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बीते महीने ही केरल हाईकोर्ट ने एक आदेश जारी किया गया जिसके तहत एमबीबीएस की किताबों में एलजीबीटी+ समुदाय के ख़िलाफ़ लिखे गए अपमानजनक सन्दर्भों और शब्दों को हटाने के लिए कहा गया। कोर्ट ने राष्ट्रीय मेडिकल आयोग और स्नातक मेडिकल शिक्षा बोर्ड को इस मामले में कार्रवाई करने को कहा। कोर्ट में यह याचिका केरल की ‘क्वीरिदम’ और कोलम स्थित ‘दिशा’ नामक गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दी गई थी। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक मेडिकल की पढ़ाई में शामिल किताबों में क्वीयर समुदायों के यौनिक और लैंगिक अस्तित्व को अपराध, मनोविकार या यौनिक दोष बताकर पढ़ाया जा रहा है। समलैंगिक और ट्रांस समुदाय के लिए ‘असामान्य यौनिक व्यवहार’ और ‘साइको सेक्सुअल’ मरीज़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। कई किताबों में लिखा गया है कि ऐसे मरीज़ों का बहुत ध्यान रखने की ज़रूरत है। इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट ने भी मेडिकल किताबों में ‘क्वीयरफोबिक’ भाषा के चलन की बात कही थी।

हालांकि अभी तीन साल पहले ही 6 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत धारा 377 को अपराध के दायरे से बाहर घोषित किया गया था। भारत में बरसों से चल रही समलैंगिक समुदाय के अस्तित्व की लड़ाई को एक आशा की किरण दिखी लेकिन सवाल यह है कि इस ऐतिहासिक फैसले के तीन साल पूरे होने के बाद आज वास्तविक स्थिति किस हद तक सुधरी है? किसी भी रूढ़िवादी सोच को छोड़कर नई सोच और विचारों को अपनाने में समय लगता है। लेकिन अगर हमारी पीढ़ी को पढ़ाई के नाम पर वही रूढ़िवादी चीज़ें पढ़ाई जाएं और अवैज्ञानिक जानकारी दी जाए तो उस शिक्षा पर सवाल करना लाज़मी है।

अब जब समलैंगिकता को हमारे देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा मान्यता मिल चुकी है तो मेडिकल शिक्षा में इसे रोग या अपराध कहना कहां तक सही है? बदलाव को न अपनाना और विज्ञान के नाम पर इस तरह की क्वीयरफोबिक शिक्षा देना रूढ़िवादी, पितृसत्तात्मक संस्कृति को मज़बूती देता है। 

कलकत्ता नैशनल मेडिकल कॉलेज के सेंकड और थर्ड ईयर के कुल 290 मेडिकल स्टूडेंट्स पर एक सर्वे किया गया। इस सर्वे के परिणाम बताते हैं कि सर्वे में शामिल 15.9 फीसद विद्यार्थी अभी भी यह मानते हैं कि होमोसेक्सयूअलिटी या समलैंगिकता एक बीमारी है और 8.2 फीसद ने इसे बच्चों के लिए खतरा माना है। जबकि 55.6 फीसद छात्रों ने यह मानने से इनकार किया कि समलैंगिकता एक बीमारी है। इसके सारांश में यह बताया गया है कि ऊपरी तौर पर समलैंगिकता को लेकर मेडिकल छात्रों का रवैया उदारवादी है लेकिन आंकड़े यह भी दर्शा रहे हैं कि नकारात्मक रवैये को ठीक करने के लिए मेडिकल पाठ्यक्रम में सुधार की ज़रूरत है।

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मेडिकल शिक्षा में क्वीरफोबिया कब से? 

मेडिकल क्षेत्र में क्वीयरफ़ोबिया कोई नया मुद्दा नहीं है। द वायर में छपे एक लेख के मुताबिक इसका संबंध 1952 में अमेरिकन साइकेट्रिक एसोसिएशन द्वारा छपे ‘डायग्नोस्टिक और स्टैटिस्टिकल मैन्युअल’ (डीएसएम) से है। यह मानसिक बीमारियों की संदर्भ पुस्तक है। इसके प्रथम संस्करण में समलैंगिकता को ‘सोशिओपैथिक पर्सनालिटी डिस्टर्बेंस’ यानि व्यक्तित्व मनोरोग बताया गया। 

अमेरिका में समलैंगिक समुदाय द्वारा विरोध करने पर साल 1974 के दूसरे संस्करण में ‘समलैंगिकता’ को डीएसएम से हटा दिया गया। आगे के संस्करणों में इसके शब्द बदलते रहे लेकिन क्वीयरफ़ोबिया वैसे का वैसे ही बना रहा। आखिरकार डीएसएम के पांचवें संस्करण में इसे ‘जेंडर डायसस्फोरिया’ का नाम दिया गया। यह कहा गया कि यह शब्द ‘क्लीनिकल बीमारियों’ को केंद्र में रखता है, समलैंगिक लोगों की पहचान और अस्तित्व से इनका कोई संबंध नहीं है।

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भारत में मेडिकल क्षेत्र में क्वीयरफ़ोबिया

भारत में साल साल 2018 में राष्ट्रीय मेडिकल आयोग द्वारा दो दशकों बाद मेडिकल पाठ्यक्रम को सुधारने का फैसला लिया गया। यह उम्मीद की जा रही थी कि नया पाठ्यक्रम वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर होगा और यह समलैंगिकता को बीमारी के रूप में नहीं दिखाएगा लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी। भारतीय मनोविज्ञान समाज ने साल 2018 में एक बयान जारी किया था जिसमें उन्होंने कहा कि समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं है और न ही इसे किसी रोग के रूप में मानना चाहिए। अभी हाल ही में केरल के एक कॉलेज छात्रों द्वारा विरोध जारी किया गया जिसमें समलैंगिकता को अप्राकृतिक बताया गया था। विद्यार्थियों ने किताब से कंटेंट को हटाने की मांग की थी। लेकिन भारत में मेडिकल की किताबें जल्दी प्रकाशित नहीं होती क्योंकि चिकित्सक इन किताबों को जिंदगीभर अपने पास रखते हैं इसलिए इन्हें बार-बार अपडेट नहीं किया जाता। 

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संस्कृति और मेडिकल विज्ञान

संस्कृति और मेडिकल विज्ञान एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। मेडिकल की किताबों में आज भी समलैंगिकता और जेंडर के प्रति मौजूद पूर्वाग्रहों को देखकर यही कहा जा सकता है कि हमारे समाज में विज्ञान और संस्कृति एक दूसरे के साथ चलते प्रतीत होते हैं। हमारे समाज ने बहुत तरक्की कर ली है लेकिन लोगों की धारणाएं और विचारधाराएं चुटकियों में नहीं बदलती। कहीं न कहीं क्वीयरफोबिक संस्कृति ही हमारे मेडिकल विज्ञान को प्रभावित करती प्रतीत होती है। लोगों का इसे ‘असामान्य मनोरोग’ मानना या इसे बीमारी कहना, कन्वर्शन थेरेपी करवाना मेडिकल के इस होमोफोबिक पक्ष को बढ़ावा देता है। दूसरी ओर मेडिकल विज्ञान में हर दिन नए बदलाव आते रहते हैं। अध्ययन की प्रवृत्ति इंसान को नई-नई खोज करने को मजबूर करती है। अब जब समलैंगिकता को हमारे देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा मान्यता मिल चुकी है तो मेडिकल शिक्षा में इसे रोग या अपराध कहना कहां तक सही है? बदलाव को न अपनाना और विज्ञान के नाम पर इस तरह की क्वीयरफोबिक शिक्षा देना रूढ़िवादी, पितृसत्तात्मक संस्कृति को मज़बूती देता है। 

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तस्वीर साभार : The Print

प्रेरणा हिंदी साहित्य की विद्यार्थी हैं। यह दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। इन्होंने अनुवाद में डिप्लोमा किया है। अनुवाद और लेखन कार्यों में रुचि रखने के इलावा इन्हें चित्रकारी भी पसंद है। नारीवाद, समलैंगिकता, भाषा, साहित्य और राजनैतिक मुद्दों में इनकी विशेष रुचि है।

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