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स्कूलों में सेक्स एजुकेशन की मांग आज कई लोग करते हैं। आज के ज़माने में पहले से कहीं ज़्यादा लोग इस बात से सहमत हैं कि सेक्स और प्रजनन के बारे में स्कूल के बच्चों को पढ़ाना चाहिए। आखिर सेक्स एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और छात्रों के सिलेबस में पढ़ाई जा रही किसी अन्य वैज्ञानिक प्रक्रिया से बहुत अलग नहीं है। यह पढ़ाना और भी ज़रूरी इसलिए है क्योंकि इसका सीधा संबंध छात्रों के स्वास्थ्य से है और उन्हें अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के बारे में जानने की भी ज़रूरत है। 

जहां सेक्स एजुकेशन के बारे में लोग धीरे धीरे जागरूक हो रहे हैं, स्कूल में सेक्शूएलिटी यानी यौनिकता के बारे में पढ़ाया जाए इसके लिए वे अभी भी राज़ी नहीं हैं। बच्चों को एलजीबीटीक्यू+ और नॉन-बाईनरी लोगों और संबंधों के बारे में पढ़ाया जाए इसके लिए वे तैयार नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा एलजीबीटीक्यू+ को वैध घोषित करने के बावजूद आज भी सिर्फ़ नारी-पुरुष के संबंधों को ही ‘प्राकृतिक’ माना जाता है। एलजीबीटीक्यू को आज भी एक गुनाह या एक बीमारी की नज़र से देखा जाता है। एलजीबीटीक्यू+ का समर्थन करनेवाले भी बच्चों को ‘इन चीजों’ के बारे में सिखाने से कतराते हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि बच्चों को इतनी कम उम्र में यौनिकता के बारे में इतने विस्तार से सिखाया जाए। 

लेकिन अगर हम स्कूल में बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने की बात कर रहे हैं, तो ज़रूरी है कि हम उन्हें हर तरह के यौन संबंध के बारे में सिखाएं। शिक्षा अगर सिर्फ़ विषमलैंगिक यौन संबंधों तक ही सीमित रहे तो शिक्षा अधूरी रह जाएगी। पहले तो अभिभावकों का यह समझना ज़रूरी है कि समलैंगिकता, बाईसेक्शूऐलिटी आदि भी नारी-पुरुष के संबंधों जितने ही स्वाभाविक और प्राकृतिक हैं। उन्हें भी साधारण जैविक प्रक्रियाओं व प्रवृत्तियों की तरह देखा जाना चाहिए। उनमें अश्लीलता या अप्राकृतिकता ढूंढना सिर्फ़ छात्रों को गलत शिक्षा देना ही नहीं, एलजीबीटीक्यू+ व्यक्तियों के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी भी है। 

एक कक्षा में बैठे सभी छात्र विषमलैंगिक और सिसजेंडर होंगे यह ज़रूरी नहीं है। उनमें से कई छात्र खुद ट्रांसजेंडर, नॉन-बाईनरी, समलैंगिक, बाईसेक्शुअल इत्यादि हो सकते हैं, जिन्हें यह सिखाना ज़रूरी है कि उनके अंदर की भावनाएं बिल्कुल स्वाभाविक है, और उनका अस्तित्व कोई पाप, अपराध या बीमारी नहीं है। बहुत सारे छात्र अब्यूसिव या होमोफ़ोबिक परिवारों से आते हैं, जहां उनके अंदर की बातें समझने के लिए कोई नहीं रहता। ऐसे में स्कूल और शिक्षकों का कर्त्तव्य होता है कि वे ऐसे छात्रों का सहारा बनें। उन्हें यकीन दिलाएं कि समाज और घरवाले चाहे कुछ भी कहें, इससे हकीक़त नहीं बदल जाती और एक स्वाभाविक और प्राकृतिक चीज़ ग़लत नहीं हो जाती।

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अगर हम स्कूल में बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने की बात कर रहे हैं, तो ज़रूरी है कि हम उन्हें हर तरह के यौन संबंध के बारे में सिखाएं। शिक्षा अगर सिर्फ़ विषमलैंगिक यौन संबंधों तक ही सीमित रहे तो शिक्षा अधूरी रह जाएगी।

इस उम्र के बच्चों में, ख़ासकर लड़कों में, ‘बुलीइंग’ और उत्पीड़न भी बहुत आम बात है। जाने-अनजाने में वे आम भाषा में होमोफ़ोबिक और ट्रांसफ़ोबिक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। अपने दोस्तों को ‘लड़की’ कहकर चिढ़ाते हैं। किसी का मज़ाक उड़ाकर उसकी तथाकथित ‘मर्दानगी’ पर सवाल उठाते हैं। ऐसे में उन्हें समझाना ज़रूरी हो जाता है कि एक व्यक्ति का लैंगिक परिचय या उसकी यौनिकता उसका व्यक्तिगत मामला है, जिसका सम्मान करना चाहिए। इसमें मज़ाक उड़ाने या शर्मिंदा महसूस कराने जैसी कोई चीज़ नहीं है। 

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हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां बच्चों का सेक्स एजुकेशन पॉर्न से शुरू होता है। पॉर्न में एलजीबीटीक्यू व्यक्तियों, खासकर महिलाओं को इस तरह से दिखाया जाता है जो असल ज़िंदगी से बिल्कुल विपरीत है। इससे भी बच्चों में एलजीबीटीक्यू+ व्यक्तियों और संबंधों के बारे में गलत धारणाएं पैदा हो जाती हैं, जिसका नतीजा अक्सर यह होता है कि वे एलजीबीटीक्यू+ इंसानों को ‘ऑब्जेक्टिफ़ाई’ करने, या उन्हें यौन वस्तु की तरह देखने लगते हैं। यह अवधारनाएं मन में पैदा होने से पहले ही मिटा दी जानी चाहिए। एलजीबीटीक्यू+ के बारे में पढ़ाना इसीलिए अश्लीलता नहीं, बल्कि छात्रों के मन से अश्लील फ़िल्मों और साहित्य से सीखी गई अवधारणाओ को दूर करना है। 

पाठ्यक्रम में सेक्स एजुकेशन के नाम पर सिर्फ़ प्रजनन क्रिया के बारे में पढ़ाना काफ़ी नहीं है। यौनिकता और लैंगिक परिचय का जो विस्तृत ‘स्पेक्ट्रम’ है, उसके बारे में जब तक विस्तार में नहीं पढ़ाया जाएगा, तब तक सेक्स एजुकेशन के सारे प्रयास अधूरे और असफल ही रहेंगे। ऐसे सेक्स एजुकेशन का कोई फ़ायदा नहीं जिसमें छात्रों से यौनिकता से संबंधित हर एक विषय पर उन्मुक्त चर्चा न हो।

ऐसा करने से पहले ज़रूरी है कि छात्रों के अभिभावक और शिक्षक ख़ुद एलजीबीटीक्यू+ और उससे संबंधित मुद्दों से पूरी तरह वाक़िफ हो जाएं और उन्हें स्वस्थ और सहज नज़रिए से देखना सीखें। जब तक बड़ों के अपने मन में एलजीबीटीक्यू+ को लेकर अवधारणाएं और पूर्वाग्रह रहेंगे, जब तक वे खुद एलजीबीटीक्यू+ व्यक्तियों और संबंधों को घृणा या तिरस्कार की नज़र से देखेंगे, छात्रों की भी मानसिकता नहीं बदल पाएगी। बच्चे आखिर बड़ों को देखकर ही सीखते हैं। हमें ज़रूरत है समाज में एलजीबीटीक्यू+ के बारे में और जागरूकता बढ़ाने की, ताकि यह भी अन्य मुद्दों की तरह एक सामान्य मुद्दा बन जाए जिस पर बिना किसी संकोच के चर्चा किया जा सके। एलजीबीटीक्यू+ व्यक्तियों को न्याय और सम्मान दिलाने का रास्ता यही है।

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तस्वीर साभार : pointofview

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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