स्वरोज़गार के बारे में महिलाएँ क्यों नहीं सोच पाती हैं
तस्वीर साभार: Muheem
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घर में सुबह सबके उठने से पहले घर की महिलाएं उठती हैं और सबके सोने के बाद सबसे आख़िर में महिलाएं सोती हैं। दिनभर घर का काम करती भारतीय महिलाओं की कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं होती। उनके लिए कोई त्योहार पर बोनस नहीं होता न कोई छुट्टी होती है। इस पूरे काम के लिए कभी महिलाओं को कोई पगार नहीं मिलती है, क्योंकि इसे कभी महिलाएं मांगना तो दूर इसके बारे में सोचना भी मुनासिब नहीं समझती।

बचपन से ही घर में छोटी बेटियों को माँ अपनी ही तरह घर संभालने-संवारने के काम की प्रैक्टिस करवाई जाती है। उनके दिमाग़ में यह अच्छे से बैठाया जाता है कि घर के काम उनका फ़र्ज़ है, उनकी ज़िम्मेदारी है और इसका कोई पैसा नहीं मिलता है। पितृसत्ता ने हमेशा से महिलाओं को हिसाब-किताब के काम में कच्चा रखा है, जिसके लिए उन्हें शिक्षा से दूर रखने की पूरी कोशिश की जाती है। ग्रामीण स्तर पर हमेशा से बिना पैसे के अपनी पूरी ज़िंदगी चूल्हे-चौके के काम में झोंकती महिलाओं को जब हम लोग रोज़गार परक शिक्षा और कौशल से जोड़ने की दिशा में काम करते हैं तो हमेशा पितृसत्ता सोच एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आती है, जो अलग-अलग रूप में अक्सर दिखाई पड़ती है।

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ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं खेती-मज़दूरी के साथ-साथ चूल्हे का काम संभालती हैं। उनकी कंडिशनिग बचपन से ही इस चूल्हे को संभालने के विचार से ही तैयार की जाती है, जिसकी वजह से महिलाओं को घर, परिवार और चूल्हे के काम के अलावा किसी और काम के बारे में सोचना बहुत मुश्किल होता है। सुबह से लेकर रात तक चलनेवाली महिलाओं की ड्यूटी को चुनौती देना तो दूर इसके बारे में सोचना भी बेहद मुश्किल है।

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स्वरोज़गार को लेकर महिलाओं में रुझान का अभाव होने की वजह न केवल हमारी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था है, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था भी है जो महिलाओं को रोज़गार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित नहीं करती।

बता दें कि आज जब हम रोज़गार की बात कर रहे है तो यहां रोज़गार का मतलब स्वरोज़गार से है। मतलब वह रोज़गार जो ख़ुद किया जाता है, जिसका ढांचा बिज़नेस का होता है नौकरी का नहीं। गाँव में महिलाओं को किसी नौकरी के लिए प्रेरित करना और उनकी भगीदारी सुनिशचित करना कम कठिन है लेकिन अपने किसी हुनर को स्वरोज़गार के रूप में बढ़ावा देना या किसी कौशल-प्रशिक्षण के माध्यम से स्वरोज़गार से जोड़ना बड़ी चुनौती है।

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उत्तर भारत में ग्रामीण स्तर पर ऐसे स्वरोज़गार कम ही देखने को मिलती है जहां महिलाएं किसी स्वरोज़गार का नेतृत्व करें। इसकी मुख्य वजह आज भी क़ायम पितृसत्तात्मक कार्य-प्रणाली ही है। इसी तरह के हर छोटे-छोटे काम से लेकर बड़े बिज़नेस तक महिलाएं पर्दे के पीछे से काम करती हैं और ज़ाहिर है जिसके उनको कोई पैसे नहीं मिलते हैं। कहीं न कहीं ये चलन भी महिलाओं की हिचक का प्रमुख कारण है। इसका प्रभाव अक्सर देखने को मिलता है, जब सिलाई-कढ़ाई सीखने वाली महिलाएं भी उस हुनर का इस्तेमाल सिर्फ़ अपने घर तक करने के लिए ही सीखती हैं।

गहरपुर गाँव में सिलाई टीचर चंचला बताती है कि गाँव की कई लड़कियां और महिलाएं उनके यहां सिलाई सीखने आती हैं। उन्हें क्या सीखना होता है वह उनके दिमाग़ में एकदम सेट होता है। वे सिर्फ़ अपने और घर के कुछ बुनियादी कपड़े की सिलाई ही सीखती हैं, जिससे वे खुद के कपड़े की सिलाई का खर्चा बचा सके। उन्हें जब भी बाज़ार केंद्रित सिलाई की चीजें सीखाने का प्रयास किया जाता है तो महिलाएं रुचि नहीं लेती हैं। अक्सर महिलाएं अपने मतलब की चीजें सीखकर सिलाई सीखना छोड़ देती हैं। यही वजह है कि गाँव में आधी-अधूरी सिलाई सीखी महिलाओं की संख्या तो बहुत है, लेकिन न के बराबर महिलाएं सिलाई से छोटा खर्च भी निकाल पाती हैं। यह हाल है सिलाई का, जो आमतौर ग्रामीण महिलाओं की पहली पसंद होती है। लेकिन इसके बावजूद वे अपने काम चलाने भर ही इन हुनर को सीखना चाहती हैं पर अपने हुनर को स्वरोज़गार से जोड़कर अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर और मज़बूत करने का आधार बनाना, उनकी सोच से दूर है।

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स्वरोज़गार को लेकर महिलाओं में रुझान का अभाव होने की वजह न केवल हमारी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था है, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था भी है जो महिलाओं को रोज़गार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित नहीं करती। गृह विज्ञान जैसे विषय में शामिल खाना बनाने, डाइट का ध्यान रखने, सिलाई-बुनाई और स्वास्थ्य से जुड़े तमाम पाठ को सिर्फ़ पाठ तक ही सीमित कर दिया जाता है, जिसकी वजह से नौवीं कक्षा में गणित की बजाय गृह विज्ञान चुननेवाली लड़कियां भी इसे आसान विषय मानकर बस पढ़ लेती हैं, लेकिन इस सीख का इस्तेमाल करके कैसे वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं ये कभी भी हमारी किताबें नहीं सिखाती हैं।

ग्रामीण महिलाओं का स्वरोज़गार की दिशा में रुझान की कमी की वजह से महिलाओं की आर्थिक स्थिति सीधेतौर पर प्रभावित होती है। वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी नहीं बन पाती हैं। इसकी वजह से उन्हें अक्सर हिंसा का सामना करना पड़ता है। साथ ही, इससे कई हुनर सिर्फ़ घर की चार दीवारों तक ही सीमित रह जाते हैं। उन्हें न तो कोई पहचान मिल पाती है और न सम्मान।

हमें ये भी समझना होगा कि सालों से चले आ रहे इस चलन से न केवल हमारा वर्तमान बल्कि भविष्य भी प्रभावित हो रहा है, जिसके चलते युवा महिलाएं भी सिर्फ़ अपने घर के काम को आसान करने भर तक किसी भी हुनर को सीखने में रुचि रखती है, जिसे बदलने की ज़रूरत है, ताकि स्वरोज़गार के क्षेत्र में ग्रामीण महिलाओं की भगीदारी तय हो सके।    

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रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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