट कैंसर, लंग कैंसर और ब्‍लड कैंसर हो रहे हैं। इनके कारण सबसे अधिक मौतें हो रही हैं।

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जर्नल ऑफ ग्लोबल ऑन्कोलॉजी में साल 2017 में पब्लिश हुई एक रिपोर्ट के मुताबिक, विकसित देशों के मुकाबले भारत में कैंसर मरीज़ों की मौत की दर दोगुनी है। ये आकंड़े डराने वाले हैं पर यह सच्चाई है। कैंसर का रूप अपने देश में किसी महामारी से कम नहीं है। आए दिन हम अपने आसपास या जान पहचान में लोगों को कैंसर से जान गँवाते हुए देख रहे है। शरीर को खोखला करने वाली इस जानलेवा बीमारी से निपटने के लिए अपने देश की कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था इस बीमारी को और भी भयानक बना देती है। देश में कैंसर को लेकर सीमित इलाज की महंगी सुविधाएं आम इंसान की पहुंच से बाहर हैं। इसलिए आम इंसान के लिए कैंसर की बीमारी मौत का पर्यायवाची है।

कैंसर को रोक पाना मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं। अगर कैंसर का पता शुरुआती दौर में ही लग जाए तो इंसान की जान बचाई जा सकती है जिसके लिए ज़रूरी है हमें कैंसर के शुरुआती लक्षणों की जानकारी हो। इसके साथ ही देश में कैंसर के इलाज का आम लोगों की पहुंच में होना ज़रूरी है। हाल ही में, कैंसर की वजह से भारत की प्रसिद्ध नारीवादी, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता कमला भसीन का निधन हुआ। हम हर दिन इस जानलेवा बीमारी से अपने समाज, देश और परिवार के प्रियजनों को खो रहे हैं। इस जानलेवा बीमारी पर लगाम लगाना का सटीक तरीक़ा है जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाएं जिनतक सबकी पहुंच हो। जागरूकता न केवल इस बीमारी या इसके इलाज की स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में बल्कि इससे जुड़े मिथ्यों के बारे में जागरूक होना बेहद ज़रूरी है। कैंसर अमीरों की नहीं बल्कि इंसानों से शरीर से जुड़ी बीमारी है जिसका अमीरी-ग़रीबी से कुछ लेना-देना नहीं है। हां इसके इलाज तक की पहुंच में वर्ग एक बड़ी भूमिका ज़रूर निभाता है। हम जितने जल्दी ये समझ जाएं हम लोगों के लिए उतना अच्छा है क्योंकि कैंसर की जानलेवा बीमारी हमें वक्त बहुत कम देती है।

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तस्वीर साभार : Roche

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