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कोई भी काम पहली बार करने में सफलता का जितना आनंद आता है, उतना ही कठिन चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। हम बात कर रहे हैं राजेश्वरी चैटर्जी की जो कि न सिर्फ भारत के कर्नाटक राज्य की पहली महिला इंजीनियर बनीं, बल्कि वह अपने समय में स्नातक और परास्नातक दोंनो की ही टॉपर भी थीं। आज जब हम तकनीक से जुड़े क्षेत्रों में महिलाओं की कम भागीदारी पर सवाल उठाते हैं, ऐसे में राजेश्वरी की कहानी दूसरी महिलाओं को विज्ञान और तकनीक से जुड़े क्षेत्रों में आने की प्रेरणा देती हैं।

राजेश्वरी का जन्म साल 1922 में कर्नाटक में हुआ था। उनके पिता, बीएम शिवरामज पेशे से एक वकील थे। राजेश्वरी की प्राथमिक शिक्षा उनकी दादी द्वारा स्थापित ‘स्पेशल इंग्लिश स्कूल’ में हुई। उनकी दादी कमलम्मा दसप्पा, खुद भी एक समाज-सुधारक थीं। साथ ही वह भारत की पहली महिला ग्रेजुएट्स में से एक थीं। वह विधवा महिलाओं के लिए काम करती थीं। राजेश्वरी का झुकाव इतिहास पढ़ने की ओर भी था पर उन्होंने गणित को प्राथमिकता दी। ‘सेंट्रल कॉलेज ऑफ बैंगलोर’ से उन्होंने गणित में ही बैचलर और मास्टर्स की डिग्री हासिल की और दोनों में ही वह अव्वल आईं। इसके लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया।

आज जब हम तकनीक से जुड़े क्षेत्रों में महिलाओं की कम भागीदारी पर सवाल उठाते हैं, ऐसे में राजेश्वरी की कहानी दूसरी महिलाओं को विज्ञान और तकनीक से जुड़े क्षेत्रों में आने की प्रेरणा देती हैं।

साल 1943 में उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स (IISc), बैंगलोर में इलेक्ट्रिकल टेक्नोलॉजी के कम्युनिकेशन्स विभाग में बतौर शोधकर्ता (रिसर्चर) के रूप में दाखिला लिया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद, भारत में अंतरिम सरकार द्वारा ‘मेधावी छात्रों’ की विदेश में पढ़ाई के लिए एक छात्रवृति शुरू की गई। इसके तहत दिल्ली सरकर से स्कालरशिप मिलने के बाद उन्होंने अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। वहां उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की मास्टर्स और पीएचडी की डिग्री हासिल की। भारतीय सरकार के एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत उन्होंने वाशिंगटन डीसी के नैशनल ब्यूरो ऑफ स्टैंडर्ड्स में 8 महीनों की ट्रेनिंग में भी हिस्सा लिया।

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वापस देश लौटना

साल 1953 में पीएचडी डिग्री प्राप्त करके माहेश्वरी वापस भारत आईं और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स में ही बतौर फैकल्टी पढ़ाने लगीं। उनका मुख्य काम ‘एलेक्टरोंमग्नेटिक थ्योरी’, ‘इलेक्ट्रोन ट्यूब सर्किट’, ‘माइक्रोवेव टेक्नोलॉजी’, और ‘रेडियो इंजीनियरिंग’ के क्षेत्रों में था। साल 1953 में ही उन्होंने सिसिर कुमार चैटर्जी, IISc के ही एक और फैकल्टी मेंबर से शादी की। दोनों ने मिलकर माइक्रोवेव इंजीनियरिंग के लिए एक लैब का निर्माण किया और इस क्षेत्र में कई शोध किए, जो कि भारत में पहला ऐसा शोधकार्य था।

इसके बाद राजेश्वरी को इलेक्ट्रिकल कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट का चेयरपर्सन भी बनाया गया। इस दौरान उन्होंने 20 विद्यार्थियों के शोध का नेतृत्व किया, 100 से अधिक शोधपत्र लिखे और सात पुस्तकें भी अपने नाम की। 1982 में रिटायर होने के बाद उन्होंने समाज सेवा में आना मन लगाया। उनका मुख्य योगदान ‘इंडियन एसोसिएशन ओफ वीमंल स्टडीज़’ में देखने को मिलता है जहाँंउन्होंने युवा महिलाओं को विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में ट्रेनिंग दी। आखिरी दम तक वह इस काम में लगी रहीं।

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पुरस्कार और विरासत

राजेश्वरी ने माइक्रोवेव इंजीनियरिंग में अपना कई कीर्तिमान स्थापित किए जिसके लिए उन्हें कई बड़े सम्मानों से नवाजा गया। इंग्लैंड में इंस्टिट्यूट ऑफ इलेक्ट्रिकल एंड रेडियो इंजीनियरिंग में ‘बेस्ट पेपर’ के लिए उन्हें माउंटबैटन पुरस्कार मिला। इंस्टिट्यूशन ऑफ एंगिनीर्स में फिर से बेस्ट पेपर के लिए उन्हें जेसी बोस मेमोरियल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। माइक्रोवेव इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उनके शोध और योगदान का इस्तमाल आज भी DRDO (डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाईजेशन) के सुरक्षा RADAR में किया जाता है। उन्होंने काफी किताबें लिखीं जिनमें उनकी आत्मकथा और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ प्रचलित हैं। साल 2010 में 88 साल की आयु में उनका निधन हो गया। उनका प्रेरणादायक चरित्र आज भी कई महिलाओं को विज्ञान और तकनीक से जुड़े क्षेत्रों में जाने के लिए उत्साहित करता रहता है। 

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सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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