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संगीता भाभी (बदला हुआ नाम) को उस दिन भी उनके पति में मारा था। शराबी पति और घर में आर्थिक तंगी से परेशान होकर संगीता भाभी ने सिलाई टीचर का काम शुरू किया था, जिसके बाद उनके साथ होने वाली घरेलू हिंसा और बढ़ गई थी। पहले पति घर के काम का बहाना बोलकर उनके साथ मारपीट करता, लेकिन अब उसका ग़ुस्सा सिर्फ़ संगीता भाभी के काम पर था। उसे यह बिल्कुल भी पसंद नहीं था कि उसकी पत्नी बाहर काम करने जाए। इसके लिए वह हर दिन उनके साथ मारपीट करता लेकिन उस दिन जब मैंने संगीता भाभी के चेहरे पर चोट का निशान देखा तो उनसे पूछा कि ये कैसे हुआ? उन्होंने पहले झूठ बोल दिया कि वह गिर गई थी। फिर बाद में उन्होंने बताया कि उनके साथ उनके पति ने काम को लेकर मारपीट की थी। संगीता भाभी से जब मैंने इसपर बात करनी चाही तो उन्होंने साफ़ कहा शादी-परिवार में ये सब आम है। पति-पत्नी में झगड़ा होता रहता है, इसमें इतना भी कुछ ग़लत नहीं है। न ही ऐसी ज़रूरत है कि इस मामले को घर से बाहर गांव-समाज के चार लोग या थाने-कचहरी तक ले ज़ाया जाए। मैंने उन्हें काफ़ी समझाने की कोशिश की पर उन्होंने मुझे ये कहकर चुप करवा दिया कि अभी मेरी शादी नहीं हुई है, इसलिए मैं ऐसे बोल रही हूं। जिस दिन शादी हो जाएगी, मैं सब सीख जाऊंगी।

संगीता भाभी जैसे कई औरतों को मैं अपने गांव और घर के आसपास हिंसा का शिकार होते हुए देखती हूं। कई बार हिंसा खून-ख़राबे तक चली जाती है, उसके बाद फिर सब एक होकर ऐसा दर्शाते हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। ‘इज़्ज़त’ के नाम पर महिलाएं ख़ुद भी अपने साथ होने वाली घरेलू हिंसा के बारे बोलना तो दूर, सोचना भी नहीं चाहती हैं। कई बार जब संगीता भाभी जैसी महिलाओं के ज़वाब सुनती हूं तो ऐसा लगता कि जैसे शादी के साथ उन्होंने अपने साथ होने वाली हिंसा को शादी के हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया है पर हमें ये समझने की ज़रूरत है कि घरेलू हिंसा सिर्फ़ महिला के ही नहीं बल्कि उसके बच्चे या हिंसा होने वाले घर में रहने वाले बच्चों के ऊपर भी बुरा प्रभाव डालती है।

कई बार लोग ये कहते हैं कि अशिक्षा और जागरूकता की कमी से घरेलू हिंसा बढ़ती है, पर ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है जो ये बताए कि शिक्षित और जागरूक परिवारों में घरेलू हिंसा नहीं होती है।

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आठ साल का सोनू अपनी मां को अक्सर गाली देता है, जब उसकी मां उसे डांटती या मारती है तो वह ये कहता है, “पापा तो मारते हैं तब उनको नहीं कुछ कहती, हम तो सिर्फ़ गाली दिए।” यह पितृसत्तात्मक हिंसा ही है जो हमारे घर के लड़कों को बुरे मर्द और लड़कियों को सब कुछ सहने और चुप रहने वाली औरत के रूप में बड़ा करती है। जब एक घर में बच्चे अपने मां, बुआ, दीदी या किसी भी महिला के साथ हिंसा को देखते हुए बड़े होते हैं तो उनको ये सब सामान्य लगने लगता है। लड़के ये सोचने लगते हैं कि महिलाओं पर हिंसा करना उनका हक़ है, जिससे वे असली मर्द कहलाते हैं। वहीं, लड़कियां ये सोचने लगती हैं कि चाहे कितनी भी हिंसा बढ़े, हमें सहते जाना है और रिश्तों को निभाना है। ये सब बच्चे बिना किसी के बोले या सिखाए, अपने आप ही सीखते जाते हैं क्योंकि कई पाठ हमें किताबें नहीं बल्कि हमारा माहौल सीखाता है। अब जब हमलोग ये सोचते हैं कि आख़िर महिला अपने साथ होने वाली हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ क्यों नहीं उठा रही? इसका सीधा-सा जवाब हमें ये समझ आया कि महिलाएं अपने साथ होने वाली हिंसा को पहचान ही नहीं पाती है। उन्हें गाली देना, मारपीट करना, सहमति के बिना यौन संबंध बनाना, ये सब सामान्य लगता है। ज़ाहिर है जब वह हिंसा और इसके प्रभावों को गंभीरता नहीं समझ पाती तो इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए अपना मन भी नहीं बना पाती है।

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कई बार लोग ये कहते हैं कि अशिक्षा और जागरूकता की कमी से घरेलू हिंसा बढ़ती है, पर ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है जो ये बताए कि शिक्षित और जागरूक परिवारों में घरेलू हिंसा नहीं होती है। असलियत में शिक्षा का हिंसा से सीधेतौर पर कोई लेना-देना नहीं है। इसका ताल्लुक़ सीधे सोच से है, वह सोच जो लैंगिक भेदभाव और महिला हिंसा को सही मानती है। वही सोच जो यह मानती है कि महिलाओं का काम सिर्फ़ घर संभालना और खाना बनाना है, इसलिए वह महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए कोई काम नहीं करते हैं। घरेलू हिंसा रोकने के उपाय कई बताए जा सकते हैं, पर मूल उपाय है महिलाओं को अपने साथ होने वाली हिंसा और इसके प्रभावों को पहचानना क्योंकि जब एक़बार हमें किसी भी समस्या और उसके प्रभावों का ज्ञान हो जाता है तो हम अपने आप अपनी स्थिति के हिसाब से उस समस्या से निकलने का रास्ता खोज लेते हैं।

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तस्वीर साभार : Huffpost

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