इतिहास क्या आप भारत की पहली महिला मनोचिकित्सक एम. शारदा मेनन के बारे में जानते हैं?

क्या आप भारत की पहली महिला मनोचिकित्सक एम. शारदा मेनन के बारे में जानते हैं?

भारत में मनोचिकित्सा के क्षेत्र में कई लोगों ने समय-समय पर अपने योगदान से मनोचिकित्सा के क्षेत्र का विकास किया है लेकिन एक अहम शख्सियत के जिक्र के बिना मनोचिकित्सा का क्षेत्र अधूरा है। 1940 के दशक में, केरल की एक युवा मेडिकल ग्रेजुएट इस बात पर दृढ़ थी कि वह एक मनोचिकित्सक बनना चाहती थी। उस समय यह एक ऐसी विशेषज्ञता थी, जिसमें महिलाओं की भागीदारी शामिल नहीं थी। यहीं से मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में डॉ शारदा मेनन के लंबे जीवन की यात्रा की शुरुआत हुई थी।

शुरुआती जीवन और शिक्षा

दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के तटवर्ती क्षेत्र में एक मलयाली परिवार में जन्मी एम.शारदा मेनन ने जब मनोचिकित्सक बनने का फैसला किया होगा तब शायद ही उन्हें यह पता होगा कि वह भारत की पहली महिला मनोचिकित्सक बनने जा रही हैं। मम्बलिकालथिल शारदा मेनन का जन्म 5 अप्रैल 1923 में मैंगलोर मद्रास प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत में हुआ था। शारदा के पिता पेशे से न्यायाधीश थे। उनका पालन-पोषण एक शिक्षित और समृद्ध परिवार में हुआ था। शारदा को बेहतर से बेहतर शिक्षा परिवार द्वारा दिलाई गई। इनके पिता का चेन्नई में तबादला होने के बाद शारदा अपने परिवार के साथ वहां चली गई थी। इनकी शुरुआती पढ़ाई ‘गुड शेकर्ड स्कूल’ से हुई थी। उसके बाद ‘क्राइस्ट चर्च एंग्लो इंडियन हायर सेकेंडरी स्कूल’ में उन्होंने अपने स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके बाद ‘वुमन क्रिश्चिन कॉलेज’ से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

साल 1951 में शारदा ने मद्रास मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा में स्नातक कोर्स पूरा किया। इसके बाद उन्होंने मद्रास चिकित्सा सेवा में शामिल होने से पहले इरविन हॉस्पिटल, दिल्ली में भी काम किया। साल 1951 में मद्रास चिकित्सा सेवा में पिट्टापुरम मिशन अस्पताल, आंध्र प्रदेश में अपने करियर की शुरुआत की। इसी के साथ उन्होंने एमडी की डिग्री के लिए भी अध्ययन कार्य जारी रखा जो उन्हें साल 1957 में प्राप्त हुईं। इसके बाद बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निमहंस) से मनोरोग चिकित्सा के क्षेत्र में कोर्स कर प्रशिक्षण लिया। जिसके बाद साल 1959 में एम. शारदा मेनन भारत की पहली महिला मनोचिकित्सक बन गईं।

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मनोचिकित्सक के तौर पर करियर की शुरुआत

एम. शारदा ने अपना पूरा जीवन मनोचिकित्सक के रूप में काम करते हुए समर्पित कर दिया। शारदा मेनन ने साल 1959 में किलपॉक में मानसिक स्वास्थ्य संस्थान से जुड़ी। यह एक सरकारी मानसिक अस्पताल था। वह 1961 में इसकी पहली महिला अधीक्षक बनी थीं। उनके कार्यकाल के दौरान संस्था ने मनोरोग विभाग शुरू किया। यहां ओपीडी की शुरुआत की। राज्य के सभी जिला अस्पतालों में क्षेत्रीय मनोरोग केंद्र स्थापित किए गए। डॉ मेनन ने चिकित्सा के बुनियादी ढांचे से लेकर मनोचिकित्सक मरीजों के पुनर्वास के लिए बहुत काम किए।

1940 के दशक में, केरल की युवा मेडिकल ग्रेजुएट इस बात पर दृढ़ थी कि वह एक मनोचिकित्सक बनना चाहती थी। उस समय यह एक ऐसी विशेषज्ञता थी, जिसमें महिलाओं की भागीदारी नहीं थी।

डॉ शारदा मेनन ने एक डॉक्टर के साथ-साथ समाज के लिए भी अनेक काम किए। शारदा मेनन जब डॉक्टर के पेशे से रिटायर हुई तब वह घर नहीं बैठी बल्कि उन्होंने एक फाउंडेशन की नींव रखी। 1984 में उन्होंने कुछ समान विचारधारा रखने वाले लोगों के साथ मिलकर सिज़ोफ्रेनिया और अन्य मानसिक रोगों से पीड़ित लोगों के पुनर्वास के लिए एक गैर सरकारी संगठन की स्थापना की। यह संगठन एस.सी.ए.आर.एफ. यानी सिजोफ्रेनिया रिसर्च फाउंडेशन के नाम से जाना जाता है। यह संगठन एक पूर्ण अनुसंधान संगठन के रूप में विकसित हुआ है। यह संगठन विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मानसिक स्वास्थ्य अनुसंधान और प्रशिक्षण के लिए भारतीय संस्थाओं में से एक है। यह संगठन मानसिक बीमारी वाले लोगों के लिए उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था और देखभाल के लिए एक प्रमुख गैर सरकारी संगठन के रूप में काम करता है। रोगियों के पुनर्वास के उद्देश्य से व्यावसायिक प्रशिक्षिण केंद्र चलाता है। यह संगठन एक मोबाइल क्लिनिक के तौर पर भी अपनी सेवा देता है।

इस एनजीओ में डॉ शारदा ने निर्देशक के पद पर काम किया। इसके कुछ समय बाद डॉ शारदा ने इस पद से हटकर एनजीओ में बतौर सलाहकार काम किया। उनके समाज के मानसिक रूप से बीमार लोगों के लिए किए गए कामों की वजह से समाज में एक नवीन बदलाव आया। अनेक लोग उनके एनजीओ से जुड़े, स्वयं सेवा की। उनके प्रयासों से एक सकारात्मक बदलाव यह हुआ कि हर सरकारी अस्पतालों में मनोरोग आउटपेशेंट वार्ड को बनवाना अनिवार्य किया गया। उनके प्रयासों की ही देन है, कि सरकारें भी उनके काम का लोहा मनवाती हैं और एनजीओ को अनुदान भी देती हैं।

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पुरस्कार और उपलब्धियां

एम. शारदा मेनन भारत की पहली महिला मनोचिकित्सक और एक समाजसेवी रही। जो अन्य बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा बनीं। मानसिक रूप से बीमार लोगों के प्रति समाजिक नज़रिए को बदला। उनके बेहतरीन कामों के लिए सरकार ने उन्हें कई पुरस्कारों से नवाज़ा। तमिलनाडु सरकार ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक पुरस्कार प्रदान किया। उन्हें ‘इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ सोशल साइको रिहैबिलिटेशन’ स्पेशल अवार्ड चैन्नई’ से भी सम्मानित किया गया। साल 1992 में डॉ शारदा मेनन को भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया। साल 2013 में मद्रास न्यूरो ट्रस्ट ने ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से उन्हें नवाज़ा गया। डॉ मेनन ने चेन्नई के रेड क्रॉस सोसाइटी के उपाध्यक्ष के रूप में भी काम किया। इसी के साथ वह राज्य सरकार के द्वारा जेल सुधारों के लिए गठित पैनल की सदस्य भी रही थी। वह ‘वर्ल्ड फेलोशिप फॉर सिज़ोफ्रेनिया एंड अलाइड डिसऑर्डर’ से भी जुड़ी थीं।

डॉ एम. शारदा मेनन ऐसी महिला शख्सियत हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के लोगों के लिए काम करते हुए समर्पित कर दिया। रिटायरमेंट के बाद भी डॉ मेनन ने कई काम किए। 5 दिसंबर 2021 में 98 साल की उम्र में चेन्नई में उनका निधन हो गया। भले ही डॉ शारदा आज हमारे बीच ना हो लेकिन उनके किए काम और उनके विचार आज भी जीवित हैं।

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तस्वीर साभार : YourStory

About the author(s)

पेशे से एक पत्रकार ,जज्बातों को शब्दों में लिखने वाली 'लेखिका'
हिंदी साहित्य विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय से BA(Hons) और MA(Hons) मे शिक्षा ग्रहण की फिर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में शिक्षा ली । मूलतः उत्तर प्रदेश से सम्बद्ध रखती हूँ और दिल्ली में परवरिश हुई । शहरी और ग्रामीण दोनों परिवेशों में नारी आस्मिता पर पितृसत्ता का प्रभाव देखा है जिसे बेहतर जानने और बदलने के लिए 'फेमनिज़म इन इंडिया' से जुड़ी हूँ और लोगों तक अपनी बात पहुँचाना चाहतीं हूँ।

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