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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कई ऐसे नाम हैं जो सुर्खियों से बाहर रहे हैं। इन गुमनाम नामों का योगदान अमूल्य है। देश की आज़ादी के लिए उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए अंग्रेजों के दमन के खिलाफ आवाज़ उठाई, लाठियां खाई और सीने पर गोली खाते हुए अपने प्राण स्वाधीनता के लिए न्यौछावर कर दिए। उन्हीं में से एक नाम हैं, मातंगिनी हाजरा। आज़ादी की लड़ाई में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थीं। इन महिलाओं ने उस समय अंग्रेज़ों के खिलाफ तो मोर्चा खोला ही साथ में पितृसतात्मक सोच को भी पीछे छोड़ा। मातंगिनी हाजरा वह क्रांतिकारी महिला हैं जिन्होंने रूढ़िवाद की बेड़ियों को काटकर खुद को क्रांति की राह से जोड़ दिया और जीवन की अंतिम सांस तक वह क्रांति मार्ग पर डटी रही। महात्मा गांधी की अनुयायी मातंगिनी हाजरा के स्वतंत्रता आंदोलन के जज़्बे को देखते हुए सब उनको ‘बूढ़ी गांधी’ कहते थे। बूढ़ी गांधी के नाम से मशहूर मातंगिनी हाजरा के हौसले इतने बुलंद थे कि वह अंग्रेजों के खिलाफ होने वाले हर आंदोलन में सबसे आगे रहती थी।

शुरुआती जीवन

19 अक्टूबर 1869 को मातंगिनी का जन्म ब्रिटिश भारत शासित बंगाल के मिदनापुर ज़िले के तामलुक थाना क्षेत्र के होगला गांव में हुआ था। बेहद गरीब परिवार में जन्म होने के कारण मातंगिनी स्कूली शिक्षा लेने से वंचित रहीं। परिवार की आर्थिक स्तिथि बहुत खराब होने के कारण उन्होंने बचपन में बाल विवाह कुरीति का भी सामना किया। बहुत ही छोटी उम्र मात्र 12 वर्ष में उनका विवाह 60 साल के विधुर, एक पुत्र के पिता त्रिलोचन हाजरा के साथ कर दिया गया। 18 वर्ष की आयु में मातंगिनी हाजरा विधवा भी हो गईं। विधवा होने के बाद वह अपने ससुराल अलीनान से अपने पैतृक गांव वापस आ गई। गांव आकर उन्होंने अपना सारा समय सामाजिक सेवा में लगा दिया। मातंगिनी हाजरा गांधी जी को अपना आदर्श मानती थीं। वह उनके बताए रास्ते पर चलकर अपनी जीवन जीने लगी थीं। बढ़ती उम्र और कमज़ोर आंखों की रोशनी के बावजूद उन्होंने चरखे से सूत कातना शुरू किया और वह खुद के बनाए कपड़े पहना करती थी। तामलुक क्षेत्र में चेचक के फैलने के बाद अपनी जान की परवाह करे बगैर वह बीमार लोगों की देखभाल मे लग गई। देश के लोगों की सेवा और अग्रेंज हुकूमत की भारत से वापसी ही उनके जीवन का लक्ष्य था।

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आज़ादी की लड़ाई में भागीदारी

1900 का शुरुआती वक्त था, आज़ादी के लिए राष्ट्रीय आंदोलन शुरू हो चुका था और महात्मा गांधी स्वतंत्रता के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए देशभर का भ्रमण कर रहे थे। इसी दौरान वह स्वतंत्रता के लिए किए जा रहे प्रयत्नों में रूचि लेने लगीं और कुछ समय बाद खुद एक सेनानी बनकर स्वाधीनता संग्राम में शामिल हो गईं। साल 1905 आते-आते हाजरा स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो चुकी थीं। आजादी के लिए लोगों में राजनैतिक सजगता बढ़ाने के लिए एक मार्च निकल रहा था। वह मार्च जब मातंगिनी की झोपड़ी के सामने आया तो वह उसमें शामिल हो गई। मिदनापुर का नाम स्वतंत्रता संग्राम में अधिक संख्या में महिलाओं के भाग लेने के चलते इतिहास में दर्ज है। मिदनापुर के स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को अधिक सक्रिय करने में मातंगिनी हाजरा की अहम भूमिका थी। साल 1920 में मातंगिनी हाजरा ने असहयोग आंदोलन में भी भाग लिया। साल 1930 में गांधी जी की अगुआई में निकलने वाले दांडी मार्च के तहत अलीनान केंद्र पर नमक कानून तोड़ने के जुर्म में उन्हें बिट्रिश पुलिस ने गिरफ्तार कर छह महीने के लिए बहरामपुर जेल में डाल दिया। ब्रिटिश सरकार ने नमक बनाने पर टैक्स लगा दिया था, इसलिए समुद्र से नमक बनाना अवैध माना जाता था। इस घटना से लोगों में असंतोष पैदा हुआ।

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मातंगिनी हजरा की प्रतिमा, तस्वीर साभार- विकीपीडिया

इसके बाद मातंगिनी हाजरा की आंदोलनों और मोर्चों में सक्रियता बढ़ गई। वह अंग्रेज़ों के दमन के खिलाफ होने वाले हर कार्यक्रम में भाग लेती थी। कोर्ट परिसर में गर्वनर के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सभी आंदोलनकारियों को सजा दी गई। मातंगिनी को दोबारा गिरफ्तार किया गया और फिर छह महीने की कैद में भेज दिया गया। जेल की यातनाओं ने मातंगिनी को लक्ष्य के प्रति और सचेत कर दिया। 61 वर्ष की उम्र में वह सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल गईं। जेल से रिहाई के बाद वह क्षेत्रीय स्तर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में और ज्यादा सक्रिय हो गईं। साल 1933 में उन्होंने सेरमपुर सब-डिविज़न कांग्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया। कार्रवाई में पुलिस ने लाठियां चलाई, जिसमें मातंगिनी हाजरा को भी चोटें आईं। साल 1933 मे ही बंगाल गर्वनर सर जॉन एंडरसन तामलुक में एक सभा को संबोधित करने आए। सुरक्षा घेरे को भेदते हुए मातंगिनी ने गर्वनर को काला झंडा दिखाया और उनके खिलाफ नारेबाज़ी भी की जिसके लिए उन्हें फिर से कठोर कारावास मिला।

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बलिदान की महानगाथा

समय बीतने के साथ-साथ क्रांति मोर्चो में भी तेजी आ गई थी और साथ ही दोगुनी तेज़ी से बढ़ रहा था मातंगिनी हाजरा का हौसला। बढ़ती उम्र, कमज़ोर शरीर के बावजूद उनकी आंदोलन में सक्रियता बरकरार थी। 9 अगस्त 1942 में ‘अंग्रेज़ भारत छोड़ो’ आंदोलन में भाग लिया। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद देश के लोगों में चेतना बढ़ी। उनके इस आह्वान के बाद सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस समर्थकों ने नेताओं की रिहाई और अंग्रेज़ भारत छोड़ो की मांग के लिए बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया। 73 वर्षीय मातंगिनी हाजरा छह हजार प्रदर्शनकारियों जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक थी, उनका नेतृत्व करते हुए तामलुक पुलिस स्टेशन की ओर मार्च किया। जिसका उद्देश्य पुलिस स्टेशन का घेराव करना था वह गिरफ्तार लोगों की रिहाई की मांग करना था। जैसे ही गांव के बाहरी ओर टीम पंहुची, ब्रिट्रिश पुलिस ने उस क्षेत्र में धारा 144 (अवैध सभा) लागू कर दी। ब्रिटिश हुकूमत के द्वारा निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने के लिए मना करती मातंगिनी हाजरा ने आगे कदम बढ़ाए लेकिन पुलिस ने उनकी बात नकारते हुए गोली चलाई जो उनकी बाजू में लगी। हाथ में झंडा लिए मातंगिनी फिर भी आगे बढ़ती रही पुलिस ने फिर दो गोली चलाई जिनमें से एक उनकी बाजू और दूसरी उनके माथे पर लगी। तीन गोली लगने के बावजूद मतांगिनी मजबूत हाथों से तिंरगे को पकड़ते हुए अपनी तेज आवाज में वंदे मातरम् कहते हुए धरती पर गिर गई और देश की आजादी के लिए अपनी जान न्योछावर कर दिए।

मातंगिनी हाजरा पर जारी किया गया डाक टिकट

देश की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ों की गोली खाने वाली मातंगिनी हाजरा के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता। स्वाधीनता के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया। दमन के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली मातंगिनी की वीरता और तामलुक की घटना का स्मरण बना रहे इसलिए इस महान वीरांगना की प्रतिमा का अनावरण किया गया। मातंगिनी हाजरा पहली महिला सेनानी थीं जिसकी मूर्ति आजाद भारत के कोलकत्ता में स्थापित की गई थी। कसे हाथों से कंधे पर झंड़ा लिए और चेहरे पर दृढ़ संकल्प के भाव से बनी यह प्रतिमा आज भी उनकी वीरता का प्रतीक हैं। उनके नाम पर बहुत से स्कूल, कॉलोनियां का नामकरण किया गया। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकत्ता में ‘हाजरा मार्ग’ इस वीरांगना के नामपर हैं। साल 2002 में भारत छोड़ो आंदोलन के 60 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया था।  

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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