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‘ब्राह्मण, 27 वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट (एमबीए) पास स्व-व्यसायी युवक के लिए सर्वगुण सुंदर, स्लिम, संस्कारी, गृहकार्य दक्ष, विश्वसनीय, ईमानदार व शाकाहारी वधु चाहिए।’ नौकरी केवल सरकारी टीचर और केवल सर्व-ब्राह्मण परिवार ही स्वीकार्य सम्पूर्ण कुंडली मिलान और 36 गुणयोग, बायोडाटा फोटो सहित सम्पर्क करें।’ यह दकियानूसी भाषा मेट्रिमोनियल विज्ञापन की है, जो हर अमूमन हमें अखबारों और अब ऑनलाइन भी देखने को मिलती है। सालों गुज़र जाने के बाद भी ये विज्ञापन आज भी उतने ही रूढ़िवादी और जातिवादी हैं। बदलते दौर में ऐसे विज्ञापन और अधिक पितृसत्तात्मक सोच से ग्रस्त हो गए हैं। साल 2021 में भी ‘घरेलू और संस्कारी’ गुणों से लबरेज़ लड़कियों की मांग हूबहु बनी हुई है। अब इस लिस्ट में वर्जिन लड़की की डिमांड के साथ ‘नो एल्कोहल और नो स्मोकिंग’ जैसी बातें भी शामिल हो गई हैं।

समय के साथ शादी के लिए छपने वाले विज्ञापनों में खुलकर अपनी मांग जाहिर की जा रही हैं। आर्थिक लेन-देन से पहले व्यवहारिक मांग में वधु यानि लड़की के लिए ज्यादा शर्ते लागू हैं। लैंगिक आधार पर बनी रूढ़िवाद धारणाएं और मांग इन वैवाहिक विज्ञापनों में लगातार अपनी जकड़ बनाए हुए हैं। दूसरा इन सब में यह भी दिखता है कि कैसे हमारे सामाज में विवाह की मूल सोच को नकारते हुए इसे वैवाहिक सौदा बनाया गया है जिसमें जाति, धर्म, गोत्र का ध्यान रखना सबसे पहले आवश्यक है।

सुंदर सुशील और स्लिम

हिंदी सिनेमा का यह गीत ‘सुंदर, सुशील, थोड़ी स्पेशल ढूढ़ेंगे’ शादी के लिए वर-वधु खोजने की सामाजिक सोच को ज़ाहिर करता है। आज भी अधिकतर मांग लड़कियों और उनके परिवार से ही की जाती है। इश्तिहारों में छपी लाइनों में लड़कियों में अमुक गुणों की मांग के लंबे-चौड़े ब्यौरे दिए जाते हैं। लड़की सुंदर, सुशील, स्लिम, गोरी, घरेलू काम में दक्ष, उत्तम पाककला, कॉन्वेंट शिक्षित लड़की, कमाऊ, शाम होने से पहले घर लौटने वाली नौकरी, ईमानदार, विश्वसनीय जैसी होनी चाहिए। इन सबको पढ़कर ऐसा लगता है जैसे हम किसी प्रॉडक्ट की खोज के लिए दिए विज्ञापन को देख रहे हैं। पारंपरिक पितृसत्तात्मक विवाह व्यवस्था में वक्त के साथ भले ही कुछ बदलाव आए हो, लड़को को लेकर कुछ लड़की पक्ष अपनी मांग जाहिर करने लगे हैं। कुछ विज्ञापनों में बिना दहेज और कोई जाति बाधा न होने जैसी बातें भले ही लिखी जा रही हैं लेकिन विज्ञापन देनेवाले अपनी जाति का उल्लेख करना नहीं भूलते हैं। वास्तविक रूप अपनी जाति से इतर शादी करना कितना कठिन होता है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी हमारे समाज में अपनी पसंद से शादी करने वाले जोड़े को जान तक गंवानी पड़ती है। डिजिटल माध्यमों से शादी के लिए वधु खोजने वालों की लिस्ट में ‘लड़की की सोशल मीडिया न चलानी’ जैसे शर्त भी खुले तौर पर लिखी जा रही है।

विज्ञापनों में लड़का और लड़की के लिए अलग-अलग मांग रखना यह सब दिखा रहा है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में विवाह कितनी खोखली संस्था है जिसमें लैंगिक भेदभाव और शोषण पूर्णरूप से व्याप्त है।

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शादी के बारे जब बातें की जाती हैं तो कहा जाता है कि यह एक सहज साझीदारी है जिसमें दो लोग मिलकर समानता से साथ रहते हैं। यहीं एक रिश्ता होता है जिसमें स्त्री और पुरुष समान होते हैं, जिसमें दोंनो साथियों का बराबर का हक और दोंनो की बराबर ज़िम्मेदारियां होती हैं। दूसरी ओर, मेट्रिमोनियल विज्ञापनों की भाषा पर गौर करें तो इनके आधार पर तो शादी की मान्यताएं कुछ ओर हैं। समान साझीदारी से दूर यहां पूरी तरह से ग़ैर-बराबरी से होती शादियां दिखती हैं। शादी से पहले ही विज्ञापनों में लड़का और लड़की के लिए अलग-अलग पैमाने बना दिए जाते हैं। जहां पर लड़की के साथ किसी सामान की खरीदारी करते समय किए जाने वाला व्यवहार किया जा रहा है। विज्ञापनों में लड़का और लड़की के लिए अलग-अलग मांग रखना यह सब दिखा रहा है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में विवाह कितनी खोखली संस्था है जिसमें लैंगिक भेदभाव और शोषण पूर्णरूप से व्याप्त है।

आखिर कब बदलेंगे वैवाहिक विज्ञापन

अखबार में छपा विज्ञापन हो या फिर टीवी पर मेट्रिमोनियल साइट्स के आने वाले बेशुमार विज्ञापनों में असल तौर पर स्थित लैंगिक भेदभाव साफ दिखता है। अखबारों में जो लड़कियों के गुणों की लिस्ट छपी होती है उसे टीवी के विज्ञापनों में आसानी से प्रस्तुत किया जा रहा है। चाय की ट्रे पकड़े नजरें झुकाए खड़ी लड़की, केवल मां-बाप ही आखिरी फैसला तय करेंगे दूसरी और टीवी विज्ञापनों में केवल गोरी दिखने वाली लड़कियों को जगह देना, यह सब दिखाता है कि शादी के बाजार में किस तरह से लैंगिक असमानता को सबके सामने आसानी जाहिर किया जा रहा है। पूंजीवाद के दौर में शादी के बाजार में महिला का शोषण और अधिक नये पैमाने बनाकर किया जा रहा है।

भारतीय परिवारों में शादी के नाम पर माता-पिता की रज़ामंदी के आधार पर जातीय व धार्मिक व्यवस्था को लागू किया जाता आ रहा है। मेट्रिमोनियल साइट्स इन बातों को ध्यान में रखते हुए जाति, धर्म, समुदाय, क्षेत्र और व्यव्साय जैसे वर्गों को अपनी साइट्स में बांटे हुए हैं। ये साइट्स नयी-नयी मेंबरशिप प्लान लाकर लोगों से पैसे लेकर उनकी रिश्तें ढूढ़ने में मदद कर रही हैं। यही नहीं, वर्तमान में एनआरआई वर के लिए भी इन साइट्स पर अलग से ऑप्शन उपलब्ध है। देश से दूर अमेरिका, इग्लैंड की धरती पर बैठे दूल्हों को भी जब दुल्हन की खोज होती है तो उनके दिए विज्ञापनों में भी सुंदर, सुशील, गोरी, रसोई के काम में परिपक्व दुल्हनों की मांग होती हैं। जाति, वर्ग का विशेष ध्यान इस उच्च वर्ग में विदेशी धरती पर भी बना हुआ है।

भारतीय परिवारों में शादी के नाम पर माता-पिता की रजामंदी के आधार पर जातीय व धार्मिक व्यवस्था को लागू किया जाता आ रहा है। मेट्रिमोनियल साइट्स इन बातों को ध्यान में रखते हुए जाति, धर्म, समुदाय, क्षेत्र और व्यव्साय जैसे वर्गों को अपनी साइट्स में बांटे हुए है।

शादी के बाजार में ‘परफेक्ट रिश्ता’ खोजने के लिए दिए इन विज्ञापनों पर लोग बेहिचक अपना पैसा खर्च कर रहे हैं। एक उचित रिश्ते की तलाश में घंटो प्रोफाइल खोजने वाले इस शादी के बाज़ार में गांरटी का कोई वायदा नहीं है। हाल ही में बेंगलुरु की उपभोक्ता अदालत ने एक व्यक्ति के द्वारा एक ऑनलाइन वैवाहिक साइट्स के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायद दर्ज किया। इसके जवाब में कोर्ट ने कहा कि मेट्रिमोनियल साइट्स विवाह की गारंटी नहीं देती हैं। यह शादी का केवल आकर्षण बनाते हैं, यह ज़रूरी नहीं है कि यह शादी भी पक्का ही कराए। दरअसल परपैक्ट मैचिंग के नाम पर मेट्रिमोनियल साइट्स अपने सदस्यों से मोटी रकम तो वसूलती हैं, साथ में सामाजिक रूढ़िवाद को ओर अधिक मजबूत भी कर रही हैं। दुल्हन की खोज को हर कसौटी पर खरा उतरने वाले विज्ञापनों की भाषा किसी इंसान के चुनाव के लिए कम और समान के लिए ज्यादा लगती है।

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यह बात साफ जाहिर है कि इन वैवाहिक विज्ञापनों और साइट्स की भाषा समाज की उसी मानसिकता को दिखाते हैं, जो शादी और प्रेम के नाम पर सबसे ज्यादा दकियानूसी है। लोगों को बहू और बीवी के नाम पर जो ब्यूटी क्वीन और रसोइया चाहिए होती है वह ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की ही मानसिकता है। जहां पर स्त्री सुंदर हो ताकि परिवार की अगली पीढ़ी यानि बच्चे सुंदर हो सके। दूसरा स्त्री का पढ़ा-लिखा होना उतना आवश्यक नहीं है जितना कि उसकी घरेलू कार्यों में दक्षता। सोचकर देखिए रिश्ते से पहले जब विज्ञापन में लड़की के लिए एक पूरी लिस्ट बना दी गई हो तो वास्तव में देख-दिखाई की रस्मों में उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाता होगा। किसी लड़की को सिर्फ उसके रंग के नाम पर या फिर उसके कद के नाम पर नकार देना उसकी मानसिक स्थिति कितना गहरा आघात पहुंचता होगा। दहेज जैसी स्थिति तो बाद में आती है यहां तो शुरुआत में ही शादी के पैमाने पर ही खरा उतरने के लिए एक इंसान पर कितना अधिक दबाव बनाया जा रहा है।

लड़कों के लिए बहुत सीमित शब्द उपयोग करने वाले विज्ञापनों में वक्त के साथ लड़कियों की हर तरह की स्वतंत्रता को सार्वजनिक रूप से कुचला जा रहा है। नो स्मोकिंग, नो ऐल्कोहल जैसी बातों से अलग लड़की की वर्जिनिटी की मांग करते यह विज्ञापन भारतीय शादी व्यवस्था में एक महिला की स्थिति दर्शाते हैं। इससे पूरा अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे पैमानों से बनी शादियों में एक स्त्री के पास कोई स्वतंत्रता नहीं होती है। महिला के गुणों की फेहरिस्त में उसकी यौन आज़ादी को सम्मान और रीति के नाम पर बहुत आसानी से खत्म किया जा रहा है। वहीं, लड़के कुछ भी कर सकते हैं। ना उन पर सुंदर या सुशील होने का दवाब डाला जाता है न ही उससे उसकी यौनिकता को लेकर कोई सवाल किया जाता है।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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