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‘पिछले एक हफ़्ते से मुझमें पीलिया के लक्षण दिखने शुरू हुए। घरवालों से कई बार डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा लेकिन वे बार-बार मना करते रहे। कहने को तो उनके पास दो वजह थीं, पहला, आर्थिक तंगी और दूसरा दवा से ज़्यादा झाड़-फूंक पर भरोसा। घर वाले मुझे डॉक्टर के यहां ले जाने की बजाय झाड़-फूंक के लिए तैयार थे, लेकिन जब मैंने ज़िद की कि मैं अपने पैसे से डॉक्टर से इलाज करवाऊंगी तब जाकर घरवालों ने डॉक्टर से मेरी जांच करवाई और मेरा पीलिया का इलाज शुरू हुआ।‘ डॉक्टर की बजाय झाड़-फूंक के लिए ले जाने के लिए बाध्य करने का ये कोई मेरा पहला अनुभव नहीं है। बचपन से ही मैंने अपने गांव की अपनी बस्ती में हमेशा ये सभी के साथ होते देखा है। इससे कई बार बहुत से लोगों की जान भी चली जाती है। मुझे याद है जब पिछले साल एक आदमी को सांप ने काट लिया तब गांव वाले उसे डॉक्टर के पास ले जाने की बजाय झाड़-फूंक के लिए ले गए और उस आदमी की जान चली गई। हो सकता है आपको मेरी ये बातें अजीब लगे या आप ये सोचे कि आज के समय में कहां कोई ऐसे करता है लेकिन ऐसा नहीं है। आज भी गांव की गरीब बस्तियों में डॉक्टर से इलाज से ज़्यादा जादू-टोना और झाड़-फूंक पर लोगों का अधिक विश्वास है।

इस झाड़-फूंक का सबसे ज़्यादा बुरा असर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे बीमार लोग झेलते हैं। गांव में अगर कोई एक इंसान चुपचाप रहता है या अकेले मे बड़बड़ाता रहता है तो लोग कहने लगते हैं कि लगता है इसपर किसी ने जादू-टोना कर दिया है। ज़रूर इसपर कोई ऊपरी हवा का चक्कर है। इसके बाद शुरू होता है झाड़-फूंक का चक्कर। परिवारवाले पानी की तरह पैसे बहाते हैं, अजीब-अजीब से टोटके के चक्कर में वे सालों बीता देते हैं और आख़िर में उनके हाथ कुछ नहीं आता। सच्चाई यही है की आज भी गांव में मानसिक रोग को कोई वास्तविक मानता ही नहीं है। मानसिक समस्याओं को सिर्फ़ भूत-प्रेत, जादू-टोना से ही जोड़कर देखा जाता है। इसकी वजह से ज़्यादातर या यूं कहूं कि हमारी गरीब दलित बस्तियों में अधिकतर मानसिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों को कभी भी सही इलाज नहीं मिल पाता बल्कि इसके विपरीत उनको झाड़-फूंक के नामपर अलग-अलग हिंसाओं का सामना ज़रूर करना पड़ता है।

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कई बार झाड़-फूंक करने वाले इलाज के नामपर बीमार लोगों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं। उन्हें मारना, बाल नोंचना और रस्सी से पेड़ में बांधना जैसे व्यवहार अक्सर देखने को मिलते हैं, जिसमें बीमार इंसान के परिवारवाले भी अंधविश्वास में इस हिंसा में साथ देते हैं। अगर मैं अपने ग्रामीण क्षेत्र देईपुर गांव आराजीलाइन ब्लॉक की बात करूं तो हमलोगों के क्षेत्र में की भी मानसिक रोगों का अस्पताल नहीं है, यही वजह है कि लोगों के पास मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी भी न के बराबर है। इसी वजह से मानसिक रोग से जूझ रहे लोगों को अलग-अलग धर्म के धार्मिक स्थलों पर इलाज के लिए ले ज़ाया जाता है, जहां काफ़ी संख्या में लोग दूर-दराज गांव से इलाज के आते है।

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हमारी गरीब दलित बस्तियों में अधिकतर मानसिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों को कभी भी सही इलाज नहीं मिल पाता बल्कि इसके विपरीत उनको झाड़-फूंक के नामपर अलग-अलग हिंसाओं का सामना ज़रूर करना पड़ता है।

सिर्फ़ मानसिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि मिर्गी जैसी बीमारी होने पर भी शुरू मे लोग झाड़-फूंक कराने जाते हैं। कई बार ऐसे मरीजों को पता ही नहीं होता कि उनकी बीमारी का इलाज संभव है। ठीक इसी तरह किसी भी तरह के दौरे या अलर्जी होने को गांव में अक्सर लाइलाज माना जाता है। लोगों को लगता है कि जिन बीमारियों का इलाज डॉक्टर के पास नहीं है उसका इलाज झाड़-फूंक से संभव है। इस झाड़-फूंक करने और करवाने वालों का चलन कोरोना महामारी में देखने को मिला, जब गांव में दलित बस्ती के लोग कोरोना के लक्षण होने पर टेस्ट करवाने या इसका इलाज करवाने के लिए अस्पताल जाने के बजाय झाड़-फूंक करने वाले लोगों के पास जाकर जड़ी-बूटी ले रहे थे। इससे गांव में कई लोगों की हालत काफ़ी गंभीर भी हुई और कई लोगों की जान भी चली गई। गांव में अक्सर इस झाड़-फूंक करने की संस्कृति को समाज की धरोहर का एक हिस्सा मानकर अनमोल समझा जाता है। अगर इसपर कोई भी सवाल करो कोई कई बार घरवाले बुरी तरह नाराज़ भी हो जाते हैं लेकिन जब मैं बचपन से लेकर अब तक अपने अनुभवों के आधार पर इस जादू-टोना और झाड़-फूंक की संस्कृति को देखती हूं तो यही समझ में आता है कि इसका मुख्य कारण – ग़रीबी, अशिक्षा और पिछड़ापन है।

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कई परिवार ऐसे है जो किसी भी तरीक़े के इलाज का खर्चा उठाने में सक्षम नहीं होते। ऐसे में उनके पास हर बीमारी का एकमात्र विकल्प झाड़-फूंक ही होता है जो आसानी से उनके गांव और घर के आसपास मिल जाता है। ये ज़रूरी नहीं है कि सभी गांव के दलित परिवार गरीब ही हो, कई बार उनकी आर्थिक स्थिति औरों के मुकाबले ठीक रहती है और वे एक स्तर पर पढ़े-लिखे भी होते हैं लेकिन फिर भी इस अंधविश्वास को वे बढ़ावा देते हैं क्योंकि वे साक्षर तो हुए पर शिक्षित नहीं। वे कभी भी इस अंधविश्वास पर एक भी सवाल नहीं कर पाते है। वास्तविकता ये है कि अभी भी समाज के हाशिए पर बसने वाले समुदाय तर्क और विज्ञान को अपनी ज़िंदगी में उतार नहीं पाए है, जिसका भुगतान न केवल उनके परिवार को बल्कि उनका देखा-सीखी व्यवहार करने वाले अन्य परिवारों को भी झेलना पड़ता है। इस झाड़-फूंक ने ही गांव के न जाने कितने मानसिक रोगियों को न केवल इधर-उधर भटकने पर मजबूर किया है, बल्कि उनके स्वास्थ्य और बेहतर ज़िंदगी के उनके मानवाधिकार को भी प्रभावित किया है।

ध्यान देने वाली बात ये भी है कि झाड़-फूंक करने वाले लोग भी कहीं दूर के नहीं बल्कि आसपास के परिवारों से होते हैं। उनका कोई संगठित केंद्र नहीं होता है, इसलिए उनके ख़िलाफ़ किसी भी तरफ़ की कार्रवाई तो दूर इसके बारे में सोचा भी नहीं जाता है। एक ही जाति, वर्ग और गांव के होने के कारण अक्सर ये किसी रिश्ते में आते हैं और रिश्ते में होने वाली किसी भी हिंसा के ख़िलाफ़ बोलना बेहद मुश्किल होता है। चूंकि कभी-कभी तुक्का में इस झाड़-फूंक से छोटे-मोटे रोग ठीक हुए होते हैं और इसका हवाला देकर लोग सालों-साल इसे मानते हैं, ऐसे में इस चलन को तोड़ना मुश्किल जान पड़ता है। ज़रूरी है कि इस चलन को तोड़ा जाए क्योंकि ये कभी भी हमें आगे बढ़ने, मुख्यधारा के समाज से जुड़ने और बेहतर जीवन पाने में मदद नहीं करेगा।

किसी भी सभ्य समाज के लिए अंधविश्वास एक ऐसी बीमारी की तरह होता है जो समाज की जड़ों को अंदर ही अंदर खोखला करता चला जाता है। आधुनिक समाज में ज़िंदा ये झाड़-फूंक का अंधविश्वास आज भी न जाने कितनी जिंदगियों को जोखिम में डाल रहा है। मेरे कई बार बीमार होने पर मेरा इलाज इस झाड़-फूंक के भरोसे किया गया, लेकिन जब मैं आर्थिक रूप से सक्षम हुई तो इसे अपने स्तर पर चुनौती देना शुरू किया और मेरा मानना है कि हर बदलाव की तरह इस अंधविश्वास के ख़िलाफ़ भी सकारात्मक बदलाव की पहल हमें अपनी ज़िंदगी से करनी होगी।

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तस्वीर साभार : Reuters

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