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हम जिस समाज में रहते हैं, वहां आज भी एक बड़ा हिस्सा उन लोगों का है, जो गाहे-बेगाहे यह कह देते हैं कि औरतों की जगह घरों में पति और परिवार की सेवा करने में है। यह समाज पढ़ने-बोलने और लड़ने वाली महिलाओं को कभी चरित्रहीन तो कभी बुद्धिहीन घोषित कर उनकी आवाज़ को दबाना चाहता है, उन्हें खारिज़ करता है। लेकिन, ‘गेहूं के साथ बथुए की तरह उग आई’ ये लड़कियां समाज के यथास्थितिवाद के ख़िलाफ़ परिवर्तन के लिए एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरती हैं। ये वह बौद्धिक ‘गैप’ भरती हैं, जो सदियों से मौजूद था और जिसमें शामिल होना औरतों के लिए अग्राह्य बनाया गया था और उसी के दमपर उनपर शोषण किया जाता था।

भारतीय समाज की ही बात करें तो आज भी यह अंतर इतना गहरा है कि स्त्री प्रतिनिधित्व के नाम पर हमारे पास बस गिने-चुने नाम ही मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल तब तपाक से किया जाता है, जब पुरुषों की किसी बहस में लैंगिक भेदभाव को गिनवाते हुए आप औरतों को शोषित करने वाली इस व्यवस्था से हिसाब मांगने जाएंगे। हालांकि इस शोषणकारी, भेदभावपूर्ण व्यवस्था के भीतर से भी विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए औरतों ने अपने लिए जगहें बनाई हैं, वे ख़ुद शिक्षित हुईं, और बाद में समाज में, शोषणकारी प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरीं और लगातार इस दिशा में कार्यरत रहीं। ऐसा ही एक नाम हैं- नलिनी नायक। आइए जानते हैं उनके बारे में।

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नलिनी नायक (जन्म 1946) केरल की रहने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता, नारीवादी हैं जो सत्तर के दशक से छोटी इकाई के, पारंपरिक मछुआरों के साथ बुनियादी अधिकारों की लड़ाई में सशक्त रूप से खड़ी रहीं हैं। वह इस दिशा में चालीस साल से भी अधिक समय से सक्रिय हैं और वहां के स्थानीय मछुआरों को उनके पहले सहकारी समितियां और यूनियन (संगठन) विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है। वर्तमान में वह सेल्फ़ एम्पलॉएड वीमेंस असोसिएशन (SEWA) नामक संगठन की जनरल सेक्रेटरी भी हैं, तथा प्रोत्साहन-त्रिवेंद्रम और मित्रनिकेतन-वगमन जैसे संगठन जो सामुदायिक विकास के लिए वैकल्पिक शिक्षण पद्धति के सहारे समग्रता में सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों के उत्थान के लिए प्रयासरत हैं, से भी जुड़ी हुई हैं।

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भारतीय समाज में मत्स्यउद्योग भोजन, पोषण सुरक्षा, रोजगार और आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। आज यह क्षेत्र बड़े निर्यातक क्रियाकलाप के रूप में उभर रहा है जो देश की जीडीपी में क़रीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए सालाना का सहयोग करता है। लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था। इड्रोन लाइन की एक रिपोर्ट को देखें तो 1976 से पहले ‘स्थानीय समुद्री अधिनियम’ ( Marine Spatial Regulation). जैसे एक्सक्लूसिव इकनोमिक ज़ोन्स (EEZ)  नहीं बनाया गया था, जिसके कारण यंत्रीकृत मछली पकड़ने वाले जहाजों के आवाजाही के कारण तटों पर पाई जानेवाली मछलियां जैसे छोटी समुद्री मछली, बॉम्बे डक, रिबन फिश, झींगा मछली इत्यादि की संख्या में भारी गिरावट हुई जिसके कारण भारत के पारंपरिक मछुआरों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो चुका था। इसके साथ ही बाज़ार से दूरी और आवागमन से साधनों की अनुपलब्धता ने छोटे मछुआरों की समस्याओं को और बढ़ा दिया था। नलिनी बंगलुरु में पली-बढ़ीं और उन्होंने अर्थशास्त्र में अपना स्नातक किया। इसी दौरान उन्होंने स्थानीय मछुआरों और उनकी समस्याओं को देखा और तय किया कि वह इस दिशा में काम करेंगी। मछुआरों राज्य में असंगठित रूप से काम कर रहे थे और इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा था, जिससे उनकी स्थिति में बदलाव आए।

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स्नातक के बाद नलिनी केरल चली आईं और यहां उन्होंने लगभग दो वर्षों तक (1967-69) काम किया। उस दौरान इस संबंध में बेहतर और ठोस समझ बनाने के लिए जिस कौशल की आवश्यकता थी, उसे पहचानकर वह टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस गईं और हासिल किया। वहां से लौटकर केरल के मछुआरों के पास आते हुए वह अपने साथ सहपाठियों का एक समूह भी लाईं और सबने मिलकर बाज़ार और पूंजी-सहकारी समिति विकसित करने के लिए एक लंबे संघर्ष में भाग लिया जो आखिरकार सफ़ल रहा। हालांकि, इसी दौरान उन्होंने एक दूसरी चुनौती को बढ़ता देखा जो बाहरी-पूंजीवादियों द्वारा बाज़ार पर कब्ज़े के कारण पनप रही थी। स्थानीय बाज़ारों में ‘फ्रोज़न फ़िश’ बिकने लगी थी और समुद्र तट पर मशीन से चलने वाली नावों के चलते किनारे की मछलियों की संख्या ख़त्म होने से छोटे मछुआरों के लिए मछलियां पकड़ना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा था।

नलिनी नायक केरल की रहने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता, नारीवादी हैं जो सत्तर के दशक से छोटी इकाई के, पारंपरिक मछुआरों के साथ बुनियादी अधिकारों की लड़ाई में सशक्त रूप से खड़ी रहीं हैं।

इस बीच उन्होंने महसूस किया कि यह समस्या केवल भारत में ही नहीं, बल्कि श्रीलंका और फिलीपींस में भी है, जिससे निपटने के लिए उन्होंने इस क्षेत्र में अध्ययन करने के लिए एक साल का समय लिया। 1980 के दशक में उन्होंने मछुआरों के लिए पंजीकृत ट्रेड यूनियन बनाने में सहयोग दिया। स्व-नियोजित सदस्यता वाला यह इकलौता यूनियन था। इसके माध्यम से मछुआरों को अपनी समस्याएं और मांगें सरकारों के समक्ष रखने और अपने हितों की ओर उनका ध्यानाकर्षण करवाने में सफ़लता मिली। वह वह आवाज़ बनी, जिसने मछुआरों को सिमट कर ख़त्म होने और अपने पेशे को छोड़कर कहीं और भटकने की बजाय यह अवसर दिया कि स्थानीय पेशा पूंजीवादी साज़िशों का शिकार न बने और यही हुआ जब 1984 में कृषि एवं खाद्य संगठन द्वारा छोटे-सीमांत व कुटीर मछुआरों के जीवन और उपयोगिता पर ध्यान दिया जा रहा था, उन्होंने एक ‘काउंटर-कॉन्फ्रेंस’ आयोजित करवाया जिसे बाद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मछुआरों के सहयोगकर्ताओं के लॉन्चिंग ग्राउंड की तरह देखा गया। 

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नलिनी नायक लगभग चालीस से भी अधिक सालों से जहां एक ओर छोटे मछुआरों के हितों के संदर्भ में गोलबंदी और आंदोलन करती आ रही हैं वहीं बड़ी मुखरता से वह इस कार्यक्षेत्र में महिलाओं के साथ हो रहे शोषण और भेदभाव के ख़िलाफ़ भी संघर्षरत हैं। साहापीडिया नाम के यूट्यूब चैनल के साथ अपने इंटरव्यू में वह बताती हैं कि भारत जैसे देश में छोटे मछुआरों की संख्या बहुत अधिक है और लगातार संघर्ष करके उन्होंने बहुत से कानूनी स्तर पर बहुत सी जीत हासिल भी कर ली गई है, लेकिन यह सब केवल काग़ज़ी है, सामुदायिक स्तर पर अभी भी ये समूह पीछे खड़े हैं क्योंकि ग्राउंड पर कानूनों को लागू नहीं किया गया है। आंदोलन के साथ धरातल पर बदलाव एक साथ नहीं घटित होने के कारण वैधानिक जीत के बावजूद भी ज़मीन पर कुछ भी नहीं दिखता।

वह कहती हैं कि इस कार्यक्षेत्र में संलग्न लोगों के लिए ‘फिशरमैन’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। नलिनी नायक द्वारा यह दिखाया जाना कि सर्वप्रचलित शब्दावलियों में औरतों की मौजूदगी नहीं है, सामान्य बात नहीं है, बल्कि यह एक पैटर्न है, जिसके तहत औरतों की एजेंसी और इस कार्यक्षेत्र को ओन करने के संबंध से उनके अधिकार से उन्हें बड़ी सहजता से खारिज़ कर दिया जा सकता है और यह हुआ भी। आंदोलनों के बाद जब सरकारों ने इस दिशा में हस्तक्षेप कर मात्रात्मक सहयोग करते हुए कर्ज देना शुरू किया तो वह पुरुषों को दिया गया।

असल में, मत्स्यउद्योग जो कि स्त्री-पुरुष के साझा सहयोग से चालित कार्यक्षेत्र था, उसमें स्टेट ने केवल पुरुष को मछुआरा माना। इससे औरतें पीछे- हाशिए पर छूट गईं। हालांकि आज से पांच दशक पहले की स्थिति पर ग़ौर करें तो ऐसा नहीं था। तब यह कार्यक्षेत्र मातृ-तंत्रीय था। औरतों के पास मछली पकड़ने का अवसर और समय दोनों होता था। नलिनी नायक कहती हैं कि आंदोलन के माध्यम से शब्दावली में निहित समस्या को सुलझाने की कोशिश की गयी जिसमें ‘फिशरमैन’ की जगह हमने ‘फिशवर्कर्स’ की बात रखी। हालांकि धरातल पर देखें तो आज भी यह प्रचलन में नहीं है और मत्स्यउद्योग के विकास में स्टेट की ओर से महिलाओं को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। बावजूद इसके कि महिलाओं की ओर से ‘विज़िबल’ होने की बहुत कोशिश की गई है, सरकारी नीतियों में उनको लेकर कोई एक्नॉलेजमेंट नहीं दीखता। पूंजीवाद के कारण मत्स्यउद्योग में बड़ी कम्पनियों की भागीदारी बढ़ने के कारण किनारों पर हार्बर और फिश प्लांट बन गए हैं और बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट-एम्पोर्ट का काम हो रहा है जिससे किनारे की भूमि कब्ज़ा ली गई है, जिसके कारण पारंपरिक रूप से सक्रिय मछुआरों को किनारों से दूर दूसरी जगहों पर आजीविका के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है।

वह कहती हैं कि इस कार्यक्षेत्र में संलग्न लोगों के लिए ‘फिशरमैन’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। नलिनी नायक द्वारा यह दिखाया जाना कि सर्वप्रचलित शब्दावलियों में औरतों की मौजूदगी नहीं है, सामान्य बात नहीं है, बल्कि यह एक पैटर्न है, जिसके तहत औरतों की एजेंसी और इस कार्यक्षेत्र को ओन करने के संबंध से उनके अधिकार से उन्हें बड़ी सहजता से खारिज़ कर दिया जा सकता है और यह हुआ भी।

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ऐसे में नलिनी कहती हैं कि औरतों के लिए घरेलू ज़िम्मेदारी सम्भालते हुए इस क्षेत्र में सक्रियता बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है, जिस पर सरकारों को ध्यान देने की ज़रूरत है क्योंकि आवागमन की समस्या, बाज़ार और पूंजीवादी शक्तियों द्वारा संसाधन दोहन इत्यादि के कारण महिलाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं। वीमेन सोशल सिक्यूरिटी एंड प्रोटेक्शन कॉन्फ्रेंस में ‘ द मिसिंग डायमेंशन ऑफ़ सोशल सिक्यूरिटी एंड प्रोटेक्शन इन इंडिया’ पर बात करते हुए वह बताती हैं कि इस कार्यक्षेत्र में पूंजीवादी कब्ज़े के कारण पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है क्योंकि संसाधनों को इस्तेमाल करने को लेकर पारंपरिक और पूंजीवादी तंत्र की दृष्टियों में एक बड़ा अंतर है। जहां पहले का उद्देश्य स्थिरता और धारणीय विकास है, वहीं दूसरा केवल और केवल निजी हित से चालित है। इस प्रक्रिया को वह ‘वायलेंट डेवलेपमेंट’ कहती हैं।

मत्स्यउद्योग में महिलाओं के हित को लेकर विचारशील नलिनी नायक सेल्फ एम्पलॉएड वीमेंस असोसिएशन की जनरल सेक्रेटरी भी हैं। सेवा असंगठित कर्मचारियों का दुनियाभर में सबसे बड़े संगठन में से एक है। यह संगठन उन महिलाओं को सम्मिलित करता है जो अनिश्चित आय और जीवन की समस्याओं में संघर्षरत हैं। नलिनी नायक इस संगठन के माध्यम से मछुआरा समुदाय की महिलाओं को वैकल्पिक नौकरियां उपलब्ध कराने में भी मदद करती हैं। नलिनी नायक आज भी ट्रेड यूनियनों, आंदोलनों और सहकारी संस्थानों के माध्यम से समाज के शोषित, दमित और हाशिए पर धकेल दिए गए समुदायों के हितों के लिए, विकास की धारणीय और पारिस्थितिक तंत्र संवेदी तरीकों के अनुपालन को लेकर आवाज़ उठा रही हैं। वह स्थानीय लोगों को जागरूक कर उन्हें उनके अधिकारों की मांग करने के लिए प्रेरित कर रही हैं, साथ ही समाज में चली आ रहीं पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों को भी खारिज़ कर रही हैं।

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तस्वीर साभार: Wikipedia

स्रोत:
Wikipedia
PWESCR
Ashoka.org


गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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