बात भारती की आज़ादी की लड़ाई में शामिल कुछ गुमनाम सेनानी महिलाओं की। #IndianWomenInHistory
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यह वह दौर था जब ब्रिटिश शासन की गुलामी से आज़ाद होने के आंदोलन में हर कोई अपने-अपने स्तर पर योगदान देने के लिए आगे आ रहा था। स्वतंत्रता सेनानी लगातार अंग्रेज़ों के दमन के खिलाफ़ आवाज़ उठाकर उनकी हुकूमत को खत्म करने में लगे हुए थे। भारत की आज़ादी की लड़ाई में बड़ी संख्या महिला स्वतंत्रता सेनानियों ने भी योगदान दिया थ, जिनकी भूमिका समय के साथ थोड़ी धुंधली पड़ गई। इस लेख के माध्यम से हम ऐसी ही कुछ महिला क्रांतिकारियों की बात करने जा रहे हैं जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद भी देश की सेवा ही अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य रखा।  

1- बीबी अम्तुस सलाम – सांप्रदायिक सद्भाव की समर्थक

तस्वीर साभार: NBT

बीबी अम्तुस सलाम एक समाज सेविका और महात्मा गांधी की अनुयायी थीं। बीबी अम्तुस सलाम ने भारत के विभाजन के बाद सांप्रदायिक हिंसा का मुकाबला करने और भारत आए शरणार्थियों के पुनर्वास में बहुत सक्रिय भूमिका निभाई थी। अम्तुस सलाम को महात्मा गांधी के विचारों का पालन किया करती थीं। बीबी अम्तुस सलाम का जन्म साल 1907 में पटियाला के एक पठान जमींदार परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम अब्दुल माज़िद खान था। इनके बड़े भाई अब्दुर राशिद खान भी एक स्वतंत्रता सेनानी थे।

अम्तुस सलाम के परिवार के ज्यादातर लोग विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए थे। अपने भाई और परिवार के अन्य सदस्यों के पाकिस्तान जाने के फैलने पर वह बहुत दुखी हुई थी। हालांकि, उनके इस व्यवहार पर महात्मा गांधी ने बहुत आपत्ति जताई थी। अम्तुस सलाम वापिस पटियाला लौटना चाहती थी, जहां से मुस्लिम परिवार और उनके परिवार के लोग पाकिस्तान चले गए थे। वह नौआखली में धार्मिक सौहार्द बनाने की दिशा में काम कर रही थी। दरअसल, जब देश का विभाजन हुआ था देश के कई हिस्सों में धार्मिक तनाव था, इसको खत्म करने के लिए कई लोग सक्रिय थे। नोआखली में शांति लाने के लिए उन्होंने महात्मा गांधी के साथ 21 दिनों तक उपवास किया। नोआखली में स्थिति संभल जाने के बाद महात्मा गांधी ने अम्तुस सलाम को वही रहकर सद्भाव स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी थी।

अम्तुस सलाम बेहद निडर महिला थीं। वह विभाजन के समय पटियाला में ही रहना चाहती थीं। उन्होंने अपने परिवार के फैसले के विपरीत भारत में रहना चुना था। उस वक्त की स्थिति को देखते हुए यह एक चुनौतीपूर्ण फैसला था। साल 1947-48 के दौरान, उन्होंने विभाजन के बाद बिगड़ी स्थिति में महिलाओं के पुनर्वास की खासतौर पर व्यवस्था की। वह कांग्रेस की सदस्या लज्जावती हूजा के साथ काम करती थीं। अम्तुस सलाम ने शरणार्थियों को निकालने में मदद करने के लिए कई पाकिस्तान की यात्राएं भी की थी।

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अम्तुस सलाम ने ‘कस्तूरबा सेवा मंदिर’ की स्थापना की थी। वह राजपुरा में रहने लगी थी। उन्होंने शरणार्थियों को बसाने के लिए सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए प्रयास किए। अम्तुल सलाम ने शरणार्थी कैंप के बच्चों को शिक्षा देने के लिए हिंदुस्तानी तालीम संघ की स्थापना की। साल 1980 में अम्तुस सलाम को ‘ऑल इंडिया कमेटी जेल सुधार’ के लिए के लिए बुलाया गया। 29 सितंबर 1985 में अम्तुस सलाम ने इस दुनिया से हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।  

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2- सत्यवती देवी – अपनी रिहाई की जगह देश की आज़ादी चुननेवाली सेनानी

तस्वीर साभार: Keshav Blogspot

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने वाला महिलाओं में एक नाम सत्यवती देवी का भी है। लोग इन्हें सत्यवती बहन के नाम से पुकारते थे। इनके पिता का नाम धनीराम और माता का नाम वेद कुमारी था। 23 वर्ष की उम्र में यह राष्ट्रीय आंदोलनों से जुड़ गई थीं। इनकी शादी दिल्ली के एक कपड़े के व्यापारी से हुई थी। दिल्ली में राष्ट्रवादी महिलाओं का नेतृत्व सत्यवती देवी ने ही किया था। अरुणा आसफ अली खुद के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने का श्रेय सत्यवती देवी को ही देती हैं। सत्यवती देवी ने दिल्ली और ग्वालियर के मिलों में सामाजिक कार्य किया। उन्होंने ‘कांग्रेस महिला समाज’ और ‘कांग्रेस देश सेविका’ की शुरुआत की थी। वह ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ की संस्थापक सदस्यों में से एक थीं।

सत्यवती देवी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी हिस्सा लिया था। वह सविनय अवज्ञा आंदोलन की दिल्ली यूनिट की महिला विंग की प्रमुख नेता थीं। उन्होंने दिल्ली में ‘नमक कानून’ तोड़ने के मोर्चे में भी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साल 1932 में उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था और दो साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी। जब वह जेल में थीं तो उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था। अनेक बीमारियों ने उन्हें अपनी गिरफ्त में कर लिया था। उन्हें जेल में टीबी भी हो गई थी। बीमार होने के दौरान उन्होंने जेल से बाहर आने के लिए राजनीतिक गतिविधियों में शामिल न होने का आश्वासन देने से मना कर दिया था। अगर वह सरकार की बात मान लेतीं तो उनकी रिहाई और इलाज आसानी से हो जाता। अपनी जान की परवाह किए बगैर उन्होंने जेल में ही रहना चुना। 1945 में मात्र 41 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया था। आजादी के आंदोलन में इनके अभूतपूर्व योगदान के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के ‘सत्यवती कॉलेज’ का नाम इन्हीं के नाम पर ही रखा गया था।

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3- पेरिन बेन कैप्टन – जिनके जीवन का एकमात्र मकसद था भारत की आज़ादी

तस्वीर साभार: Twitter

पेरिन बेन कैप्टन एक भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता, समाजसेवी और प्रसिद्ध भारतीय दादाभाई नरौजी की पोती थीं। पेरिन बेन कैप्टन का जन्म 12 अक्टूबर 1888 में गुजरात के कच्छ जिले के मांडवी में हुआ था। इनका परिवार पारसी था। इनके पिता का नाम पिता अर्देशिर था। जो पेशे से एक चिकित्सक थे। इनके पिता दादाभाई नौरोजी के सबसे बड़े पुत्र थे। इनकी माता का नाम वीरबाई ददीना था, वह एक गृहणी थीं। वह अपने आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। जब इनकी उम्र मात्र पांच साल की थी, इनके पिता की मृत्यु हो गई थी। इन्होंने अपनी प्रांरभिक शिक्षा बंबई से की थी। बाद में यह पढ़ने के लिए पेरिस चली गई थी, जहां इन्होंने फ्रेंच में स्नातक की डिग्री हासिल की थी। पेरिस में ही इनकी मुलाकात भीकाजी कामा के साथ हुई थी। पेरिस में उन्होंने कई आंदोलनों में हिस्सा लिया।

साल 1911 में भारत लौटने के बाद पेरिन को महात्मा गांधी से मिलने का अवसर मिला। इनके जीवन पर इस मुलाकात का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। साल 1920 में पेरिन बेन स्वदेशी आंदोलन से जुड़ी और उन्होंने खादी पहनना शुरू कर दिया। साल 1921 में उन्होंने ‘राष्ट्रीय स्त्री सभा’ को स्थापित करने में योगदान दिया। पेरिन बेन ने महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने के लिए जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पेरिन बेन का विवाह धुंधीशा एस कैप्टन से हुआ था। इनके पति एक वकील थे। विवाह के बाद भी इनकी सामाजिक सक्रियता जारी रही और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कई परिषदों में महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। साल 1930 में वह कांग्रेस कमेटी की बंबई प्रांत की पहली महिला अध्यक्ष बनी थीं।

पेरिन बेन ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी हिस्सा लिया था। इसी दौरान वह पहली बार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए जेल में गई थी। महात्मा गांधी द्वारा साल 1930 में ‘गांधी सेवा सेना’ का पुनर्गठन किया गया था। पेरिन बेन को इसका मानद महासचिव बनाया गया था। वह अपनी मृत्यु तक इस पद पर अपनी सेवाएं देती रही थी। साल 1958 में इनकी मृत्यु हुई। देश की आजादी के बाद साल 1954 में भारत सरकार की ओर से जारी पहली बार में ही पेरिन बेन कैप्टन को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पेरिन बेन ने एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपने दृढ़ संकल्प और योगदान के लिए न केवल भारत में बल्कि विश्व स्तर पर लोगों का ध्यान खींचा। 

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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