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भारत में हर साल 9 नवंबर को ‘राष्ट्रीय कानूनी सेवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। सभी कानूनी सेवा प्राधिकरण इस दिन को समाज के कमज़ोर, वंचित वर्गों को मुफ्त कानूनी सलाह और सेवाएं प्रदान करने और कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के घोषित उद्देश्य को पूरा करने के लिए मनाते हैं। साथ ही यह सुनिश्चित करते हैं कि आर्थिक या अन्य कारकों के कारण किसी भी नागरिक को न्याय प्राप्त करने के अवसरों से वंचित नहीं किया जाता है।

कई बार जानकारी के अभाव में लोग अपने अधिकारों को नहीं समझ पाते हैं और वे लगातार शोषण का सामना करते रहते हैं। खासकर वे लोग जो कि समाज के वंचित-शोषित तबके से आते हैं। यदि उन्हें उनके अधिकारों के बारे में जागरूक न किया जाए तो वे शोषणकारी ताकतों के हाथों लम्बे समय तक शोषित होते रहते हैं। घरेलू हिंसा का सामना करनेवाली महिलाएं जो कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं वे पैसे के अभाव के कारण अपने लिए आवाज़ नहीं उठा पाती क्योंकि शोषणकारी पति के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए उन्हें आर्थिक, कानूनी मदद की ज़रूरत पड़ती है। ऐसे में यह कानून उनको मुफ्त कानूनी सुविधा उपलब्ध करवाता है। कानूनी सहायता महिलाओं के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है, अपने किसी मसले में वकील ढूंढ़ने से लेकर वकील मिलने और मुकदमा लड़ने दोनों के मामले में।

कानूनी सेवा सभी को मिले और सिर्फ पैसे न होने की वजह से कोई न्याय से वंचित न रह जाए, इसके लिए हमारे देश में निशुल्क कानूनी सहायता के लिए साल 1987 में कानून बनाया गया। ऐसे सभी व्यक्ति कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत कानूनी सेवाएं प्राप्त करने के हकदार होंगे बशर्ते कि संबंधित प्राधिकारी संतुष्ट हो कि ऐसे व्यक्ति के पास मुकदमा चलाने या बचाव करने के लिए प्रथम दृष्टया मामला है। 

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निशुल्क कानूनी सहायता किसे मिलेगी?

यह अधिनियम मुफ्त कानूनी सेवाओं के हकदार व्यक्तियों की एक सूची निर्धारित करता है जिसमें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति; मानव तस्करी के सर्वाइवर, महिलायें (उनकी वित्तीय स्थिति की परवाह किए बिना), अट्ठारह वर्ष से कम उम्र के बच्चे, मानसिक बीमारी के मरीज़, विकलांग व्यक्ति, आपदा के पीड़ित, जातीय हिंसा, जातिगत अत्याचार, बाढ़, सूखा, भूकंप या औद्योगिक आपदा के पीड़ित, वह व्यक्ति जो अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम के तहत सुरक्षात्मक गृह में या किशोर न्याय अधिनियम, 1986 के तहत एक किशोर गृह में या मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम के तहत एक मनोरोग अस्पताल में हिरासत में है, साथ ही वे लोग जिनकी वार्षिक आय संबंधित राज्य सरकार द्वारा निर्धारित राशि से कम है, इत्यादि। 

मुफ्त कानूनी सहायता भारत के संविधान के अनुच्छेद 39A के तहत निहित एक निर्देश है जो समाज के गरीब और कमजोर वर्गों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करता है और सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करता है। लेकिन, इस निर्देश को न्यायमूर्ति भगवती द्वारा हुसैन आरा खातून (1979) के ऐतिहासिक निर्णय में मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय देकर कि भारत के संविधान में मुफ्त कानूनी सहायता जीवन के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक आवश्यक सहवर्ती है।

न्यायमूर्ति भगवती ने कहा कि अनुच्छेद 39A इस बात पर जोर देता है कि मुफ्त कानूनी सेवा ‘उचित, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण’ प्रक्रिया का एक अनिवार्य तत्व है; क्योंकि इसके बिना आर्थिक या अन्य अक्षमताओं से पीड़ित व्यक्ति न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित हो जाएगा। इसलिए, मुफ्त कानूनी सेवाओं का अधिकार स्पष्ट रूप से किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के लिए ‘उचित, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण’ प्रक्रिया का एक अनिवार्य घटक है और इसे अनुच्छेद 21 की गारंटी में निहित माना जाना चाहिए।

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निशुल्क कानूनी सहायता कहां-कहां मिलेगी?

इस कानून के तहत 3 प्राधिकरण की स्थापना की गई है :

1. राष्ट्रीय स्तर पर NALSA (National legal service authority)  

यह राष्ट्रीय स्तर पर मुफ्त कानूनी सहायता देने से संबंधित योजनाएं और नीति बनाता है।

2. राज्य स्तर पर SALSA (State legal service authority) 

यह राज्य के स्तर पर मुफ्त कानूनी सहायता देने से संबंधित योजनाएं और नीति बनाता है और NALSA के अंतर्गत कार्य करता है।

3. जिला स्तर पर DALSA (District legal service authority)

यह जिला स्तर पर मुफ्त कानूनी सहायता देने से संबंधित योजनाएं और नीति बनाता है और DALSA के अंतर्गत कार्य करता है

किन तरह के मामलों के लिए इस कानून के तहत मुफ्त कानूनी सहायता मिलती है?

सभी प्रकार के मामलों में, चाहे आपराधिक मामला या दीवानी मामला हो, निशुल्क कानूनी सहायता मिलती है। 

कौन मुफ्त कानूनी सहायता प्राप्त नहीं कर सकता ?

इन व्यक्तियों द्वारा निशुल्क कानूनी सहायता प्राप्त नहीं की जा सकती- मानहानि के आरोपित व्यक्ति, द्वेषपूर्ण अभियोजन, अदालती की अवमानना या झूठी गवाही, किसी भी चुनाव से संबंधित कार्यवाही, आर्थिक अपराधों और सामाजिक कानूनों के खिलाफ अपराधों के संबंध में, जैसे अस्पृश्यता या जाति पूर्वाग्रह या पूर्वाग्रहों के खिलाफ शिकायतें, इत्यादि।

कहां से सहायता प्राप्त की जा सकती है?

जो व्यक्ति मुफ्त कानूनी सेवा प्राप्त करना चाहता है वह अपने नज़दीक के न्यायालय परिसर में जाकर इसकी जानकारी ले सकता है। सभी न्यायालयों के परिसर में इनका ऑफिस होता है। उपर्युक्त व्यक्ति द्वारा इनके ऑफिस से सम्पर्क करके मुफ्त कानूनी सलाह पाई जा सकती है। ऑनलाइन रूप से भी आवेदन करके मुफ्त कानूनी सेवा प्राप्त की जा सकती है।

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स्रोत : https://nalsa.gov.in/

तस्वीर साभार: Lawrato

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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