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जून को ‘प्राईड मंथ’ के रूप में मनाया जाता है। ये महीना उनके नाम है जो ख़ुद को ‘एल.जी.बी.टी.क्यू.’ कहते हैं। यानी वे सभी लोग जिनका लैंगिक परिचय या जिनकी यौनिकता समाज ने तय किए गए लिंग और यौनिकता के पैमानों से भिन्न हैं। ‘एल. जी. बी. टी. क्यू’ का फ़ुल फ़ॉर्म है ‘लेस्बियन, गे, बाईसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, क्वेश्चनिंग’ जिसमें ‘क्वेश्चनिंग’ वे लोग हैं जो अपना लिंग और अपनी यौनिकता अभी तक तय नहीं कर पाए हैं। ‘क्यू’ के आगे अक्सर एक ‘+’ लगाया जाता है उन तमाम लैंगिक और यौनिक परिचयों के लिए जिनका ज़िक्र इस छोटे से शब्द में नहीं है, जैसे इंटरसेक्स, एसेक्शुअल वगैरह।

आमतौर पर हम जब एल.जी.बी.टी.क्यू के बारे में बात करते हैं तो हमारा ध्यान समलैंगिकों यानी लेस्बियन और गे या ट्रांसजेंडर पर ही केंद्रित रहता है। बीच में जो ‘बी’ आता है, उसके बारे में हम भूल जाते हैं। बाईसेक्शुअल या उभयलिंगी लोगों पर ज़्यादा चर्चा नहीं होती क्योंकि न तो हम समलैंगिक हैं और न ही विषमलैंगिक या ‘स्ट्रेट।’ क्योंकि हम मर्द और औरत दोनों की ओर आकर्षित होते हैं, लोग अक्सर समझ नहीं पाते कि हमें ‘स्ट्रेट’ मानें या नहीं। इसकी वजह से ‘बाई-इरेशर’ होता है। लोगों को समझ नहीं आता कि हमें किस तबके में डालें और हमारी सुने बिना ही वे हमारे बारे में हर तरह की ग़लत धारणाएं बना लेते हैं।

ऐसी कुछ ग़लतफ़हमियों को दूर करने के लिए मैं, एक बाईसेक्शुअल औरत अपनी तरफ़ से थोड़ी कोशिश कर रही हूं। ये धारणाएं स्ट्रेट और एल.जी.बी.टी.क्यू. समाज दोनों में ही प्रचलित हैं। उम्मीद है इन्हें दूर करने से बाईसेक्शुऐलिटी को समझने में थोड़ी आसानी होगी।

1. ‘बाईसेक्शुअल लोग आधा-गे और आधा-स्ट्रेट होते हैं।’

ऐसा नहीं है। बाईसेक्शुऐलिटी अपने आप में ही एक अलग यौनिक परिचय है जिसका गे या स्ट्रेट होने से कोई संबंध नहीं है। ऐसा ज़रूरी नहीं है कि एक बाईसेक्शुअल इंसान को मर्द और औरत बराबर पसंद हों। हमें किसी एक लिंग से दूसरे की अपेक्षा ज़्यादा लगाव हो सकता है। या एक की तरफ़ सिर्फ़ शारीरिक आकर्षण और दूसरे की तरफ़ शारीरिक और मानसिक आकर्षण हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि हमें दोनों लिंगों की तरफ़ आकर्षण हो मगर सामाजिक पाबंदियों के कारण हमें सिर्फ़ विपरीत लिंग के साथ संबंध बनाने का मौका मिला हो। हर इंसान के लिए उसकी बाईसेक्शुऐलिटी का अनुभव अलग होता है और हमें गे, स्ट्रेट, या दोनों घोषित कर देना सही नहीं है।

2. ‘अगर हमारा पार्टनर विपरीत लिंग का है तो हम स्ट्रेट हैं/अगर अपने लिंग का है तो हम गे हैं।’

मेरे पार्टनर का लैंगिक परिचय मेरा परिचय निर्धारित नहीं करता। अगर मैं एक पुरुष को अपना जीवनसाथी बनाऊं तो इसका मतलब ये नहीं कि मेरी बाईसेक्शुऐलिटी ख़त्म हो गई है और मैं स्ट्रेट हूं। वैसे ही अगर मैं एक औरत को अपना पार्टनर बनाऊं तो मैं लेस्बियन नहीं बन जाती। मेरा परिचय एक बाईसेक्शुअल औरत का ही रहेगा क्योंकि मुझे आकर्षण किसी भी लिंग के व्यक्ति की तरफ़ हो सकता है।

हम लोगों के बारे में जितनी कम अवधारणाएं पालेंगे, उन्हें उतना बेहतर समझ सकेंगे।

3. ‘बाईसेक्शुअल लोग कभी एक पार्टनर से संतुष्ट नहीं हो सकते।’

ये धारणा ग़लत है कि हर बाईसेक्शुअल इंसान पॉली-ऐमरस (एक से ज़्यादा पार्टनर्स को चाहनेवाला) होता है। हम ज़िंदगी भर एक इंसान के साथ खुश और संतुष्ट रह सकते हैं चाहे उसका लिंग कुछ भी हो। आकर्षण हम कभी भी किसी के लिए भी महसूस कर सकते हैं पर इसका मतलब ये नहीं है कि हम हर उस इंसान के साथ संबंध बनाना चाहेंगे जिनकी तरफ़ हम आकर्षित हों।

4. ‘बाईसेक्शुअल मर्द दरअसल गे होते हैं।’

कुछ लोग समझते हैं कि बाईसेक्शुअल मर्द समलैंगिक होते हैं और सिर्फ़ सामाजिक लांछन के डर से औरतों की तरफ़ आकर्षित होने का नाटक करते हैं। ये सच नहीं है। एक औरत की तरह ही एक मर्द भी मर्दों और औरतों दोनों को पसंद कर सकता है।

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5. ‘बाईसेक्शुअल और गे मर्द मर्द नहीं होते।’

ऐसी सोच एक रूढ़िवादी, पितृसत्तात्मक मानसिकता की निशानी है और ऐसा सोचने वालों को समझना चाहिए कि ‘मर्द’ और ‘मर्दानगी’ की कोई एक परिभाषा नहीं होती। कोई मर्द दूसरे मर्दों से प्यार करने से नामर्द नहीं बन जाता। बाईसेक्शुअल और गे मर्द स्ट्रेट मर्दों जितने ही मर्द हैं और हम सबको ये स्वीकार करना चाहिए।

6. ‘बाईसेक्शुअल औरतें ‘थ्रीसम’ के लिए तैयार होती हैं।’

स्ट्रेट मर्दों के लिए ‘थ्रीसम’ (तीन लोगों का एक साथ सेक्स करना) एक आम यौनिक इच्छा है। कई मर्दों का सपना होता है कि वे एक साथ दो औरतों के साथ यौन संबंध बनाएं। इसलिए जब कोई औरत कहती है कि वो बाईसेक्शुअल है तो कुछ मर्द तुरंत उससे पूछते हैं कि वह थ्रीसम के लिए मंज़ूर होगी कि नहीं। पहले तो ये सच नहीं है कि हर बाईसेक्शुअल औरत थ्रीसम के लिए राज़ी हो, दूसरी बात यह है कि किसी औरत को जाने बिना, उसके बारे में मनगढ़ंत धारणाओं के आधार पर उसके सामने ऐसे प्रस्ताव रखना बेहद घटिया और निचले स्तर का व्यवहार है। किसी भी औरत से ऐसे सवाल करने से पहले एक बार सोच लेना चाहिए।

7. ‘बाईसेक्शुअल लोग गे, लेस्बियन और ट्रांस लोग जितने शोषित नहीं होते।’

जहां ये बात सच है कि समलैंगिक और ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी पहचान के लिए नृशंस व्यवहार का सामना करना पड़ता है, ये सोचना ग़लत है कि बाईसेक्शुअल लोगों को इसका सामना नहीं करना पड़ता। अपने लिंग के व्यक्तियों से प्यार करने के लिए या उनकी तरफ़ अपना आकर्षण बयां करने के लिए कई बाईसेक्शुअल लोगों को भी घरेलू हिंसा और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा है। उनका जीवन संघर्ष गे या ट्रांस लोगों के संघर्ष से किसी भी अंश में कम नहीं है। हमें ज़रूरत है उनसे सौहार्द जताने की और हो सके तो उनकी सहायता करने की।

हम लोगों के बारे में जितनी कम अवधारणाएं पालेंगे, उन्हें उतना बेहतर समझ सकेंगे। उम्मीद है कि धीरे-धीरे यौनिक अल्पसंख्यकों के बारे में हमारी सभी गलतफहमियां दूर हों और हम एक प्रगतिशील भविष्य की ओर बढ़ सकें।

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तस्वीर साभार : bookstr

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