संध्या मुखर्जीः एक सुनहरी आवाज़
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“बंगबंधु तुमी फिर एले” यह गीत बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम आंदोलन के दौरान गाया जाने वाला एक प्रमुख गीत था। हम इस लेख में इसी गीत को अपनी आवाज़ देने वाली उस गायिका की बात करने जा रहे हैं जिनका नाम है संध्या मुखर्जी। संध्या मुखर्जी एक भारतीय पार्श्व गायिका और संगीतकार थीं। बंगाली संगीत में इनकी विशेषज्ञता थीं। संध्या मुखर्जी बंगाल के गायन क्षेत्र की एक प्रमुख आवाज़ थीं। संगीत महज उनके लिए एक कला या पेशा नहीं था बल्कि उनके जीवन और संघर्षों का प्रतीक बना। संध्या मुखर्जी संगीत को एक क्रांति का अंग मानती थीं। यही कारण है कि उन्होंने बंगाली अस्मिता के लिए बांग्लादेश के मुक्ति आंदोलन में संगीत के माध्यम से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संध्या मुखर्जी ने बांग्ला समेत लगभग एक दर्जन अन्य भाषायों में गीत गाए हैं।

संध्या मुखर्जी का जन्म 4 अक्टूबर 1931 में ढुकरिया, कलकत्ता आजादी से पहले बंगाल प्रेसीडेंसी में हुआ था। इनके पिता का नाम नरेन्द्रनाथ मुखर्जी था, जो रेलवे में एक अधिकारी थे। इनकी माता का नाम हेमपूर्वा मुखर्जी था। यह अपने माता-पिता की छह संतानों में सबसे छोटी थी। इनके दादा जी भी उस समय एक पुलिस अधिकारी थे। इनका परिवार ढुकरिया में 1911 से रह रहा था।

संगीत की शुरुआत

संध्या मुखर्जी का संगीत से नाता उनके परिवार के कारण ही जुड़ा था। संगीत में उन्होंने अपने पूर्वज अपने परदादा की रवायत को ही आगे बढ़ाया था। मात्र 12 साल की उम्र में संध्या मुखर्जी ने गाना शुरू कर दिया था। उन्होंने अपनी पहली रिकार्डिंग 13 साल की उम्र में ‘आल इंडिया रेडियो’ के साथ की थी। 1940 के अंत में संध्या ने संगीत की शिक्षा पंडित संतोष कुमार बासु, प्रोफेसर ए. टी. कनन और प्रोफेसर चिन्मय लहरी लेनी शुरू कर दी थी।

हालांकि, उन्होंने औपचारिक प्रशिक्षिण पटिलाया घराना के प्रसिद्ध उस्ताद बड़े गुलाम अली खान से लिया था। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान उनके गुरु थे। उनके बाद उनके बेटे उस्ताद मुनव्वर अली खान के अधीन उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल की थी। पार्श्व गायन में नाम और शोहरत हासिल करने के बाद भी संध्या मुखर्जी शास्त्रीय गायन में भी अपनी लोकप्रियता बनाने रखने में सफल हुई थीं। हालांकि, शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षिण हासिल करने के बावजूद उनके अधिकांश काम में बांग्ला आधुनिक गीत भी शामिल थे।

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संध्या मुखर्जी बंगाल के गायन क्षेत्र की एक प्रमुख आवाज़ थीं। संगीत महज उनके लिए एक कला या पेशा नहीं था बल्कि उनके जीवन और संघर्षों का प्रतीक बना।

संध्या मुखर्जी ने पार्श्व गायन की शुरुआत फिल्म ‘अंजानग्रह’ में संगीत निर्देशक रायचंद्र बोरल के साथ की थी। इसके बाद साल 1950 में वह मुंबई चली गई थी। जहां उन्होंने एस.डी. बर्मन के साथ फिल्म ‘तराना’ से अपने हिंदी फिल्मी संगीत के करियर की शुरुआत की थी। हिंदी फिल्मों में गायन के दौरान उन्होंने बॉलीवुड के दिग्गज़ संगीतकारों के साथ काम किया था। जिसमें एस.डी. बर्मन के साथ-साथ मदन मोहन, नौशाद, अनिल बिश्वास और सलिल चौधरी जैसे नाम शामिल हैं। उन्होंने हिंदी में लगभग 17 फिल्मों में पार्श्व गायिका के तौर पर काम किया था। हिंदी में गायन की सफलता के बावजूद निजी कारणों की वजह से उन्होंने 1952 में अपने गृहनगर कलकत्ता वापिस जाना चुना। 1966 में उनका विवाह बंगाली कवि श्यामल गुप्ता के साथ हुआ था। आगे जाकर गुप्ता ने लिखे कई गानों को इन्होंने अपनी आवाज़ दी थी।

बंगाल में आगे का संगीत सफर

बंगाल वापिस आने के बाद उन्होंने बंगाली भाषा की फिल्मों में गाना शुरू कर दिया। इस दौरान उन्होंने हेमंत मुखर्जी, नचिकेता घोष और रबिन चटर्जी के साथ काम किया। बंगाली फिल्मों में मुखर्जी ने पहला प्लेबैक फिल्म ‘अग्निपरीक्षा’ में गाया था। यह गीत सुचित्रा सेन पर फिल्माया गया था। बंगाली फिल्म इंडस्ट्री में हेमंत मुखर्जी के साथ इनके गायन की जोड़ी बहुत हिट हुई थी। हेमंत और संध्या गायन की जोड़ी बंगाली सुपरस्टार उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की प्रमुख आवाज़ बन गई थी। सुचित्रा सेन के बहुत सारे सफल गाने, गाने के बाद उन्हें ‘वॉयस ऑफ सुचित्रा’ भी कहा जाता था। हेमंत मुखर्जी के साथ उनके गीत संगीत प्रेमियों के द्वारा याद किए जाते हैं।

बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम से जुड़ी

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भारतीय बंगाली कलाकारों के द्वारा शरणार्थियों के लिए धन जुटाने की मुहीम का वह महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं। बांग्लादेश के लोगों की मदद करने के लिए उन्होंने मुफ्त में संगीत कार्यक्रम करके धन इकट्ठा किया था। उन्होंने बांग्लादेशी संगीतकार समर दास की बहुत सहायता की, क्योंकि उन्होंने बांग्लादेश में प्रसारित होनेवाले सीक्रेट रेडियो स्टेशन ‘स्वाधीन बांग्ला बेतार केंद्र’ की स्थापना की थी। संध्या मुखर्जी ने उनके लिए कई देशभक्ति गीत रिकॉर्ड किए थे।

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बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान जब 1972 में बांग्लादेश लौटे थे तो उनका स्वागत संध्या मुखर्जी द्वारा गाए एक गीत से किया गया था। उन्होंने एक गीत ‘बंगबंधु तुमी फिरे एले’ जारी किया था। यह गीत एक राष्ट्र के नरसंहार के दर्द, खुशी के आंसू और एक बेहतर भविष्य की आशा का प्रतीक था। बाद में 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद ढ़ाका जानेवाली पहली कलाकार बनीं। बांग्लादेश की आज़ादी के जश्न में उन्होंने ढाका में एक खुले मैदान में प्रस्तुति दी थी।

सम्मान

संध्या मुखर्जी के संगीत के अमूल्य योगदान के लिए उन्हें 2011 में ‘बंग विभूषण’ से सम्मानित किया गया। 1971 में उन्हें सर्वश्रेष्ट पार्श्व गायिका के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1965 में और 1972 में फिल्म ‘जय जंयती’ के लिए बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट अवॉर्ड की ओर से सर्वश्रेष्ट गायिका का पुरस्कार मिला। 1999 में ‘भारत निर्माण अवॉर्ड’ की ओर से लाइफ टाइम अचीवमेंट से सम्मानित किया गया। 2009 में जाधवपुर विश्वविद्यालय की ओर से डिलीट की उपाधि प्राप्त की गई थीं।

हालांकि, उन्होंने इसी वर्ष गणतंत्र दिवस से पहले भारत सरकार की ओर से 2022 पद्म पुरस्कारों की घोषणा के लिए सरकार द्वारा संपर्क किए जाने पर पद्मश्री पुरस्कार स्वीकार करने से मना कर दिया था। उनके पुरस्कार लौटाने पर उनकी बेटी सौमी सेनगुप्ता ने कहा था, ‘90 साल की उम्र में उनके जैसी एक किंवदंती को पद्मश्री प्रदान करना बेहद अपमानजनक है।’

इनकी मृत्यु 15 फरवरी 2022 में 90 साल की उम्र में हृदयगति रुकने से हुई। 50 और 60 के दशक की मुधर आवाज़ संध्या मुखर्जी के निधन पर न केवल देश में बल्कि पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में भी शोक मनाया गया। उनके निधन पर देश की हस्तियों के अलावा बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी दुख जाहिर किया।

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तस्वीर साभारः HW News

स्रोत: The Telegraph

The Indian Express

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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