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विज्ञान उन दूसरे क्षेत्रों की तरह ही है जहां पुरुषों द्वारा पुरुषों के अनुभव पर आधारित, पुरुषों के लिए ही काम किया गया। लेकिन उस एकतरफ़ा राय और नज़रिए से हुए काम को सामान्य और सार्वभौमिक भी बताया गया। जैसे साल 1871 में लिखी गई क़िताब ‘डिसेंट ऑफ मैन’ में चार्ल्स डार्विन महिला और पुरुष की बौद्धिक क्षमता को अलग-अलग स्तर का बताते हुए कहते हैं कि महिलाओं की मानसिक-बौधिक क्षमता पुरुषों से कम होती है और इसलिए पुरुष उनसे बेहतर हैं। फ्रांसिस गेलटन ने ‘ब्यूटी मैप’ गढ़ा था जिसमें महिलाओं को सबसे ‘सुंदर’ से सबसे ‘बदसूरत’ की श्रेणी में डालने के तरीक़े बताए गए थे। कई प्रसिद्ध पुरुष वैज्ञानिकों ने ऐसी महिला विरोधी मानसिका का परिचय दिया है।

पाठक पूछ सकते हैं कि अगर पुरुष वैज्ञानिकों के कई काम या टिप्पणियां महिला विरोधी थीं तो आज साल 2021 में नारीवादी चश्मे से हमें उन्हें कैसे देखना चाहिए और क्या किया जाए कि विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं को उनका ऐतिहासिक रूप से बकाया सम्मान हासिल हो। विज्ञान और तकनीक के फार्मूला और थियरी की दुनिया में रहते हुए आम लोग के तौर पर हम दो काम कर सकते हैं। पहला किसी भी पुरुष वैज्ञानिक को पढ़ते हुए उन्हें लेकर तार्किक रहें, ख़ासकर जेंडर और महिलाओं को लेकर की गई उनकी बातों को लेकर, उसे नारीवादी दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करें, अगर उस पर नारीवादी आलोचना उपलब्ध है तो उसे पढ़ें। दूसरा, महिला वैज्ञानिकों के बारे में जानकारी इकट्ठा करें।

इस दूसरे बिंदु के तहत आज हम बात करेंगे कमला सोहोनी की। कमला सोहोनी भारत की पहली महिला थीं जिन्होंने विज्ञान में पीएचडी हासिल की थी, साल 1939 में। कमला सोहोनी का जन्म 1912 में इंदौर शहर, मध्यप्रदेश में हुआ था। घर के पुरुष सदस्यों का नाता विज्ञान से था। उनके पिता नारायण राव भागवत और चाचा माधवराव भागवत रसायनज्ञ (केमिस्ट) थे। वे दोनों प्रतिष्ठित संस्थान टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ साइंसेज़ के विद्यार्थी थे। वे भारतीय विज्ञान संस्थान से डिग्री हासिल करने वाले रसायन विज्ञान के पहले बैच से थे। कमला इन दोनों को देखते हुए ही बड़ी हुई थीं।

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जब अपने दाखिला के लिए सत्याग्रह पर बैठीं कमला

परिवार में पढ़ाई-लिखाई के माहौल के कारण उस समय की कई अन्य महिलाओं से बेहतर शिक्षा पाने के सिलसिले में उनके साथ पहली बात ये हुई कि साल 1933 में कमला को बॉम्बे विश्वविद्यालय से बीएससी की डिग्री मिली, मुख्य विषय रसायन विज्ञान, सहायक विषय भौतिक विज्ञान। स्नातक में उन्हें अपनी कक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त हुए। इसके बाद परास्नातक के लिए उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान में रिसर्च फेलोशिप में दाखिले के लिए आवेदन किया। 

उनका आवेदन स्वीकार नहीं हुआ। तब भारतीय विज्ञान संस्थान के प्रमुख प्रोफ़ेसर सीवी रमन थे। वह सीवी रमन जिन्हें विज्ञान के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार मिला था। वह सीवी रमन जो अपने विषय के जानकार कहे जाएंगे, वह पितृसत्तात्मक मानसिकता से ग्रसित थे। उन्होंने कमला सोहोनी का आवेदन केवल इसलिए खारिज किया क्योंकि वह एक महिला थीं। रमन के अनुसार वह जगह महिलाओं के लिए नहीं थी, महिलाएं विज्ञान के उस संस्थान में रिसर्च कर पाने जितनी क़ाबिल नहीं होती थीं, वह अनुसंधान के काम को आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं थीं। कमला के पिता और चाचा भी जब इस मामले में कुछ नहीं कर पाए तब कमला डॉक्टर रमन के ऑफिस के बाहर ‘सत्याग्रह’ पर बैठ गईं। डॉक्टर रमन को अंत में उन्हें दाख़िला देना पड़ा पर उन्होंने तीन निम्नलिखित शर्तें रखीं

1- कमला को एक नियमित उम्मीदवार के रूप में अनुमति नहीं दी जाएगी और पहले वर्ष के लिए प्रोबेशन पर भी काम करने के बाद उन्हें पूरे परिसर में जाना जाएगा।

2- कमला को अपने गाइड के निर्देशानुसार देर रात तक काम करना होगा।

3- वह प्रयोगशाला के वातावरण को खराब नहीं करेंगी (पुरुष शोधकर्ताओं के लिए ‘ध्यान भंग’ करने का काम नहीं करेंगी)

इन शर्तों को आप देखें तो पाएंगे कि ये एक शोधार्थी की गरिमा और स्वाधिकार को खारिज़ तो करते ही हैं बल्कि तीसरी शर्त उस सोच से प्रेरित है जो मानती है कि मर्द तो मर्द ही होते हैं इसलिए महिलाओं को काबू में रखा जाना चाहिए यै उन्हें खुद को काबू में रखना चाहिए।

अपने परास्नातक के लिए उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान में रिसर्च फेलोशिप में दाखिले के लिए आवेदन किया। उनका आवेदन स्वीकार नहीं हुआ। तब भारतीय विज्ञान संस्थान के प्रमुख प्रोफ़ेसर सीवी रमन थे। उन्होंने कमला साहनी का आवेदन केवल इसलिए खारिज किया क्योंकि वह एक महिला थीं। अपने दाखिले के लिए कमला सत्याग्रह पर बैठ गईं।

साल 2021 में भी यह बात रेप, यौन हिंसा के सर्वाइवर के मामलों में सुनने में आती है जब कहा जाता है कि महिला किस समय सड़क पर थी या उसने कैसे कपड़े पहने थे। ऑनलाइन स्लट शेमिंग के मामले में यही कुतर्क आता है कि महिलाओं को अपनी तस्वीरें नहीं डालनी चाहिए क्योंकि ऑनलाइन स्पेस में कोई उन तस्वीरों का गलत इस्तेमाल कर सकता है। हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बयान दिया था कि महिलाओं को कम कपड़ों में देखकर किसी पुरुष को ‘कुछ’ महसूस न हो तो वह रोबोट है। ये सारे बयान और उस समय डॉक्टर सीवी रमन द्वारा रखी गई वह शर्त पुरुषों की अभद्र सोच, अश्लील व्यवहार को ‘प्राकृतिक’ कहकर नज़रंदाज़ कर देते हैं और महिलाओं को कंट्रोल में रखने की बात कहते हैं। इसलिए एक प्रयोगशाला जैसी जगह जहां विज्ञान के महत्वपूर्ण शोध होते हैं वहां भी एक महिला को शोधकर्ता से पहले उसके शरीर के कारण ‘मोह भंग’ करने की कोई चीज़ मानी गई और पुरुष शोधकर्ताओं को केवल पुरुष मन जिनके डिस्ट्रैक्ट होने से उनके द्वारा किए जा रहे जरूरी काम पर असर न पड़े। शोधकर्ताओं के बीच यह जेंडर के आधार पर किया गया भेदभाव ही था।

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उस स्पेस में अपनी जगह पाने का कोई और रास्ता नहीं देखते हुए कमला सोहोनी ने शर्तें कुबूल कर लीं। साल 1933 में संस्थान में प्रवेश पाने वाली वह पहली महिला बनीं। यह बात जितनी गौरव की है उतनी ही सोच में डालती है कि उस स्पेस में काम करने का अनुभव कमला के लिए कितना असहज करने वाला होता होगा। आगे उन्होंने एक सभा में अपनी इस उदासी को बयां भी किया। यह सभा भारतीय महिला वैज्ञानिक संघ की ओर से आयोजित की गई थी और कमला सोहोनी को मुख्य वक्ता के तौर पर आमंत्रित किया था। उन्होंने कहा था, “यद्यपि रमन एक महान वैज्ञानिक थे, लेकिन वह बेहद संकीर्ण सोच के थे। मैं उस तरह से कभी नहीं भूल सकती जैसे उसने मेरे साथ व्यवहार किया क्योंकि मैं एक महिला थी। फिर भी, रमन ने मुझे नियमित छात्र के रूप में स्वीकार नहीं किया। यह मेरा अपमान था। महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह उस समय बहुत बुरा था। अगर कोई नोबेल विजेता भी इस तरह से व्यवहार करता है तो बाकियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?”

आईआईएससी में कमला के गुरु श्रीनिवासराय हुए। कमला ने इस दौरान दूध, दाल, फलियों में मौजूद प्रोटीन का काम किया। संस्थान में कमला ने पढ़ाई में अपनी पूरी जान लगा दी। साल 1936 में कमला ने अपनी परस्नातक की डिग्री डिस्टिंक्शन के साथ हासिल की। इसके साथ ही उन्होंने आगे की रिसर्च के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से शिक्षावृत्ति भी हासिल कर ली। इसका परिणाम यह हुआ कि अगले वर्ष सीवी रमण ने संस्थान के दरवाजे महिला विद्यार्थियों के लिए भी खोलने पड़े, उनका महिलाओं को लेकर बनाया गया पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह हार चुका था। 

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साल 1937 में कमला सोहोनी ने वैज्ञानिक रोबिन हिल के नेतृत्व में काम करना शुरू किया। रोबिन कमला के काम से बहुत प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने कमला को प्रोफ़ेसर फ्रेडरिक होपकिंस की लैब में काम करने का सुझाव दिया। फ्रेडरिक होपकिंस नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक थे। उनके साथ काम करने के लिए वैज्ञानिकों को फेलोशिप जीतने की ज़रूरत पड़ती थी। कमला ने यह फेलोशिप जीती और प्रोफ़ेसर के साथ काम करना शुरू किया। कमला का रिसर्च पीरियड सोलह महीने का था। उनकी रिसर्च पोषण से जुड़ी थी और उसे चालीस पन्नों में ही लिख दिया गया। उनके काम से रिसर्च कमिटी प्रभावित हुई और उनके पेपर को स्वीकार किया गया। इस तरह साल 1939 में विज्ञान में पीएचडी कर पाने वाली वह पहली महिला बनीं। 

कमला सोहोनी ने भारत में अपने बाद की उन महिलाओं के लिए विज्ञान के क्षेत्र में राह आसान की। उन्होंने स्त्री विरोधी मानसिकता से भरी राय रखने वाले वैज्ञानिक स्पेस में पहला कदम रखा और इसके लिए हमारी इस पुरखिन को हमेशा नारीवादी विमर्श याद रखेगा।

उनके पास कई कंपनियों द्वारा काम करने के ऑफ़र आ रहे थे, लेकिन उन्होंने भारत लौटना ठीक समझा। वह महात्मा गांधी से प्रभावित थीं और भारत आकर उनके साथ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ना चाहती थीं और अपना योगदान देना चाहती थीं। उन्हें दिल्ली के लेडी हार्डिंग कॉलेज में, जीव रयासन विभाग में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति मिली। बाद में, उन्होंने पोषण अनुसंधान प्रयोगशाला, कुन्नूर में सहायक निदेशक के रूप में काम किया, जो विटामिन के प्रभावों पर केंद्रित था। उसने एम.वी. सोहोनी से शादी की। इसके बाद वह शामिल हुई रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस जैव रसायन विभाग में एक प्रोफेसर के रूप में, जहां उन्होंने पोषण संबंधी पहलुओं पर काम किया। माना जाता है कि वैज्ञानिक समुदाय में मौजूदा लैंगिक पूर्वाग्रह के कारण संस्थान के निदेशक के पद पर उनकी अंतिम नियुक्ति में चार साल की देरी हुई है। इस अवधि के दौरान, कमला और उनके छात्रों ने खाद्य पदार्थों के तीन समूहों पर महत्वपूर्ण शोध किया, जो भारत में लोगों के आर्थिक रूप से वंचित वर्गों द्वारा प्रमुखता से सेवन किए जाते हैं।

राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के सुझाव पर उन्होंने ‘नीरा’ (ताड़ी की एक प्रजाति से निकलने वाला सैप) नाम के पेय पदार्थ के ऊपर भी काम किया। उनका लक्ष्य नीरा में मौजूद पोषक तत्वों का पता लगाना था, ताकि यह आर्थिक रूप से कमज़ोर समुदाय आदिवासी समुदाय के महिलाओं, बच्चों के लिए पोषण के संदर्भ में यह उनके लिए मददगार साबित हो, इस काम के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाज़ा गया। उन्होंने पता लगाया कि नीरा में विटामिन और आयरन की मात्रा बहुत अधिक है इसलिए इसका प्रयोग गर्भवती महिलाओं और शिशुओं के स्वास्थ्य के संरक्षण में किया जा सकता है। वह कंज्यूमर गाइडेंस सोसायटी की सक्रिय सदस्य रहीं और 1982-83 में इसकी कमिटी अध्यक्ष थीं। उन्होंने ग्राहकों की सुरक्षा के लिए आने वाली पत्रिका ‘कीमत’ में लेख लिखे। साल 1969 में उन्होंने अपना काम से संन्यास ले लिया। साल 1998 में उन्होंने आखिरी सांस ली।

कमला सोहोनी ने भारत में अपने बाद की उन महिलाओं के लिए विज्ञान के क्षेत्र में राह आसान की। उन्होंने स्त्री विरोधी मानसिकता से भरी राय रखने वाले वैज्ञानिक स्पेस में पहला कदम रखा और इसके लिए हमारी इस पुरखिन को हमेशा नारीवादी विमर्श याद रखेगा। एक महिला जिसके घर में शिक्षा का माहौल था, जो उस ज़माने में विदेश पढ़ने जाने में सक्षम हो सकीं, जब उनके लिए जेंडर के आधार पर चीजें इतनी मुश्किल थी तो वंचित समुदाय से कोई महिला कितनी भी क़ाबिल हुई होंगी उनके लिए दोहरा तिरहरा शोषण पार करना कितना मुश्किल होगा और आज भी है।

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(नोट : मैंने इस लेख को लिखते हुए पाया है कि कमला सोहोनी की मां को लेकर कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। कुछ विज्ञान से स्नातक किए जानकारों से पूछने पर भी कोई जानकारी हासिल नहीं हुई। कमला एक वंचित परिवार से नहीं आती थीं कि उनकी मां का नाम संसाधन या सूचना की कमी में दर्ज नहीं हो पाया हो, तथ्यों के आधार पर ऐसा मैं मान रही हूं। फिर भी उनकी मां का नाम तक मालूम नहीं चला।)

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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