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“वह तो एकदम मुसहिन जैसे लगती है, क्या चमारों जैसी शक्ल बनाए हो।” अक्सर मेरे गाँव में ऐसी कई सारी जातिवादी बातें इंसान की शारीरिक बनावट और खासकार उनके रंग को लेकर सुनने को मिलती हैं। बता दें कि यहां मुसहिन का मतलब मुसहर जाति से है, जो दलित समुदाय में भी सबसे निचले पायदान की एक जाति है। हाल ही में मैं एक मीटिंग में गई थी जिसमें अलग-अलग गाँव से आई महिलाओं के बीच लड़कियों के रंग-रूप को लेकर चर्चा शुरू हुई।

चर्चा में एक तथाकथित सवर्ण जाति की महिला ने मुझे कहा, “तुम्हारा चेहरा तो ठीक है, लेकिन अगर थोड़ा रंग साफ़ (गोरा) होता ठीक रहता।” उस महिला की इस बात पर जवाब में एक दूसरी महिला ने कहा “अरे छोटी बिरादरी में रंग बहुत साफ़ नहीं रहता है।” जातिगत टिप्पणी के साथ रंगभेद की बात मेरे लिए नयी नहीं थी। बचपन से ही मैंने ऐसे बातें सुनी हैं जहां हमेशा मेरे सांवले रंग को मेरी जाति से जोड़ा गया। चूंकि ये भेदभाव बचपन से ही देखा है, इसलिए अब बुरा कम लगता है। लेकिन इस भेदभाव वाली सोच के बीच कई बार ख़ुद को निराश पाती हूं।

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एक दिन बसुहन गाँव की मुसहर बस्ती की किशोरियों के साथ जब मैं बैठक करके वापस आने लगी, तभी दूसरी बस्ती की कुछ महिलाओं ने मुझे रास्ते में रोका और कहा कि इस बस्ती की लड़कियों को कुछ भी बताने या सिखाने का कोई मतलब नहीं है। उनकी मुंह की बनावट ही अजीब रहती है। इस बात पर मेरी उनसे ख़ूब बहस हुई।

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मुसहर बच्चों के साथ काम करते हुए आए दिन उनके स्कूल और गाँव की अलग-अलग बस्तियों के साथ उनके ऐसे अनुभव अक्सर सुनने को मिलते हैं। छोटे-छोटे बच्चे शिकायत करते हैं कि उनकी जाति को उनके रंग से जोड़कर उन्हें अपशब्द कहा जाता है और उन्हें नीचा दिखाया जाता है। यह इस तथाकथित सभ्य समाज की वह कड़वी सच्चाई है जिससे हाशिए पर रहने वाले समुदाय लगातार दो-चार हो रहे हैं। हमारे समाज में एक पल भी यह भूलने नहीं दिया जाता है कि हम किस जाति से हैं। ख़ासकर तब जब आप पिछड़ी या दलित से ताल्लुक़ रखते हैं।

“जातिगत टिप्पणी के साथ रंगभेद की बात मेरे लिए नयी नहीं थी। बचपन से ही मैंने ऐसे बातें सुनी हैं जहां हमेशा मेरे सांवले रंग को मेरी जाति से जोड़ा गया। चूंकि ये भेदभाव बचपन से ही देखा है, इसलिए अब बुरा कम लगता है। लेकिन इस भेदभाव वाली सोच के बीच कई बार ख़ुद को निराश पाती हूं।”

कभी वर्ग के आधार पर तो कभी रंगत के आधार पर। धर्म और संस्कृति के आधार पर अक्सर धर्मग्रंथ का हवाला देकर यह कहा जाता है कि सवर्ण जाति के लोगों का रंग गोरा और दलित जाति के लोगों का रंग काला होता है। रंग के साथ जाति के इस जुड़ाव की वजह से समाज में जातिगत भेदभाव की परतें और ज़्यादा मोटी हो जाती हैं। यह भेदभाव की भाषा हिंसा के एक क्रूर रूप में होती है।

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जाति और रंग दोनों ही ब्राह्मणवादी पितृसता को बढ़ावा देने वाले मज़बूत माध्यम हैं। इसके बावजूद अक्सर कहा जाता है कि रंगभेद विदेशों में होता है भारत में नहीं। लेकिन इसके बावजूद हमारे हिंदी अख़बारों में गोरी बहू की मांग सबसे अधिक होती है। गोरी रंगत पाने के लिए कई तरह के उत्पादों का बाज़ार हमारे समाज काफ़ी ज़्यादा फैला हुआ है। ये सब कितने सफल और असफल है ये कह पाना मुश्किल है। लेकिन यह बात तो तय है कि यह उत्पाद भले ही सांवली या काली रंगत को गोरे में बदलने का दावा करें, लेकिन जाति के साथ रंगत की बनी समाज की पितृसत्तात्मक धारणा को कभी नहीं बदल सकते हैं। इंसानों के साथ रंगभेद करना एक बड़ी कुरीति है और जब इस रंगभेद का जुड़ाव जाति से हो जाता है तो इस कुरीति का रूप और भी ज़्यादा पीड़ादायक हो जाता है। सांवली या काली रंगत को लेकर समाज में नकारात्मक छवि इंसानों को बांटने का मज़बूत आधार है।

भारत में रंग, जाति, समुदाय और बहुत कुछ के आधार पर कई तरह के भेदभाव और शोषण मौजूद हैं। अलग-अलग आधारों पर होने वाला यह शोषण अपने भारतीय समाज में भेदभाव की कुरीति को और भी ज़्यादा जटिल बना रहे हैं और हर दिन बढ़ती ये जटिलताएं हमारे वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करती हैं। बेशक शिक्षा और विकास के क्षेत्रों में हम आगे बढ़ रहे है लेकिन जाति और रंग के आधार पर होने वाले ये भेदभाव युवाओं की पूरी पीढ़ियों को पीछे धकलने अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। 

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तस्वीर साभार: Empowered Journalism

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