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दुनिया के अलग-अलग देशों में अबॉर्शन को लेकर अलग-अलग कानून, नज़रिया और धारणाएं मौजूद हैं। इतिहास में जाएं तो दुनिया भर के अलग-अलग देशों में अबॉर्शन के कानून को लेकर सरकार के फैसलों पर विरोध-प्रदर्शन, अबॉर्शन के अधिकार के लिए सड़कों पर उतरते लोग और इस कानून में अनेक बदलाव देखे गए हैं। पिछले दिनों जब अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने टेक्सस में छह सप्ताह के गर्भधारण के बाद अबॉर्शन पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून को रोकने से इनकार किया, तो अबॉर्शन के अधिकार पर काम करनेवाले लोगों और एक्टिविस्टों में निराशा छा गई।

टेक्सस में गवर्नर ग्रेग एबॉट के तथाकथित ‘हार्टबीट कानून‘ यानि भ्रूण में हृदय गतिविधि का पता चलने के बाद 6 हफ्ते के बाद अबॉर्शन के प्रतिबंध से जुड़े कानून के ख़िलाफ़ लोगों ने जोरदार विरोध किया। वहीं, पोलैंड की सरकार ने भ्रूण में कोई विकार या दोष होने पर अबॉर्शन पर प्रतिबंध लगाने वाले अदालत के फै़सले को अपनी सहमति दी। इस फैसले के विरोध में लोग बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतर आए। इसके बाद, राष्ट्रवादी कानून और न्याय (PiS) सरकार पहलेपहल इस कानून पर रोक लगाने को मजबूर हो गई। माना जाता है कि यूरोप के सबसे धार्मिक कैथोलिक देशों में रूढ़िवादी नीतियां तेजी से अपनी जड़ें जमा रही हैं जिनमें पोलैंड सबसे ऊपर है। जहां यूरोप के कुछ देशों में अबॉर्शन से जुड़े कानून को और मुश्किल बनाया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर दक्षिणी यूरोप के छोटे से देश सैन मैरिनो ने अबॉर्शन को वैध बनाने के पक्ष में मतदान कर सालों पुराने अबॉर्शन कानून के विपरीत इतिहास रचा। भारत के पड़ोसी देश चीन में भी पिछले दिनों अबॉर्शन को लेकर सरकार के रवैये में बदलाव देखा गया। चीन की सरकार के मुताबिक देश में अब मेडिकली अनावश्यक अबॉर्शन के प्रसार को कम करने के प्रयास किए जाएंगे।

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आज भी अधिकतर देशों में अबॉर्शन एक धार्मिक, नैतिक और राजनीतिक विवाद का मुद्दा बना हुआ है। इसलिए लोगों का सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन के विकल्प को स्वतंत्रता से चुनना आज भी मुश्किल भरा है। मानवाधिकार संगठनों ने अबॉर्शन को डिक्रिमनाइलज़ यानि अपराध मुक्त करने की आवश्यकता पर स्पष्ट निर्देश दिया है। मानवाधिकार मानकों के अनुसार अबॉर्शन सेवाओं तक सबकी पहुंच सुनिश्चित करना, महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को खत्म करने और उनके स्वास्थ्य के अधिकार के साथ-साथ मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए हर देश का दायित्व होना चाहिए। यूएन ह्यूमन राइट्स के अनुसार प्रत्येक वर्ष लगभग 7.9 फीसद मातृ मृत्यु का कारण असुरक्षित अबॉर्शन होता है, जिससे सबसे ज्यादा गरीबी या हाशिए पर जी रहे लोग प्रभावित होते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार असुरक्षित अबॉर्शन से लगभग सभी मौतें उन देशों में होती हैं, जहां अबॉर्शन के कानून सख्त रूप से प्रतिबंधित है। 

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यह वीडियो  Médecins Sans Frontières और www.HowToUseAbortionPill.org. की साझेदारी के तहत बनाया गया है। यह वीडियो सीरीज़ ये समझने में मददगार साबित होगी कि अबॉर्शन पिल्स सुरक्षित और आपकी पहुंच में हैं। पूरी वीडियो सीरीज़ देखने के लिए यहां क्लिक करें।

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क्या है टेक्सस और पोलैंड का नया अबॉर्शन कानून और क्यों हुआ विरोध 

सीनेट बिल 8 के रूप में पेश किया गया अधिनियम ‘हार्टबीट एक्ट’ टेक्सस के गवर्नर ग्रेग एबॉट के हस्ताक्षर के जरिए कानून के रूप में लाया गया। यह कानून भ्रूण में दिल की गतिविधि का पता चलने के बाद, छह सप्ताह के बाद ही अबॉर्शन पर प्रतिबंध लगाता है। रॉयटर्स में छपी एक रिपोर्ट में विशेषज्ञों की राय अनुसार, इस समय सीमा तक ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे गर्भवती हैं। इसके अलावा यह 85-90 फीसद अबॉर्शन प्रक्रिया होने की समय सीमा से काफी पहले है। टेक्सस में अबॉर्शन पर बढ़ते प्रतिबंधों का विरोध करने और अबॉर्शन प्रक्रिया के संवैधानिक अधिकार को बनाए रखने के लिए, हजारों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ टेक्सस और अमेरिका के अलग-अलग शहरों में विरोध-प्रदर्शन किया।

आज भी अधिकतर देशों में अबॉर्शन एक धार्मिक, नैतिक और राजनीतिक विवाद का मुद्दा बना हुआ है। इसलिए लोगों का सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन के विकल्प को स्वतंत्रता से चुनना आज भी मुश्किल भरा है।

इस कानून से पहले फर्टिलाईज़ेशन के बाद 20 सप्ताह तक ईलेक्टिव यानि वैकल्पिक अबॉर्शन की अनुमति थी। राष्ट्रपति जो बाइडन के इस मामले में संज्ञान लेने के बाद, इस फैसले पर अस्थायी रूप से निचली अदालत ने रोक लगाई थी। लेकिन अमेरिका के फेडरल अपील्स कोर्ट ने टेक्सस के इस अबॉर्शन कानून को लागू कर दिया। द वॉशिंगटन पोस्ट में छपी रिपोर्ट क मुताबिक इस कानून के लागू होने से लोगों को अबॉर्शन प्रक्रिया के लिए अब मजबूरन राज्य से बाहर जाना पड़ रहा है।

पिछले दिनों पोलैंड में सरकार विरोधी प्रदर्शन तब शुरू हो गए जब देश की सर्वोच्च अदालत ने अबॉर्शन के नियमों को और कठिन बना दिया। सरकार ने भ्रूण में कोई विकार या दोष होने पर अबॉर्शन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला सुनाया, जो मुख्य रूप से पोलैंड में पहले से मौजूद ‘सख्त कैथोलिक’ अबॉर्शन विरोधी कानून को और प्रतिबंधित कर देगा। पोलैंड में अबॉर्शन केवल उन मामलों में वैध है, जब गर्भावस्था किसी आपराधिक घटना का परिणाम हो या जब महिला के जीवन या स्वास्थ्य को खतरा हो।

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चीन में बदली गई अबॉर्शन से जुड़ी पॉलिसी 

दशकों से चीन में ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ यानि ‘एक बच्चे की नीति’ के बाद अब सरकार मेडिकली ‘अनावश्यक अबॉर्शन’ के प्रसार को कम करने का प्रयास करेगी। द न्यू यॉर्क टाइम्स में छपी रिपोर्ट अनुसार सरकार इसके लिए कोई दिशा निर्देश नहीं दिया है कि इसे कम कैसे किया जाएगा। अभी तक सरकार यह स्पष्ट रूप से नहीं बता पाई है कि क्या इस नयी नीति के अंतर्गत अबॉर्शन के अधिकार पर प्रतिबंध को प्रोत्साहित किया जाएगा। हालांकि द न्यू यॉर्क टाइम्स की खबर अनुसार सरकार ने इस योजना में महिलाओं तक कॉन्ट्रासेप्टिव सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने की बात की है। आधुनिक चीन में अबॉर्शन का इतिहास सरकार के जनसंख्या नियंत्रण के लक्ष्य से जुड़ा हुआ है। साल 1980 में लागू की गई एक बच्चे की नीति के तहत हज़ारों महिलाओं को अबॉर्शन और नसबंदी कराने के लिए मजबूर किया गया था। यह कहना मुश्किल है कि इस दबाव में कितनी महिलाओं का अबॉर्शन किया गया था। लेकिन चीन के सबसे बड़े मीडिया ग्रुप के अखबार द पीपल्स डेली की एक रिपोर्ट अनुसार सरकार ने करीब 400 मिलियन जन्म को इस पॉलिसी के तहत टालने का दावा किया था।

सख्त अबॉर्शन कानून और सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन से जुड़ी समस्याओं का संबंध

लोगों का सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन तक पहुंच के लिए अबॉर्शन का वैध होना ही नहीं, बल्कि इससे जुड़े कानून का रूढ़िवादी या पितृसत्तात्मक न होना भी आवश्यक है। अबॉर्शन के कानून पर प्रतिबंध सीधा-सीधा अबॉर्शन सेवाओं की उपलब्धता, इसके खर्च, इससे जुड़े मिथक, स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने वालों की अबॉर्शन के प्रति रवैया या आपत्ति और अबॉर्शन में देरी से जुड़ा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जब लोगों के पास अबॉर्शन तक सुरक्षित पहुंच नहीं होती तो वे असुरक्षित उपायों का सहारा लेते हैं। ऐसे में, दुनिया भर में लोगों का सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन के सुविधा का लाभ उठा पाना संभव नहीं।

साल 2010 से 2014 तक के आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में हर साल लगभग 25 मिलियन असुरक्षित अबॉर्शन होते हैं। आज यह साबित हो चुका है कि पहली तिमाही में, लोग अबॉर्शन के लिए दवाओं का उपयोग करके सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन को सुरक्षित और प्रभावी ढंग से कर सकते हैं। डबल्यूएचओ के अनुसार सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन न सिर्फ सुरक्षित तरीका है, बल्कि चिकित्सा के दुनिया में स्वीकार किया गया खुद कर पाने वाली मेडिकल प्रक्रिया भी है। 

लोगों का सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन तक पहुंच के लिए अबॉर्शन का वैध होना ही नहीं, बल्कि इससे जुड़े कानून का रूढ़िवादी या पितृसत्तात्मक न होना भी आवश्यक है।

जहां लैंगिक समानता को मानवाधिकार के रूप में मान्यता मिल चुकी है, अबॉर्शन के अधिकार के लिए लोगों का सड़कों पर विरोध करना दुर्भाग्यपूर्ण है। आज अनेक देशों में अबॉर्शन को अपराध मुक्त घोषित किया गया है। हाल ही में मेक्सिको के सुप्रीम कोर्ट ने अबॉर्शन को अपराध मुक्त करने का फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि गर्भधारण समाप्त करने को आपराधिक मानकर सजा तय करना असंवैधानिक है। मेक्सिको मुख्य रूप से एक रोमन कैथोलिक देश है और इसलिए यह एक ऐतिहासिक फैसला माना जा रहा है। लेकिन दूसरी ओर, ब्राज़ील में महिलाएं अबॉर्शन के अधिकार के लिए आज भी संघर्ष कर रही हैं। वहीं, अर्जेंटीना गर्भावस्था के 14वें सप्ताह तक और बलात्कार जैसे मामलों में उसके बाद भी या जब एक महिला के स्वास्थ्य को खतरा हो, तो इलेक्टिव अबॉर्शन को वैध बनाने वाला लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा देश बन चुका है। लैटिन और दक्षिण अमरीकी देशों में केवल तीन अन्य देश ने इससे पहले अबॉर्शन को वैध घोषित किया था। इसमें साल 1965 में क्यूबा, 1995 में गुयाना और 2012 में उरुग्वे शामिल है।

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साल 2021 में दक्षिण अमरीकी देश इक्वाडोर ने बलात्कार से हुए गर्भधारण के मामलों में अबॉर्शन को वैध घोषित कर दिया। इसके अलावा, यूरोप के छोटे से देश सैन मैरिनो के निवासियों ने अबॉर्शन को वैध बनाने के समर्थन में साल 1865 के बने कानून के विपरीत भारी मतदान किया। इसके साथ-साथ न्यूजीलैंड, थाईलैंड और आयरलैंड ने भी हाल के वर्षों में अबॉर्शन के प्रतिबंधों को कम करने के लिए प्रयास किए हैं। हालांकि अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने साल 1973 में अबॉर्शन को कानूनी रूप से वैध बना दिया था। लेकिन पिछले कुछ दशकों में, देश भर के कई जगहों में अबॉर्शन प्रक्रिया तक महिलाओं के पहुंच में तेजी से गिरावट आई है। माना जाता है कि इसकी वजह अलग-अलग जगहों के अबॉर्शन के कानून को अधिक कठिन बना देना रहा है।

संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या और विकास पर हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (आईसीपीडी) ने प्रजनन और यौन स्वास्थ्य अधिकार में व्यक्ति के जीवन, उसकी स्वतंत्रता और सुरक्षा को मान्यता दी है। इसके साथ-साथ, स्वास्थ्य देखभाल और सेवाओं की सूचना, स्वास्थ्य सेवाओं के संसाधनों का बिना भेदभाव सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध होना और उस तक पहुंच के अधिकार की बात कही गई है। इसमें यौन और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने में खुद का अधिकार, स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में सूचित सहमति और गोपनीयता के अधिकार को सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। यूएन ह्यूमन राइट्स के अनुसार महिलाओं का यौन और प्रजनन स्वास्थ्य; जीवन का अधिकार, हिंसा से मुक्त होने का अधिकार, स्वास्थ्य और निजता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और भेदभाव को निषेध करने वाला ऐसे कई मानवाधिकारों से जुड़ा है।

अधिकतर देशों में आज भी अबॉर्शन को एक यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार, जरूरत या मानवाधिकार के रूप में देखने की नज़रिए की कमी है। अबॉर्शन पर बनते या बदलते कानून मूलतः सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपंथ और राजनीतिक मुद्दों से प्रभावित होते हैं। इसलिए अबॉर्शन को कानूनी, सामाजिक और धार्मिक मान्यता नहीं मिलने पर अबॉर्शन करवाने वाले को इसे छिपाने और गैर कानूनी तरीके से करवाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसके अलावा, अबॉर्शन के बाद स्वास्थ्य देखभाल में कमी या मातृ मृत्यु भी हो सकती है। साथ ही, इससे जुड़े फैसलों में उन्हें शामिल नहीं किया जाता, जो इससे सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। एक विकसित और प्रगतिशील देश में लोगों के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के लिए अबॉर्शन का अधिकार दिया जाना अनिवार्य होना चाहिए।

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(यह लेख HowToUse Abortion Pill और फेमिनिज़म इन इंडिया की पार्टनशिप के तहत लिखा गया है। HTU अबॉर्शन पिल्स से जुड़े तथ्य, रिसोर्स जैसे अबॉर्शन पिल्स लेने से पहले किन बातों का ख्याल रखना चाहिए, ये पिल्स कहां उपलब्ध हो सकती हैं, इनका इस्तेमाल कैसे किया जाए और कब चिकित्सक की ज़रूरत पड़ सकती है, जैसी जानकारियां साझा करने का काम करता है। HTU का सेफ़ अबॉर्शन असिस्टेंट Ally अबॉर्शन पिल्स से जुड़ी सभी जानकारियों पर आपकी मदद के लिए 24/7 उपलब्ध है। आप Ally से हिंदी और अंग्रेज़ी दो भाषाओं में बात कर सकते हैं। साथ ही फ्री वॉट्सऐप  नंबर +1 (833) 221-255 और  http://www.howtouseabortionpill.org/ के ज़रिये भी आप मदद ले सकते हैं)

तस्वीर साभार: BBC/Getty Images

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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