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बीते 15 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के दिन अपने भाषण में लड़कियों की शादी की उम्र को 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करने के प्रस्ताव का ऐलान किया था। अपने इस प्रस्ताव के पीछे उन्होंने वहज बताई थी कि सरकार बेटियों और बहनों के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा से चिंतित रही है। बेटियों को कुपोषण से बचाने के लिए ज़रूरी है कि उनकी शादी सही उम्र में हो। पीएम मोदी ने जून 2020 में ही जया जेटली के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स का गठन कर दिया था, जिसने शादी की उम्र बढ़ाने के हर पहलू पर विचार किया और अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी।

महिला और बाल विकास मंत्रालय ने जून 2021 में गठित इस टास्क फ़ोर्स में नीति आयोग के डॉ वीके पाल और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्रालयों के सचिव और विधायी विभाग भी शामिल थे। इस टास्क फ़ोर्स का गठन मातृत्व की उम्र से संबंधित, मात्रि मृत्यु दर को कम करने की ज़रूरत, पोषण स्तर में सुधार और संबंधित मुद्दों से संबंधित मामलों के लिए किया गया था।

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इस प्रस्ताव को अब केंद्र सरकार ने अपनी मंजूरी दे दी है। पहली बार में मुझे यह क़ानून लैंगिक समानता के लिए एक मज़बूत कदम मालूम हुआ और महिला शिक्षा के क्षेत्र में विकास के लिए अहम लगा पर जब मैंने अपने घर के आस-पास और अपने गांव के संदर्भ में रखकर देखा, जहां मैं काम करती हूं तो यह बदलाव सिर्फ एक सतही सुधार ही नज़र आया। अगर बात करें महिलाओं और लड़कियों के पोषण की तो इसका सीधा संबंध समाज की पितृसत्तात्मक सोच और संरचना से है, जो रसोई का ज़िम्मा तो महिलाओं को देता है पर वहां पकने वाले खाने का पूरा हिस्सा पहले पुरुषों को और फिर बचे-खुचे हिस्से को महिलाओं का हिस्सा मानता है।

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इतना ही नहीं, किशोरावस्था में शुरुआत से उनके पोषण पर ध्यान देने की बजाय गर्भावस्था के दौरान ही महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण पर ध्यान दिया जाता है। अब जब शुरुआती दौर से ही किशोरियों के स्वास्थ्य को नज़रंदाज़ किया जाता है तो इससे लड़कियों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ने लगता है। तेरह साल की प्रीति (बदला हुआ नाम) मुस्लिमपुर गाँव की रहने वाली है। चार भाई-बहन में सबसे छोटी बहन प्रीति बुरी तरह कुपोषण और एनिमिया का शिकार है। गरीब-मज़दूर परिवार की प्रीति के घर में खाने को लेकर क़िल्लत है, पर इस क़िल्लत की पूरी मार उसे ही ज़्यादा झेलनी पड़ती है, क्योंकि वो लड़की है और वो अपने तीन भाइयों की तरह मज़दूरी करने बाहर नहीं जाती, बल्कि उसकी ज़िम्मेदारी घर का काम है, जिसे पितृसत्ता सबसे कम मेहनत का काम मानती है, इसलिए ये काम करने वाली महिलाओं के पोषण पर ध्यान देना बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं समझा जाता। गाँव में हम आए प्रीति जैसी ढ़ेरों लड़कियाँ है, जो जेंडर आधारित भेदभाव की वजह से एनिमिया की शिकार होती है। हमें ये भी याद रखना होगा कि महिलाओं के स्वास्थ्य को समाज का ये रवैया शादी से पहले और शादी के बाद समान ही रहता है।

यहां अब हमें यह भी समझने की कोशिश करनी होगी कि जब हम महिला-स्वास्थ्य की बात कर रहे हैं तो कहीं हम स्वस्थ बच्चे पैदा करने के लिए महिला-स्वास्थ्य की बात तो नहीं कर रहे हैं? या बतौर नागरिक, महिलाओं के स्वास्थ्य-अधिकार की बात कर रहे है। अब जब हम बात करते है महिला-शिक्षा की तो, क्या वाक़ई में शादी की उम्र बढ़ाने से लड़कियों की शिक्षा पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा ये कहना मुश्किल है। अगर मैं अपने अनुभवों के आधार पर बात करूँ तो, ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसी किशोरियां हैं, जिन्हें ग़रीबी, पारिवारिक दिक़्क़तों आदि की वजह से पढ़ाई छोड़नी पड़ती है।

इन सबके बीच एक प्रमुख वजह यह है कि बचपन से लड़कियों का दाखिला बहुत देरी से करवाया जाता है, जिससे दसवीं-बारहवीं तक पहुंचने में उनकी उम्र अन्य बच्चों से ज़्यादा हो जाती है।’ बीस साल की ख़ुशबू (बदला हुआ नाम) के साथ भी ऐसा हुआ। घर में पाँच बहनों में तीसरे नम्बर की ख़ुशबू का स्कूल में दाख़िला सात साल की उम्र में करवाया गया और उसने उन्नीस साल में बारहवीं की परीक्षा पास की, जिसके बाद आर्थिक रुप से कमजोर परिवार ने ख़ुशबू को आगे पढ़ाने की बजाय शादी के लिए लड़के देखना शुरू कर दिया।’ लड़कियों की शिक्षा में उनका देर से स्कूल में दाख़िला एक बड़ी समस्या है, जिससे न चाहते हुए भी लड़कियाँ देरी से दसवी-बारहवीं की कक्षाओं तक पहुँचती है और जब वे देर से इन कक्षाओं तक पहुँचती है तो उन्हें हमउम्र की बजाय अपने से छोटे बच्चों के साथ पढ़ना पड़ता है, जो बढ़ती कक्षाओं में उनकी घटती संख्या का भी बड़ा कारण है।

इतना ही नहीं, आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की उम्र से ज़्यादा उनके शारीरिक विकास को देखकर शादी करवायी जाती है। जैसा अट्ठारह वर्षीय प्रिया के साथ हुआ। लंबाई और शारीरिक रूप से स्वस्थ प्रिया के परिवारवालों ने उन्नीस साल में उसकी शादी इस आधार पर करवा दी कि उसका शारीरिक विकास तेज़ी से हो रहा है, जिससे वो उम्रदराज लगने लगी है और अगर उसकी शादी में देर हुई तो योग्य लड़का मिलना मुश्किल होगा। इस तरह आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार, लड़कियों को देर से स्कूल में दाख़िला करवाने के बाद उन्हें आगे पढ़ाने की बजाय सीधे उनकी शादी की तैयारी में जुट जाता है। कई बार जब परिवार उन्हें आगे पढ़ाने को इच्छुक भी होता है तो साथ ही साथ उन्हें घर के काम की ज़िम्मेदारियां भी सौंप देता है। इसके बाद लड़कियों में ख़ुद इतनी हिम्मत नहीं बचती कि वे घर का काम निपटाकर कॉलेज तक पहुंच सके।

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अक्सर जब भी लड़कियों की शादी जल्दी करने के संदर्भ में माता-पिता से बात की जाती है तो उनकी सबसे बड़ी चिंता शादी के लिए योग्य लड़के की खोज में दिक़्क़त और अधिक दहेज देने की समस्या होती है। अब आप कहेंगें कि दहेज के लिए तो बक़ायदा क़ानून मौजूद है, पर सच्चाई क्या है ये हम सभी जानते हैं। दहेज का प्रकोप आज भी जस का तस है, फिर क्या गाँव और क्या शहर। बेटी के जन्म से ही परिवार उनकी शिक्षा की बजाय उसकी शादी के दहेज के लिए पैसे जुटाने में लग जाता है। ये हमारे परिवार और समाज की वो चुनौतियाँ है, जिन्हें शादी की उम्र बढ़ाने से दूर नहीं किया सकता है। पर हां जेंडर आधारित भेदभावपूर्ण विचार के साथ चलने वाले समाज में ये बदलाव लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव और हिंसा के स्तर को ज़रूर बढ़ाएगा। 

लड़कियों को आज भी अधिकतर घरों में बोझ समझा जाता है, ऐसे में जब हम शादी की उम्र को बढ़ाने की बात करते है तो उनपर सुरक्षा के नाम पर लगने वाली पाबंदियों और घर की ज़िम्मेदारियों का दबाव बढ़ना तय होता है। पर इससे उनकी शिक्षा और पोषण में ध्यान दिया जाएगा, ये कह पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए नये क़ानून बनाने या सुधार करने के साथ-साथ हमें मौजूद क़ानूनों को प्रभावी तरीक़े से लागू करने की दिशा में काम करने की ज़रूरत है वरना क़ानून लाख बन जाए महिलाओं की स्थिति समाज में जस की तस ही बनी रहेगी। 

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तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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