चंद्रप्रभा सैकियानीः जिसने जीवन के हर रूप में समाज को चुनौती दी
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चंद्रप्रभा सैकियानी या चंद्रप्रवा सैकियानी एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, कार्यकर्ता, लेखक और समाज सुधारक थीं। जिन्हें असम में नारीवादी आंदोलन की प्रमुख नेता माना जाता हैं। वह ‘अखिल असम प्रादेशिक महिला समिति’ की संस्थापक थीं। यह असम की महिलाओं के कल्याण के लिए काम करने वाली एक गैर-सरकारी संस्था थी। चंद्रप्रभा सैकियानी को चौथे सर्वोच्च भारतीय नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। उन्होंने 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1920-22 असहयोग आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई थीं। विधानसभा के लिए चुनाव लड़कर, वह स्वतंत्र भारत में राजनीति में आने वाली पहली महिला बनीं। सैकियानी एक प्रसिद्ध कवि और लेखक भी थीं।

प्रारंभिक जीवन का संघर्ष

उनका जन्म “चंद्रप्रिया मजूमदार” (चंद्रप्रिया दास) के रूप में 16 मार्च 1901 को असम में कामरूप जिले के दोईसिंगरी गांव में हुआ था। वह अपने माता-पिता के ग्यारह बच्चों में से सातवीं संतान थीं। उन्होंने अपने लिए “चंद्रप्रभा सैकियानी” नाम चुना। उनकी बहन रजनीप्रभा सैकियानी (जो बाद में असम की पहली महिला डॉक्टर बनीं) के साथ, वे कई किलोमीटर दूर लड़कों के एक स्कूल (वहां लड़कियों का स्कूल नहीं था) में पढ़ने के लिए जाती थीं। वह स्कूल के बाद स्थानीय लड़कियों को इकठ्ठा करके उनके पढ़ाती थी। उनके इन प्रयासों पर नीलकांत बरुआ की नज़र पड़ी। उन्होंने उनकी बहन और उन्हें नागाओं मिशल स्कूल की छात्रवृत्ति दीं। चंद्रप्रभा ने इस स्कूल में शिक्षा हासिल करने के साथ कई मौकों पर संस्था को भी चुनौती दी। उन्होंने लड़कियों को छात्रावास में तबतक प्रवेश नहीं दिया जाएगा जब तक वे ईसाई धर्म नहीं अपना लेती जैसे नियम का विरोध किया।

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उन्होने इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। स्कूल के अधिकारी उनके दृष्टिकोण का सामना नहीं कर सकें और अंत में उन्होंने अमुमति दे दी। अधिकारियों ने लड़की को छात्रावास में शामिल करने की बात बिना किसी शर्त के स्वीकार कर ली। उनकी सामाजिक सक्रियता यहां तब शुरू हुई जब उन्होंने हिंदू छात्रों के साथ कथित रूप से भेदभावपूर्ण व्यवहार का विरोध किया। 

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निजी जीवन

चंद्रप्रभा सैकियानी का निजी जीवन बहुत उथल-पुथल से भरा हुआ था। उन्होंने अपने माता-पिता द्वारा चुने गए एक बुजुर्ग व्यक्ति से शादी करने से इनकार कर दिया था। उन्होंने असमिया लेखक दंडीनाथ कलिता से सगाई कर ली थी। इस रिश्ते से सैकियानी शादी से पहले मां बन गई थी। कलिता के दूसरी महिला से शादी करने के बाद वह जीवन भर अकेली रही। बिना शादी के एक बेटे को जन्म देने और उसके पालन-पोषण में रूढ़िवादी समाज के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। उन्होंने लोगों की परवाह किए बगैर अपने बेटे काे पाला।

सामाजिक और राजनीतिक बदलाव लाने में अहम भूमिका

सैकियानी ने अपने करियर की शुरुआत नागांव के प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक के रूप में की थी। बाद में तेजपुर स्थित गर्ल्स एमई स्कूल की प्रधानाध्यापिका बनीं। तेजपुर में अपने प्रवास के दौरान वह ज्योतिप्रसाद अग्रवाल, ओमियो कुमार दास, चंद्रनाथ सरमा, लखीधर शर्मा जैसे दिग्गजों से जुड़ीं। 1918 में, असोम छात्र सम्मेलन के तेजपुर अधिवेशन की एकमात्र महिला प्रतिनिधि थीं। उन्होंने अफीम खाने के हानिकारक प्रभावों पर एक विशाल जनसमूह को संबोधित किया और इसके प्रतिबंध की मांग की। यह पहली घटना थी जहां एक असमिया महिला ने एक बड़ी सभा को संबोधित किया था।

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महात्मा गांधी से प्रभावित होकर वह 1921 में असहयोग आंदोलन में शामिल हो गईं। तेजपुर की महिलाओं के बीच संदेश फैलाने का काम किया। साल 1925 में वह असम साहित्य सभा के नगांव सत्र में एक वक्ता थीं। वहां उन्होंने उन महिलाओं को बुलाया जो एक अलग बाड़े में बैठी थीं। उन्होंने जाति-व्यवस्था के बंधन को तोड़ने के लिए काम किया। महिलाओं ने खुले क्षेत्र में आने के लिए उनके आह्वान पर ध्यान दिया। अपने गांव लौटकर, वह एक शिक्षक के रूप में कलजीरापारा स्कूल में शामिल हो गईं, लेकिन जब उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गुवाहाटी सत्र में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई, तो उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपनी सामाजिक सक्रियता को जारी रखा और 1926  में बाल विवाह, बहुविवाह, मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव के खिलाफ कार्रवाई की।

महिलाओं की शिक्षा और स्वरोजगार जैसे मुद्दों को उठाने के लिए असम प्रादेशिक महिला समिति की स्थापना की। गुवाहाटी के पास हयाग्रीव माधव मंदिर की शुरुआत की। जो जाति, लिंग और हर वर्ग के व्यक्ति के लिए खुला था। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए उन्हें जेल में डाल दिया गया। बाद में 1943 में, असहयोग आंदोलन में भाग लेने के दौरान उन्हें फिर से जेल में जाना पड़ा था। भारतीय स्वतंत्रता के बाद, वह सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गई थी। हालांकि कुछ समय बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में लौट आई थी। 1957 के असम विधान सभा चुनावों में भाग लिया लेकिन असफल रहीं। 

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लेखिका के तौर पर उपलब्धियां  

1918 में मात्र 17 साल की उम्र में एक स्थानीय पत्रिका, बही में सैकियानी की पहली कहानी प्रकाशित हुई थी। सैकियानी ने कई उपन्यास भी लिखे थे। पितृभिथा (द पैटरनल होम) (1937), सिपाही बिद्रोहाट (सिपाही विद्रोह), दिलीर सिंहासन (दिल्ली का सिंहासन) और कवि अनव घोष शामिल हैं। उन्होंने सात साल के लिए महिला समिति की असमिया पत्रिका ‘अभिजात्री’ के संपादक के रूप में कार्य किया था। 

चंद्रप्रभा सैकियानी समाज को बेहतर बनाने के लिए हमेशा काम करती रही। सामाजिक आंदोलन और राजनीति में शामिल होकर वह पितृसत्ता की व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करती रही। 13 मार्च 1972 में कैंसर से वह जीवन की लड़ाई हार गई और हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 2002 भारत सरकार ने उनकी मौत के बाद उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। उनकी याद में एक डाक टिकट भी जारी किया गया। गुहावटी में उनके नाम पर एक पॉलटेक्निक गर्ल्स स्कूल का नाम भी रखा गया।

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तस्वीर साभारः Assam Times

मेरा नाम हिना है और मैं 21 साल की हूं मैं दिल्ली के नॉर्थ ईस्ट इलाका सुंदर नगरी में रहती हूं। मैंने 2021 में अपनी ग्रेजुएशन पूरी की है। मेरी दिलचस्पी हमेशा से ही सामाजिक कामों में रही है जैसे किसी भी तरह से लोगों की मदद करना ,उनकी समस्याओं को सुनना ,उन्हें उनका समाधान बताना ,उस समाधान के लिए रास्ता बताना। क्योंकि मैं एक लड़की हूं तो मैं ये जानती हूं कि समाज में लिंग आधारित भेदभाव शुरू से ही चलता आ रहा है और ये मैने खुद ने भी सहा है। जब हम चीजों को खुद से देखते है और हमारे इर्द गिर्द हो रही सामाजिक क्रुतियों को महसूस कर पाते है तब समाज और जिंदगी का असली पहलू पता चलता है और इन्ही चीजों ने मुझे  प्रोत्साहित किया मीडिया की तरफ जाने के लिए और सामाजिक कार्यों से जुड़ने के लिए।

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