मिलिए जनवरी 2022 की फीचर्ड राइटर श्वेता से
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फेमिनिज़म इन इंडिया अपने बेहतरीन लेखकों में से एक लेखक को हर महीने उनके योगदान का आभार जताने के लिए फीचर करता है। लेखकों के योगदान के बिना फेमिनिज़म इन इंडिया का सफ़र अधूरा होता। जनवरी की फीचर्ड राइटर ऑफ द मंथ हैं श्वेता। श्वेता ने नारीवाद, जेंडर, लैंगिक हिंसा पर कई बेहतरीन लेख लिखे हैं। उनके कुछ बेहतरीन लेखों में- जसिंता केरकेट्टाः विकास के दंश, प्रेम और आशाओं को कविताओं में पिरोती एक कवयित्री, हॉरर के साथ सोशल मेसेज देने में कामयाब रही है ‘छोरी’, जेंडर पर आधारित पांच किताबें जो हमें पढ़नी चाहिए जैसे कई लेख शामिल हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया : अपने बारे में हमें बताएं और आप क्या करती हैं?

श्वेता : सबसे मुश्किल काम है अपने बारे में लिखना। ऐसा करते हुए मैं असहज हो जाती हूं। ख़ैर कोशिश करती हूं, जितना मैं खुद को जान पाई हूं, उतना आपको भी बता पाऊं। मैं एक बेहद ही साधारण नास्तिक लड़की हूं, जो समाज, साहित्य, सिनेमा, सियासत… कुल मिलाकर जीवन के तमाम रंगों को नारीवादी नजरिए से देखती है। डॉ आंबेडकर के उस सूत्र में मेरा अटूट विश्वास है जिसमें वह किसी समाज की तरक्की को उस समाज की महिलाओं की तरक्की से मापने को कहते हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय (दिल्ली) से हिन्दी साहित्य में परानास्तक (मास्टर्स) कर रही हूं। लिखती भी हूं। कुछ अपने लिए। कुछ अलग-अलग संस्थानों के लिए। लेकिन लिखने से ज्यादा पढ़ती हूं। फुरसत मिलने पर देश-दुनिया के तमाम ज्वलंत राजनीतिक सामाजिक मुद्दों पर अपनी नारीवादी समझ के अनुसार विचार भी व्यक्त करती हूं। खाने और सोने को निर्वाण मानती हूँ। लेकिन दोनों को संतुलित मात्र में ही लेती हूं। पसंदीदा शौक वेट लिफिटिंग और जिमिंग है, जो मुझे स्वस्थ शरीर के साथ-साथ ढ़ेर सारा आत्मविश्वास भी देता है।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आप फेमिनिज़म इन इंडिया से बतौर लेखक कैसे जुड़ें? 

श्वेता : फेमिनिज़म इन इंडिया के साथ बतौर लेखिका मैं ऑनलाइन इंटर्नशिप प्रोग्राम के जरिए जुड़ी।

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फेमिनिज़म इन इंडिया : आप कब और कैसे एक नारीवादी बनें? नारीवाद से जुड़े कौन से मुद्दे आपके बेहद करीब हैं? 

श्वेता : मैं पूरी तरह नारीवादी बन गई हूं, ये कहना पूरी तरह ठीक नहीं होगा क्योंकि मुझे लगता है कि ये एक प्रक्रिया है जिससे मैं गुजर रही हूं। हां, कुछ बदलाव हैं जिन्हें मैं महसूस करती हूं। पहले लैंगिक भेदभाव समझ नहीं आता था। शायद लैंगिक भेदभाव को ये स्वीकारिता समाज और परिवार की पितृसत्तामक ट्रेनिंग की वजह से मिली थी। ख़ैर, दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंचने और तमाम तरह के विमर्शों से रूबरू होने के बाद नारीवादी चेतना आई है। इसके बाद हर परत की गैरबराबरी आंखों के सामने नज़र आने लगी। आंबेडकर और पेरियार की लेखनी को पढ़ने से मेरी नारीवादी चेतना को धार मिली। फुले दंपत्ति की कहानी से प्रेरणा मिली की रिश्ते बराबरी के भी हो सकते हैं। अब लगभग सभी विषयों और विमर्शों को समावेशी नारावादी नजरिए से देखने की कोशिश करती हूं। नारीवाद को सिर्फ महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत समानता की बात करने वाली विचारधारा के रूप सीमित कर के नहीं देखती। बल्कि अलग-अलग आधारों जैसे जाति, वर्ग, धर्म, रंग, यौनिकता, विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभेव के मुखर विरोधी के रूप में भी देखती हूं। दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, समलैंगिकों, ट्रांसजेंडर्स, के लिए समानता की मांग और मानवाधिकार के बुलंद आवाज़ के रूप में देखती हूं।

फेमिनिज़म इन इंडिया : हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित आपके लेखों में से कौन सा लेख आपको सबसे अधिक पसंद है?

श्वेता : जंसिता केरकेट्टा की प्रोफाइल मेरे लिए बहुत खास है। जसिंता केरकेट्टा के बारे में पढ़ना। उनका लिखा पढ़ना। उनसे बात करना। लिखना। ये सब मेरे लिए एक सफर की तरह था। मैंने अब तक जो भी लिखा है, उन सब में ये मेरा फेवरेट है। दिल के सबसे करीब है।

फेमिनिज़म इन इंडिया : जब आप नारीवादी मुद्दों, जेंडर, सामाजिक न्याय पर नहीं लिख रहे होते तब आप क्या करते हैं? 

श्वेता : किताबें पढ़ती हूं। कहानी, उपन्यास, कविता। कुछ फिल्में देख लेती हूं। थोड़ा घूम लेती हूं। खूब खाती हूं, जिसमें नॉनवेज की मात्रा अधिक होती है। जिम में ज्यादा टाइम बिताती हूँ। माँ से बाते करती हूँ और अपने कॉमरेड से बहुत सारा प्यार करती हूँ।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपको फेमिनिज़म इन इंडिया और हमारे काम के बारे में क्या पसंद है? आप हमसे और किन-किन चीज़ों की उम्मीद करते हैं? 

श्वेता: फेमिनिज़म इन इंडिया नारावादी विषयों पर जिस आक्रमकता के साथ कार्य कर रहा है, वह सराहनीय है। एक विचारधारा के तौर पर नारीवाद को अपनाने वालों के लिए फेमिनिज़म इन इंडिया एक लाइब्रेरी बन चुका है। यहां हर रोज प्रकाशित लेख नारीवाद को एक विचारधारा के तौर पर पुष्ट कर रहे हैं। साथ ही नारीवादियों को तर्कों और तथ्यों से लैस कर रहे हैं। नारावादी के अलग-अलग पहलुओं पर हिन्दी में इनती जानकारी के सृजन से वो हिन्दी भाषी क्षेत्र समृद्ध हो रहे हैं, जहां दक्षिण भारत की तरह बराबरी के लिए कोई लम्बा संघर्ष नहीं हुआ है। हिन्दी भाषी क्षेत्र में ना फुले दंपत्ति की कोई मिसाल मिलती है, ना आंबेडकर जैसे गैरबराबरी विरोधी नीति निर्माता की। इसके अलावा इस क्षेत्र में नॉर्थ ईस्ट के राज्यों की तरह कभी खुला माहौल भी नहीं रहा। ऐसे में फेमिनिज़म इन इंडिया द्वारा हिन्दी में किया जा रहा कार्य अतुलनीय हो जाता है। फेमिनिज़म इन इंडिया के बारे में जो मुझे सबसे अच्छा लगा है, वह है इसकी कार्यशैली। इस प्लेटफॉर्म तक अपनी बात को पहुंचाने की प्रक्रिया बेहद आसान और सुलझी हुई है। इस संस्थान की पारदर्शी कार्यशैली की वजह से पीड़ित-वंचित समूहों को अपनी बात रखने में आसानी होती है। जटिल प्रक्रिया में उलझकर यहां कोई आत्मविश्वस खोने को मजबूर नहीं होता।

कुछ सुझाव भी हैं। इन्टरनेट और सोशल मीडिया के विस्तार की वजह से छपे अक्षरों में इंसानों की रूचि कम हो रही है। लोग वीडियो के माध्यम से सूचना और जानकारी लेने में अधिक सहज हो रहे हैं। अब तो किताबों को भी ऑडियो और वीडियो के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। ऐसे में फेमिनिज़म इन इंडिया को भी वीडियो और ऑडियो प्लेटफॉर्म पर अपने कॉन्टेंट अधिक से अधिक लाने चाहिए। साथ ही इंटर्नशिप प्रोग्राम में लेख के अलावा वीडियो रिपोर्ट पर भी जोर दिया जाना चाहिए। इससे लड़कियों के बोलने की हिचक को दूर करने में भी फेमिनिज़म इन इंडिया बड़ी भूमिका निभा सकता है।

अंतिम बात- महान नारीवादी लेखिका सिमोन द बोउवा ने लिखा था कि आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में स्त्री की स्वतंत्रता सिर्फ अमूर्त और सैद्धान्तिक रह जाती है। आर्थिक आत्मनिर्भरता स्त्री स्वातंत्र्य का दरवाजा है। फेमिनिज़म इन इंडिया अब सूचना के माध्यम से कही आगे निकलकर एक वैचारिक मंच बन चुका है। ऐसे में ये उम्मीद पैदा होना लाजिमी है कि फेमिनिज़म इन इंडिया अपनी क्षमता के मुताबिक ही सही लेकिन अपने साथ जुड़नेवाली स्त्रियों को आर्थिक बोझ कम करने में मदद करे। स्त्रियों के श्रम के लूट के इस दौर में उन्हें काम का सही दाम दे। इस संस्थान का इंटर्नशिप प्रोग्राम इस क्षेत्र में बढ़ता एक सराहनीय कदम है।

(फेमिनिज़म इन इंडिया श्वेता का उनके योगदान और उनके बेहतरीन लेखन के लिए आभार व्यक्त करता है। हमें बेहद खुशी है कि वह हमारी लेखकों में से एक हैं। आप श्वेता को, फेसबुकट्विटर और इंस्टाग्राम पर फॉलो कर सकते हैं.)


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