इंटरसेक्शनलजेंडर समाज के ‘डर’ का ख़ामियाज़ा भुगत रही हैं महिलाएं

समाज के ‘डर’ का ख़ामियाज़ा भुगत रही हैं महिलाएं

महिलाओं को शिक्षा और उनके विकास के अवसर से उन्हें दूर कर दिया जाता है, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि समाज को ये डर लगता है कि कहीं महिलाएँ हिंसा की पहचान कर उन्हें चुनौती न देने लग जाए।

भारतीय समाज में महिलाएँ सदियों से समाज का भार ढोती आयी है। कई बार ज़ोर-ज़बरदस्ती से तो कई बार कंडिशनिंग से हमारा पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को अपने इशारों पर चलाने की कोशिश करता है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ प्रगतिशील और आधुनिक दिखने के लिए यही समाज समय-समय पर महिलाओं के विकास की बात भी करता है। महिला शिक्षा को लेकर एक नारा सुना था “जब एक महिला पढ़ती तो पूरा समाज पढ़ता है।” यह कहकर अक्सर महिलाओं को शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाता है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? एक महिला के शिक्षित होने से पूरा समाज पढ़ लेता है, इस बात का ज़वाब हां में दे पाना थोड़ा मुश्किल लगता है। लेकिन हां गांव में पढ़ती और बढ़ती महिलाओं और लड़कियों पर पाबंदी लगाने के लिए रोड़ा बनते समाज को आए दिन देखा जा सकता है। महिलाओं की ज़िंदगी में समाज की अहम भूमिका है या ये कहें कि समाज की अहम भूमिका को ज़बरदस्ती महिला की ज़िंदगी में बना दिया जाता है जिसके चलते महिला ज़िंदगी लगातार समाज से प्रभावित होती है।

अगर गाँव-बस्ती में कोई एक महिला भी लैंगिक भेदभाव या हिंसा को चुनौती देने के लिए अपने कदम बढ़ाती है तो समाज को ये डर लगने लगता है कि कहीं ये बढ़ते कदम समाज की सत्ता को चुनौती न देने लगे, इसलिए वो अपने डर को दूर करने के लिए महिलाओं पर सुरक्षा के नामपर पाबंदी लगाना शुरू करता है, कई बार ये पाबंदी हिंसात्मक होती और कई बार दमनकारी। अगर मैं बात करूँ ग्रामीण क्षेत्रों एक समुदाय स्तर की तो यहाँ बड़ी संख्या में युवा महिलाओं पर समाज का दबाव साफ़ देखा जा सकता है, हर गाँव हर बस्ती में कई घर-परिवार ऐसे मिलते है जब महिलाओं को शिक्षा और उनके विकास के अवसर से उन्हें दूर कर दिया जाता है, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि समाज को ये डर लगता है कि कहीं महिलाएँ हिंसा की पहचान कर उन्हें चुनौती न देने लग जाए या फिर बराबरी की बात न करने लग जाए।

बनारस ज़िले से क़रीब पचीस किलोमीटर दूर बसे करधना गाँव की दलित बस्ती में रहने वाली आरती दसवीं की छात्रा है। पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय आरती अक्सर गाँव स्तर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में हिस्सा लेती है। हाल ही में, जब आरती ने एक संस्था की तरफ़ से आयोजित किशोरी पतंगबाज़ी के कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जिसमें उसकी गाँव की और भी लकड़ियों ने हिस्सा लिया था। कार्यक्रम का आयोजन खुले मैदान में हुआ, जिसमें कुछ लड़के भी क्रिकेट खेल रहे थे। उन्हीं लड़कों में से किसी एक ने आरती की शिकायत उसके भाई से कि और उसे बताया कि ‘आरती गाँव के लड़कों के बीच में पतंग उड़ा रही थी।‘ इसके बाद आरती के भाई ने उसके साथ बुरी तरह मारपीट की और उसके कहीं भी बाहर आने-जाने और कार्यक्रम में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी।

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सेवापुरी ब्लॉक के गजेपुर गाँव की रहने वाली पचीस वर्षीय शीतल को भी आरती की ही तरह हिंसा का सामना तब करना पड़ा जब उसके बस्ती की एक लड़की ने अपनी मर्ज़ी से जाकर शादी कर ली। उस समय शीतल बीए कर रही थी। उस लड़की की शादी के बारे में सुनते ही पूरी बस्ती की लड़कियों पर पाबंदी लगा दी गयी और जल्दीबाज़ी ने शीतल की भी शादी कर दी गयी, क्योंकि उसके परिवार को डर था कि कहीं शीतल भी अपनी मर्ज़ी से शादी न कर ले। जल्दीबाज़ी की उस शादी का ख़ामियाज़ा शीतल आज तक भुगत रही है। शीतल की एक सालभर की बच्ची है, उसका शराबी पति आए दिन उसके साथ मारपीट करता था। राखी के दिन उसके पति ने शीतल के साथ इतनी मारपीट की कि वो अधमरी हो गयी, उसके बाद से वो मायके में रह रही है। शादी के चलते उसकी पढ़ाई बीच में ही छूट गयी, गरीब परिवार की शीतल पर अपनी बच्ची की परवरिश का भी भार है।

खडौरा गाँव की पूजा को आठवीं के बाद अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। मज़दूर परिवार की पूजा जिस स्कूल में पढ़ने जाती थी, वो आठवीं तक ही था और आगे की पढ़ाई के लिए उसे दूर के स्कूल में जाना पड़ता, जहां लड़के भी पढ़ते। इसलिए पूजा की बस्ती की अधिकतर लड़कियों ने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि परिवार वालों को डर था कि अगर उनकी लड़कियाँ दूर उस स्कूल में पढ़ने जाएँगी तो उनके साथ ऊँच-नीच हो जाएगी।

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ग्रामीण स्तर पर ऐसी लड़कियों और महिलाओं के ढ़ेरों उदाहरण है जब महिलाओं को समाज का डर दिखाकर उनके बढ़ते हुए कदम को रोक दिया जाता है। उनकी शिक्षा को बाधित कर दिया है। कहने को तो भले हम ये कहें कि महिला के पढ़ने से परिवार पढ़ता है, लेकिन वास्तविकता यही है कि पढ़ती हुई महिलाओं को समाज स्वीकार नहीं कर पाता है और इसे सभी समस्याओं का हल सिर्फ़ महिलाओं पर पाबंदी लगाने में ही दिखाई पड़ता है।

आज हम कितनी भी आधुनिकता और विकास की बात करें और ये कहें कि महिलाएँ आगे बढ़ रही हैं, पर सच्चाई यह है कि कितनी महिलाएं पितृसत्तात्मक सोच से ख़ुद को बचाकर आगे आ पाती है, ये कहना मुश्किल है, लेकिन ऐसी ढ़ेरों महिलाएं और लड़कियां हैं जिन्हें अपनी शिक्षा और अवसर की भेंट चढ़ानी पड़ती है। कई बार ऐसा लगता है कि समाज में महिलाओं की हर चाल पर समाज की इज़्ज़त की जान बसती है और जैसे ही कोई महिला एक कदम भी अपनी मर्ज़ी के उड़ाती है तो उस इज़्ज़त की जान निकलने लगती है। इज़्ज़त के नामपर समाज की पितृसत्तात्मक वाली सोच ने जेंडर आधारित हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा देने में अहम भूमिका अदा की है। आरती और शीतल दोनों अपने अवसरों की भेंट चढ़ाकर समाज के इशारे पर चलने को मजबूर है, लेकिन इन दोनों के साथ हुई हिंसा की ज़वाबदेही किसकी है इसके बारे में सोचा भी नहीं जाता है।

गाँव में और समुदाय स्तर पर आरती, शीतल और पूजा जैसी महिलाओं के उदाहरण कई बार दूसरी महिलाओं के मनोबल और आत्मविश्वास को प्रभावित करते है। इसकी वजह से अक्सर लड़कियाँ और महिलाएँ ख़ुद भी आगे बढ़ने से डरने लगती है और परिवार-समाज के इशारों पर ही ज़िंदगी गुज़ारने को सुरक्षित समझती है। विकास के नामपर महिला शिक्षा और रोज़गार की बात करने वाले समाज को अपने घरों, गाँव और बस्तियों में झांकने की ज़रूरत है, क्योंकि वहाँ उनकी सड़ी आधुनिकता के संक्रमण का शिकार होती ऐसी ढ़ेरों महिलाएँ जो हिंसा का शिकार हो रही है।    

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तस्वीर साभार : theguardian

About the author(s)

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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