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ममता (बदला हुआ नाम) के पति ने कभी उसके साथ मारपीट नहीं की। लेकिन पति का एक नज़र घूरना ही ममता को डरा देता है।

पुष्पा (बदला हुआ नाम) कहती है कि पति ने कभी उसे कुछ कहा नहीं, लेकिन हमेशा हमें मर्यादा में रखा है।

गीता (बदला हुआ नाम) के पति खाने का शौक़ीन है। कभी अगर खाना थोड़ा कम टेस्टी हो तो वह गीता को कुछ कहता नहीं बस थाली उठाकर फेंक देता है।

आपने भी कभी न कभी ममता, पुष्पा और गीता जैसी महिलाओं और उनके पति के बारे में सुना होगा। जब भी महिला हिंसा की बात करते हैं तो अक्सर हमलोगों के मन में महिला हिंसा को लेकर यही छवि आती है कि महिला के साथ मारपीट करना या फिर उसको भला-बुरा कहना ही महिला हिंसा है। पर वास्तव में ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ मारपीट या भला-बुरा कहना ही हिंसा है। कई बार बिना कुछ कहे ही अपने व्यवहार से महिलाओं का मानसिक उत्पीड़न किया जाता है, जो महिला हिंसा का ही स्वरूप है।

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ब्रेकथ्रू नाम की संस्था द्वारा घरेलू हिंसा के मुद्दे पर बनायी गई यह वीडियो बहुत अच्छे से महिलाओं के साथ होने वाली मानसिक हिंसा को उजागर करता है। इस वीडियो में बहुत अच्छे तरीक़े से दिखाया गया है कि‘बिना हाथ उठाए कैसे एक मर्द ये बता देते हैं कि घर में मर्द कौन है। दो मिनट अट्ठारह सेकंड का यह वीडियो महिला हिंसा के उन सभी रूपों को उजागर करता है, जिन्हें हम झेलते तो हैं लेकिन कभी इस हिंसा की पहचान ही नहीं कर पाते हैं।

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पितृसत्ता में महिलाओं को हमेशा पुरुषों से कम बताया जाता है। पूरी व्यवस्था एक लड़की को उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक यह एहसास दिलाती है कि पुरुष उनसे बेहतर हैं, इसलिए उनके सामने महिलाओं की स्थिति हमेशा दास की भूमिका में होनी चाहिए। जो पुरुषों की ग़ुलामी करें, उन्हें पूजनीय मानें और उनके इशारों पर चलें। बदलते समय के साथ हमारी सामाजिक व्यवस्था में कई बदलाव आए, जिसमें क़ानून का भी बड़ा हाथ रहा। हमारे देश में महिला हिंसा पर रोक लगाने के लिए ढ़ेरों क़ानून बनाए गए और बक़ायदा महिला हिंसा को परिभाषित करते हुए इसके लिए सजा भी बनाई लेकिन अभी भी महिला हिंसा को लेकर आमजन ख़ासकर महिलाओं में जागरूकता का अभाव है।

जब भी महिला हिंसा की बात करते हैं तो अक्सर हमलोगों के मन में महिला हिंसा को लेकर यही छवि आती है कि महिला के साथ मारपीट करना या फिर उसको भला-बुरा कहना ही महिला हिंसा है।

एक तरफ़ हमारी सामाजिक व्यवस्था महिला को पुरुष से कम मानती है, इसलिए ये पुरुषों को महिलाओं से ज़्यादा ताक़तवर बनाती है। कभी उनको समाज में नेतृत्व की जगह देकर तो कभी उन्हें कई सारे अधिकार देकर। ठीक उसी समय यही सामाजिक व्यवस्था महिलाओं को कमज़ोर बनाने का काम करती है। उन्हें ग़ुलामी और हिंसा के लिए अभ्यस्त बनाती है। उनके साथ भेदभाव और हिंसा के व्यवहार को सामान्य बताती है। समाज की महिलाओं के लिए पितृसत्तात्मक सीख के पाठ का प्रभाव यह होता है कि कई स्तर पर महिलाएं भी हिंसा की आदी होने लगती है और इसके चलते उन्हें अपने साथ होने वाली हिंसा का अंदाज़ा ही नहीं लगता है।

पर ऐसा नहीं है कि जब हम मानसिक हिंसा या उत्पीड़न की बात कर रहे हैं तो इसका प्रभाव शारीरिक हिंसा यानी कि मारपीट या मौखिक हिंसा जैसे कि गाली-गलौच से कम होगा। बचपन से ही कभी पिता, भाई तो कभी पति जैसे तमाम पुरुषों द्वारा महिलाएं मानसिक हिंसा का सामना करती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि महिलाओं का आत्मविश्वास कम होने लगता है और वे अपने साथ होने वाली मानसिक हिंसा को पहचान भी नहीं पाती हैं।

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मानसिक हिंसा किसी भी इंसान के पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करती है। यह इंसान के आत्मविश्वास को कमज़ोर करने का काम करती है और कई बार इसका प्रभाव इतना ज़्यादा होता है कि कई ख़तरनाक मानसिक समस्याओं का सामना भी करना पड़ जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम महिलाओं को महिला हिंसा के बारे में जानकारी हो। कहीं न कहीं यह मानसिक हिंसा ही है जो महिलाओं का आत्मविश्वास इस तरह प्रभावित करती है कि वे अपने साथ होनेवाली हिंसा के ख़िलाफ़ सालों- साल तक आवाज़ नहीं उठा पाती हैं। उन्हें यह विश्वास ही नहीं होता पाता कि सालों से हिंसा का क्रूर रूप झेलने के बाद भी अगर वे किसी रिश्ते से बाहर निकलती हैं तो अपनी आजीविका के लिए वे खुद कुछ कर सकती हैं या वे ख़ुद भी आर्थिक रूप आत्मनिर्भर बन सकती हैं।

बचपन से ही कभी पिता, भाई तो कभी पति जैसे तमाम पुरुषों द्वारा महिलाएं मानसिक हिंसा का सामना करती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि महिलाओं का आत्मविश्वास कम होने लगता है और वे अपने साथ होने वाली मानसिक हिंसा को पहचान भी नहीं पाती हैं।

मानसिक हिंसा महिलाओं को बचपन से ही कमज़ोर बनाने में अहम भूमिका अदा करती है। अगर किसी घर में कोई महिला मानसिक हिंसा का सामना कर रही है तो उसके बच्चे भी इस हिंसा से प्रभावित होते हैं और घर की अन्य महिलाओं पर भी इसका प्रभाव होता है। मानसिक हिंसा के साथ एक समस्या यह है कि इसके प्रभाव का कोई साक्ष्य नहीं मिलता, जैसे मारपीट के निशान हो सकते हैं पर मानसिक हिंसा के नहीं। पर ऐसा नहीं है, क्योंकि हम महिलाओं खुद ही मानसिक हिंसा के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है इसलिए बहुत बार हम ख़ुद ही इसकी पहचान नहीं कर पाते और यह सोचकर तसल्ली में रहते हैं कि पति मारता नहीं है बस घूरकर डरा देता है। अब जब हम लोग खुद ही अपने साथ होने वाली मानसिक हिंसा को नहीं पहचान पाएंगे तो इसे रोकने की दिशा में कोई काम नहीं कर पाएंगें। इसलिए महिला हिंसा के उन स्वरूपों को भी पहचाने जिसे नज़रंदाज़ करने की आदत हम महिलाओं में इस सामाजिक व्यवस्था ने डाली है।

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तस्वीर साभार : Saikat Paul/Pacific Press/LightRocket via Getty Images

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