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इक्कीसवीं सदी में दुनिया में सभी के पास शौचालय की सुविधा होना आज भी एक सपने के समान है। वर्तमान में दुनिया की एक बड़ी आबादी के पास स्वच्छता और उससे जुड़ी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। पूरी दुनिया के लगभग 3.6 बिलियन लोगों के लिए शौचालय तक पहुंच आज भी एक दूर की बात है। स्वच्छ शौचालय की पहुंच सब तक बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र हर साल 19 नवंबर को विश्व शौचालय दिवस मनाता है। इसका उद्देश्य सतत विकास लक्ष्य-6 को हासिल करना है। साल 2030 तक सभी लोगों के लिए पानी और स्वच्छता की उपलब्धता कराना है। इस साल का विश्व शौचालय दिवस का थीम ‘वैल्यूईंग टॉयलेट’ है।

शौचालय और उसकी स्वच्छता की कमी के कारण दुनियाभर में बड़ी संख्या में लोग गंदगी से फैलने वाली बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। खुले में शौच एक बड़ी समस्या बनी हुई है। ग्लोबल वॉटर्स के अनुसार विश्व में तीन में से एक व्यक्ति के घर में स्वच्छ शौचालय की कमी है। शौचालय और उसकी स्वच्छता की कमी स्वास्थ्य, आर्थिक विकास, निजी विकास में बाधा उत्पन्न करती है। मुख्यतौर पर यह लड़कियों और महिलाओं के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करती है। मनुष्य का स्वच्छता में निवेश उसके स्वास्थ्य के स्तर को बढ़ाता है और उसके काम के स्तर को भी ऊंचा करता है। हर साल दुनिया में हजारों बच्चे गंदगी से फैलने वाली बीमारी के कारण मर जाते हैं।

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शौचालय न होने की वजह से लड़कियों और महिलाओं में निरक्षरता, उत्पीड़न का जोखिम और खराब स्वास्थ्य की समस्या बढ़ती है। ऐसी कई खबरें सामने आ चुकी है कि महिलाओं नें शौचालय न होने के कारण अपनी ससुराल जाने से मना कर दिया है, तलाक की मांग या फिर मंगलसूत्र बेचकर शौचालय बनवाया है। ये खबरें यह बताती है कि तमाम तरह की राष्ट्रीय स्तर की योजना, करोड़ो रुपयों का बजट और बड़े-बड़े ऐलान भारत में आज भी एक चुनावी वायदा बना हुआ है।

शौचालय की कमी और गंदगी के कारण विश्व में बहुत से लोगों की मौत हर साल होती है। हैजा, डायरिया, हेपेटाइस-ए, टाइफाइड जैसी बीमारी गंदगी होने के कारण फैलती है। साथ ही गंदगी कुपोषण को भी बढ़ाती है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के मुताबिक, दुनिया में 7,75,000 लोगों की समय से पहले मौत हो गई। यह विश्वभर में हुई मौतों का 1.4 प्रतिशत था। कम आय वाले देशों में यह हिस्सा ज्यादा देखा गया। कम आय वाले और उच्च आय वाले देशों में यह अंतर साफ देखा गया है। उप-सहारा अफ्रीका और एशिया के देशों में स्वच्छता के अभाव से मरने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है। यहां 1000 पर 50 लोग इस कारण अपनी जान गंवा देते हैं। वहीं यूरोप में यह संख्या 1000 पर 0.1 है। पानी की कमी और शौचालय का अभाव का मुद्दा निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।    

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भारत में शौचालय की कमी बरकरार

विश्व में दूसरी बड़ी आबादी वाले देश, भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है, जिनके पास शौचालय नहीं हैं। इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल आबादी के केवल चालीस प्रतिशत लोग ही स्वच्छता की सुविधा का लाभ उठा पा रहे हैं। इस मामले में भारत की स्थिति पड़ोसी मुल्क श्रीलंका(95%), पाकिस्तान और बांग्लादेश(60%) से भी खराब है। शौचालय न होने की वजह से लड़कियों और महिलाओं में निरक्षरता, उत्पीड़न का जोखिम और खराब स्वास्थ्य की समस्या बढ़ती है। ऐसी कई खबरें सामने आ चुकी है कि महिलाओं नें शौचालय न होने के कारण अपनी ससुराल जाने से मना कर दिया है, तलाक की मांग या फिर मंगलसूत्र बेचकर शौचालय बनवाया है। ये खबरें यह बताती है कि तमाम तरह की राष्ट्रीय स्तर की योजना, करोड़ो रुपयों का बजट और बड़े-बड़े ऐलान भारत में आज भी एक चुनावी वायदा बना हुआ है। प्राथमिक स्तर की जरूरत हर घर में शौचालय जैसी बातें वह चुनावी वादा बनकर रह गई हैं जो हर चुनाव से पहले नेताओं की ज़ुबान पर आ जाता है। स्वच्छ भारत मिशन के बाद से देशभर में बन रहे शौचालय और वास्तविकता को उजागर करती बहुत सी रिपोर्ट इस बात पर मोहर लगाती हैं कि कैसे भारत में शौचालय की अनुपलब्धता अभी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

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शौचालय का न होना महिलाओं के जीवन को अधिक प्रभावित करता

महिलाओं के लिए शौचालय का न होना उनके जीवन के कई पहलूओं पर असर डालता है। शौचालय की कमी उनकी सामाजिक, शिक्षा और स्वास्थ्य की जरूरतों को प्रभावित करती है। महिलाओं के लिए स्वच्छता जैविक कारणों, सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों की वजह से अधिक महत्वपूर्ण है। पीरियड्स शुरू होने के बाद शौचालय की कमी लोगों के जीवन को और चुनौतीपूर्ण बना देती है। इसका असर उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर तो पड़ता ही है साथ ही यह कमी उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी हानि पहुंचाती है। महावारी के दौरान स्वच्छता की आम दिनों के मुकाबले ज्यादा आवश्यकता होती है। एनडीटीवी की एक खबर के मुताबिक हर साल महावारी शुरू होने के बाद 23 मिलियन लड़कियां अपनी पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर होती हैं। महावारी के दौरान शौचालय की अधिक आवश्यकता इसका एक कारण है। स्कूल और सार्वजनिक स्थानों पर शौचालयों के नहीं होने के कारण लड़कियों और महिलाओं को घंटो पेशाब रोकना पड़ता है जिससे उन्हें किड़नी, पेशाब में सक्रंमण और प्रजनन से संबधी बीमारियां होने का खतरा बना रहता है।

महिलाओं के लिए शौचालय का न होना उनके जीवन के कई पहलूओं पर असर डालता है। शौचालय की कमी उनकी सामाजिक, शिक्षा और स्वास्थ्य की जरूरतों को प्रभावित करती है।

सार्वजनिक जगहों पर कम शौचालयों और उनकी खराब स्थिति होने के कारण खासतौर पर महिलाओं को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के लिए बहुत ही कम शौचालय होना समाज और सरकार की असंवेदनशीलता को भी जाहिर करता है। निजी, सरकारी दफ्तरों और सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के लिए साफ, सुरक्षित शौचालय उनकी बुनियादी ज़रूरत है। डीडब्यलू में छपी खबर के अनुसार देश के 16000 अदालत परिसरों में महिला शौचालय की सुविधा ही नहीं है। विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में अदालत परिसरों में स्थित शौचालयों की स्थिति पर नजर डाली गई। महिला अधिकारों के संरक्षण की जगह न्यायालय में शौचालय की सुविधा न होना बाकी देश में महिला के लिए स्वच्छ शौचालय न होने की कहानी साफ बयां कर रही है।

ग्रामीण भारत और शौचालय 

ग्रामीण भारत में शौचालय की कमी एक बड़ा मुद्दा है। एनएसओ की एक रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 71.3%  घरों में शौचालय की सुविधा है। लगभग 29% ग्रामीण आबादी शौचालय के पास शौचालय नहीं है। इसमें 3.5 प्रतिशत ने कभी इसका इस्तेमाल नहीं किया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उड़ीसा जैसे राज्य में 50% आबादी के घर पर शौचालय नहीं है। इसके अलावा पानी की सुगम पहुंच न होने के कारण ग्रामीण क्षेत्र के लोग अधिक संख्या में शौचालय होने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं करते है। शौचालय के लिए दूर से पानी लाना उनके काम को बढ़ाता है। एनएसओ की रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि पुरूषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा शौचालय का इस्तेमाल करती है।

ट्रांस समुदाय के लिए अलग शौचालय

दुनिया के कई देशों में जेंडर न्यूट्रल शौचालयों को बनाए जाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि इस तरह की बातें केवल कागजों पर बेहतर लगती है क्योंकि ऐसी जगह पर होने वाली हिंसा के कारण लोग यहां जाने से कतराते हैं। ट्रांस समुदाय, नॉन बाइनरी लोग अपने लिए अलग शौचालयों की मांग करते हैं। जेंडर न्यूट्रल शौचालयों में ट्रांस समुदाय के लोगों को मानसिक और शारीरिक शोषण का सामना करना पड़ता हैं। रायटर्स में प्रकाशित लेख के अनुसार बैंगलूरु शहर में हुए एक अध्ययन के मुताबिक पब्लिक पार्क व शौचालय में ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ हिंसा की ज्यादा घटनाएं घटित होती है। सार्वजनिक शौचालयों में खासतौर पर पुरूषों द्वारा ट्रांस महिलाओं को हिंसा का सामना करना पड़ता है। ऐसे में जेंडर न्यूट्रल शौचालय उनके लिए सुरक्षित विकल्प नहीं है। ट्रांस समुदाय को सुरक्षित शौचालय की सुविधा देने के लिए उनके लिए थर्ड जेंडर टॉयलेट और ई टॉयलेट ही एक बेहतर और सुरक्षित विकल्प है। ई टॉयलेट, सिंगल सीट के ऐसे टॉयलेट है, जिनका एक समय में केवल एक व्यक्ति ही प्रयोग कर सकता है।

दिल्ली मेट्रो की एक सकारात्मक पहल के बाद दिल्ली मेट्रो के स्टेशनों पर ट्रांस यात्री बिना किसी दिक्कत के स्टेशनों पर शौचालयों का इस्तेमाल कर सकते हैं। ट्रांस समुदाय के लोगों के लिए सुरक्षित स्थान व्यवस्था और भेदभाव खत्म करने की कोशिश में दिल्ली मेट्रो ने प्राथमिकता के आधार पर अभी विकलांग यात्रियों के द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शौचालय ट्रांस समुदाय को इस्तेमाल करने को कहा गया है। भारत में इस तरह का कदम ट्रांस समुदाय के लोगों की सार्वजनिक स्वीकृति के लिए किया गया एक बेहतर प्रयास है। ट्रांस समुदाय के अधिकार और सुरक्षा के लिहाज से उनके लिए सार्वजनिक जगह पर अलग से शौचालय उपलब्ध कराना जरूरी है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह योजनाओं के माध्यम से इस विषय में अधिक संवेदनशीलता दिखाए।

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तस्वीर साभारः CGTN

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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