बेट्टी फ्रीडान
तस्वीर साभार: YouTube Screengrab
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“कौन जानता है कि महिला क्या हो सकती है जब वे आखिरकार स्वयं बनने के लिए स्वतंत्र होती हैं।” महिलाओं के पक्ष में इस तरह की सशक्त बातें कहने वाली अमेरिकी नारीवादी लेखक और कार्यकर्ता बेट्टी फ्रीडान अमेरिका के नारीवादी आंदोलन का एक अहम हिस्सा थीं। उनका योगदान अमेरिका के नारीवाद में बेहद अहम माना जाता है। महिलाओं पर केंद्रित उन्होनें एक किताब भी लिखी थी ‘द फेमिनिन मिस्टिक‘ जिसे लोगों ने खूब पसंद किया और बाद में यह किताब बेस्टसेलर भी बनी।

बेट्टी फ्रीडान का जन्म 4 फरवरी 1921 को अमेरिका के इलेनॉइस में हुआ था। साल 1942 में उन्होनें स्मिथ कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और फिर 1947 तक अलग-अलग नौकरियां भी कीं। हालांकि, शादी के बाद करीब 10 साल तक उन्होनें एक गृहणी और माँ के रूप में अपना जीवन व्यतीत किया। इस दौरान वह कुछ पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र रूप से काम भी कर रहीं थीं। बाद में अपने कॉलेज के एलुमुनाई समारोह के दौरान अपनी साथी सहपाठियों के निजी जीवन और उससे जुड़ी संतुष्टि को केंद्र में रखते हुए उन्होंने कुछ सवाल तैयार किए थे। उन सवालों के परिणामस्वरूप उन्हें यह मालूम चला कि वह अकेली महिला नहीं हैं जिन्हें इस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है बल्कि और भी लोग हैं जो अपने जीवन से असंतुष्ट हैं।

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लगातार पांच सालों तक महिलाओं से मिलने और बात करने के बाद बेट्टी फ्रीडान किसी निष्कर्ष पर पहुंची। उन्होंने उस दौर में महिलाओं की स्थिति को समझा और फिर साल 1963 में अपनी बहुचर्चित किताब ‘द फेमिनिन मिस्टिक’ लिखी। उनकी यह किताब उस दौर की महिलाओं की मानसिक यातनाओं की हकीकत थी।

बेट्टी ने इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए और भी गृहणियों के साक्षात्कार किए। उनसे मुख्य सवाल किए कि वे अपने निजी जीवन में कितनी संतुष्ट हैं। इन सवालों से उन्हें यह मालूम हुआ कि शादी, बच्चे, सुखी परिवार और हर तरह की भौतिकवादी सुविधाएं होने के बावजूद भी महिलाएं अपने जीवन से संतुष्ट नहीं हैं। तब उन्होंने समाज के उस धारणा को तोड़ने की ठानी जो यह कहती थी कि सच्ची स्त्रियां अपनी शादी, बच्चे, घरेलू काम और यौन संबंधों से परिपूर्ण हो जाती हैं। वह उस धारणा के खिलाफ खड़ी हुईं जो यह कहती थी कि स्त्रियों में बाहर जाकर पढ़ने, काम करने या राजनीतिक मुद्दों पर अपना पक्ष रखने की इच्छा व्यर्थ है। अपनी रिसर्च के माध्यम से बेट्टी फ्रीडान ने यह सिद्ध करना चाहती थीं कि महिलाएं असंतुष्ट हैं और अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर सकती हैं।

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बेट्टी फ्रीडान

इस क्षेत्र में लगातार पांच सालों तक महिलाओं से मिलने और बात करने के बाद बेट्टी फ्रीडान किसी निष्कर्ष पर पहुंची। उन्होंने उस दौर में महिलाओं की स्थिति को समझा और फिर साल 1963 में अपनी बहुचर्चित किताब ‘द फेमिनिन मिस्टिक’ लिखी। उनकी यह किताब उस दौर की महिलाओं की मानसिक यातनाओं की हकीकत थी। इस किताब में लिखी गई बातों से लोगों ने खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया और देखते ही देखते उनकी यह किताब बेस्टसेलर हो गई। इसके आलावा उन्होंने अन्य पुस्तकें भी लिखी जिनमें, ‘द सेकेंड स्टेज, इट चेंज माय लाइफ: राइटिंग ऑन विमेन मूवमेंट, ‘बियॉन्ड जेंडर’ और द फाउंटेन ऑफ एज एवं उनकी आत्मकथा, ‘लाइफ सो फार’ शामिल थीं।

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उनकी किताब से महिलाओं में जागरूकता आनी शुरू हुई और कई महिलाएं, महिला अधिकार आंदोलन का हिस्सा भी बनीं। इस किताब ने फ्रीडान को भी अपने शुरुआती नेतृत्व के लिए प्रेरित किया जिसके बाद उन्होंने पाउली मरे और ऐलीन हर्नांडेज़ से मिलकर महिलाओं के लिए ‘राष्ट्रीय संगठन’ की स्थापना की। बेट्टी फ्रीडान इस संगठन की पहली अध्यक्ष बनीं। उनके द्वारा स्थापित यह नारीवादी संस्था आज भी अमेरिका की प्रमुख नारीवादी संस्थाओं में से एक है। इस संस्था का प्रमुख नारा भी फ्रीडान ने ही दिया था “महिलाओं को पूर्ण रूप से लाने के लिए”। उन्होंने महिलाओं के पक्ष में कई तरह के मुद्दे उठाए जिनमें समान अधिकार संशोधन, अबॉर्शन, महिलाओं के लिए राजनीतिक और रोज़गार की समानता आदि।

द फेमिनिन मिस्टिक, तस्वीर साभार: द गार्डियन

बेट्टी फ्रीडान ने अपने नारीवाद के जरिये महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के मुद्दे पर बहुत ज़ोर दिया। वह चाहती थीं की महिलाएं अपना मूल्य जानें। वे घर संभालने से आगे बढ़कर बाहरी क्षेत्र में भी अपना नाम करें, कदम से कदम मिलाकर चलें और किसी भी रूप में पुरुषों से पीछे न हो।

साल 1971 में उन्होंने राष्ट्रीय महिला राजनीतिक कॉकस बनाने में सहायता की। उनका उद्देश्य यह था कि वह राजनीति में महिला उम्मीदवारों का सहयोग और समर्थन करें जिससे कि महिलाएं राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय रूप से आगे आ सकें। इसके अलावा फ्रीडान ने समलैंगिक अधिकारों के बारे में भी आवाज़ उठाई। हालांकि, उन्होंने इस ओर देर से ध्यान दिया लेकिन आगे चलकर क्वीयर अधिकारों भी महिलाओं के लिए हो रहे आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने अपने नारीवाद के जरिये महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के मुद्दे पर बहुत जोर दिया। वह चाहती थीं की महिलाएं अपना मूल्य जानें। वे घर संभालने से आगे बढ़कर बाहरी क्षेत्र में भी अपना नाम करें, कदम से कदम मिलाकर चलें और किसी भी रूप में पुरुषों से पीछे न हो। बेट्टी फ्रीडान की मृत्यु 4 फरवरी, 2006 को वाशिंगटन, डीसी में हुई थी।

अमेरिका के इतिहास में बेट्टी फ्रीडान उनके काम और नारीवाद का उनका नजरिया हमेशा रेफरेंस के रूप में इस्तेमाल होता रहेगा। उनके बाद भी उनकी बातें उनके किताब के ज़रिये लोगों तक पहुंच रही है। ‘द फेमिनिन मिस्टिक’ को बड़ी संख्या में महिलाओं ने पढ़ा और खुद को उससे जुड़ा हुआ पाया तथा इसको कई भाषा में अनुवादित भी किया गया है। यह नारीवाद और महिला अध्ययन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। फ्राइडन हमेशा यह कहती थीं, “चाहे कोई कुछ भी कहे मगर मैं ये मानती हूं कि औरतें हर वह काम कर सकती हैं जो एक मर्द कर सकता है चाहे वह कोई भी काम क्यों न हो।”

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तस्वीर साभार: YouTube Screengrab

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