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‘ज़ीरो एफआईआर’ की अवधारणा “न्याय में देरी का मतलब न्याय से वंचित है” पर आधारित है यानि अगर पीड़ित व्यक्ति को समय पर कानूनी सहायता नहीं मिल पाती है तो न्याय की कोई आशा नहीं रह जाती है। ज़ीरो एफआईआर का मतलब है कोई भी व्यक्ति किसी घटना की किसी भी पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा सकता है। फिर चाहे वह पुलिस स्टेशन घटना का स्थान या अधिकार क्षेत्र से बाहर हो। इसे बाद में जांच शुरू करने के लिए/जांच शुरू होने के बाद अधिकार क्षेत्र वाले पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित किया जा सकता है। ज़ीरो एफआईआर दर्ज करने में विफल रहने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ आईपीसी की धारा 166ए के तहत अभियोजन और विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप मामले के बाद भारत की मौजूदा कानूनी व्यवस्था में कई संशोधन किए गए और ज़ीरो एफआईआर भी उनमें से एक संशोधन है। ‘ज़ीरो एफआईआर’ की अवधारणा को न्यायमूर्ति वर्मा की समिति द्वारा आपराधिक कानून संशोधन में सम्मिलित करने का प्रस्ताव दिया गया था जिसे बाद में कानून में सम्मिलित कर लिया गया। 

‘एफआईआर’ और ‘ज़ीरो एफआईआर’ में अंतर

एफआईआर और ज़ीरो एफआईआर में मुख्य अंतर यह होता है कि एक साधारण ‘एफआईआर’ घटना से संबंधित अधिकार क्षेत्र वाले थाने में सीरियल नंबर से दर्ज की जाती है। जबकि ज़ीरो एफआईआर के मामले में, एफआईआर बिना क्रमांक के या क्रमांक ‘0’ के साथ क्षेत्राधिकार वाले पुलिस थाने के अलावा किसी भी अन्य पुलिस स्टेशन में प्राथमिक रूप से दर्ज की जाती है। इस बिना नंबर की एफआईआर को बाद में संबंधित पुलिस स्टेशन को सौंप दिया जाता है जहां इसे नंबर दे दिया जाता है और आगे की कार्रवाई की जाती है।

ज़ीरो एफआईआर का उद्देश्य

  • न्याय में देरी और किसी भी प्रकार के व्यवधान से बचने के लिए। 
  • केस में जल्द से जल्द एक्शन लेने के लिए पुलिस को बाध्य करना। 
  • एफआईआर दर्ज़ होने के तुरंत बाद समय पर अधिकार क्षेत्र लिया जाए।
  • ताकि मामले की जांच सही तरीके से हो सके और मामले को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके।

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कौन जीरो एफआईआर दर्ज करा सकता है ?

  • अपराध से पीड़ित व्यक्ति
  • पीड़िता के परिवार का सदस्य
  • अपराध का गवाह
  • वह व्यक्ति जिसने अपराध किया है
  • एक पुलिस अधिकारी
  • कोई अन्य व्यक्ति जिसे इस तरह के अपराध के बारे में पता चला हो।

जीरो एफआईआर के बारे में हर महिला को जानना क्यों ज़रूरी है ?

कई बार ऐसा होता है कि किसी महिला दोस्त या रिश्तेदार के साथ किसी दूसरे शहर या राज्य में कोई घटना घटित होती है। ऐसे में यदि पीड़िता खुद पुलिस स्टेशन नहीं जा पाती और किसी और अन्य क़रीबी को इसके बारे में बताने में असमर्थ होती है तो दूर के शहर या राज्य में बैठे उसका कोई भी जानने वाला जिसे उस घटना की जानकारी हो वह अपने शहर या राज्य में उस घटना की जीरो एफआईआर दर्ज करा सकता/सकती है। इससे उस पीड़िता को समय रहते मदद मिल जाती है और समय पर कार्रवाई शुरू हो जाती है। उदाहरण के लिए, आसाराम रेप मामले में अपराध की घटना का स्थान जोधपुर, राजस्थान के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन पुलिस स्टेशन कमला मार्केट, दिल्ली में एफआईआर दर्ज की गई, फिर इसे आगे की जांच के लिए जोधपुर स्थानांतरित कर दिया। इसके बाद जोधपुर पुलिस ने जांच शुरू की।

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एक बार ज़ीरो एफआईआर दर्ज होने के बाद, पुलिस बिना किसी प्रारंभिक कार्रवाई या जांच के उस मामले को उपयुक्त पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित नहीं कर सकती है। बलात्कार, हत्या, यौन उत्पीड़न, दुर्घटना आदि जैसे अपराधों में पुलिस को तुरंत कार्रवाई करने की आवश्यकता होती है यानि पुलिस को नमूने, प्रत्यक्षदर्शियों से जानकारी, परिस्थितिजन्य साक्ष्य आदि एकत्र करने की ज़रूरत होती है। ऐसे संग्रह केवल एफआईआर दर्ज करने के बाद ही किए जा सकते हैं। किसी भी केस में साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और उन्हें भ्रष्टाचार से या ख़त्म करने/होने से बचाना आवश्यक है। हाथरस गैंग रेप केस 2020 में दलित महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उसे बेरहमी से प्रताड़ित किया गया। घटना के बाद पीड़िता का भाई थाने में शिकायत दर्ज कराने गया जहां पुलिस ने सवर्ण जाति के आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में देरी की। इस प्रकार के हालत से निपटने के लिए ही जीरो एफआईआर कानून में शामिल की गई है।

पुलिस स्टेशन एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकता

सीआरपीसी की धारा 154 के अनुसार, “अगर किसी थाने को संज्ञेय अपराध के संबंध में कोई सूचना प्राप्त होती है, तो उक्त पुलिस थाना एफआईआर दर्ज करने के लिए बाध्य है। हालांकि, अगर अपराध उक्त थाने के अधिकार क्षेत्र में नहीं हुआ है तो ज़ीरो एफआईआर दर्ज करने के बाद, उसे जांच के लिए संबंधित पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित करना होगा, जहां अपराध किया गया है, एक जीरो एफआईआर किसी भी पुलिस स्टेशन में उनके निवास या अपराध की जगह की परवाह किए बिना दायर की जा सकती है।” इसलिए कोई भी पुलिस अधिकारी ऐसी जीरो एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकता, भले ही अपराध पुलिस थाने के अधिकार क्षेत्र से बाहर किया गया हो।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक तेलंगाना में एक दिशा नामी लड़की के लापता होने की उसके मां- बाप ने थाने में शिकायत करवाई लेकिन पुलिस स्टेशन से उन्हें यह कहकर वापस कर दिया गया कि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर का है। परिवार ने पहले राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा पुलिस स्टेशन से संपर्क किया था, लेकिन उन्हें शमशाबाद पुलिस स्टेशन भेज दिया गया। बाद में परिवार ने सूबेदारी पुलिस स्टेशन में ज़ीरो एफआईआर दर्ज कराई। ज़ीरो एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच शुरू की गई। बाद में लापता महिला का शव पुलिस को मिला। परिवार का आरोप था कि इस सब में कीमती समय बर्बाद हुआ। अगर पुलिस ने शिकायत को समय रहते दर्ज किया होता और थोड़ी देर पहले जांच शुरू कर दी तो लापता महिला को बचाया जा सकता था।

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पीड़िता को सुरक्षित और संरक्षित किया जाता है

ज़ीरो एफआईआर की अवधारणा यह सुनिश्चित करने के लिए भी है कि पीड़िता या मुखबिर प्रक्रियात्मक कानूनी तकनीकी से सुरक्षित है। यह भी सुनिश्चित करता है कि न्याय में देरी या इनकार न हो। ज़ीरो एफआईआर कानूनी प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलने में भी सहायक होती है।

यात्रा के दौरान फायदेमंद

यदि यात्रा के दौरान कोई अपराध किया जाता है, तो पीड़ित अपनी यात्रा के दौरान निकटतम पुलिस स्टेशन में पहुंच सकती है और घटना की ज़ीरो एफआईआर दर्ज करा सकती है। इसके बाद पुलिस थाने की जिम्मेदारी बनती है कि वह उसे उपयुक्त थाने में भेजे।

जागरूकता फैलाने में मदद करता है

ज़ीरो एफआईआर का विचार काफी नया है और अक्सर पुलिस खुद इस प्रकार के संशोधन से अनजान होती है। त्रासदी यह है कि जनता में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की कमी और सरकार की ओर से जागरूकता फैलाने में कमी भी इस प्रावधान को विफल कर रही है। ज़ीरो एफआईआर एक ऐसा प्रावधान है जो पीड़ित को बिना समय बर्बाद किए जांच के लिए अपील करने में मदद कर सकता है। बहुत बार, पीड़ितों को पुलिस अधिकारियों द्वारा एफआईआर दर्ज करने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है क्योंकि जिस क्षेत्र में अपराध हुआ है वह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। यहाँ तक ​​कि स्वयं नागरिक भी अक्सर अपने कानूनी अधिकारों से अवगत नहीं होते हैं और यह नहीं जानते कि वे अब देश के किसी भी पुलिस स्टेशन में ज़ीरो एफआईआर दर्ज करा सकते हैं। एक बार जब हम स्वयं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाते हैं, तो हम न्यायिक प्रणाली और आम जनता के बीच शिक्षा और जागरूकता फैलाने में योगदान दे सकते हैं।

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तस्वीर साभार : Tribune India

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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