वैसे तो पितृसत्ता की जड़ें सदियों पुरानी हैं लेकिन दास प्रथा से लेकर वर्ग विभाजन तक की पहली भोक्ता बन चुकी स्त्रियों ने अपने शोषण को पहचानते हुए विरोध शुरू कर दिया था। 19वीं सदी का उत्तरार्ध और बीसवीं सदी का प्रारंभ आते-आते विरोध की ऐसी ही एक लहर अमेरिका में शुरू हुई, जिसे नारीवाद की पहली लहर (फर्स्ट वेव ऑफ फेमिनिज़म) कहा जाता है। औपचारिक रूप से इसकी शुरुआत अमेरिका में सेनेका फॉल्स कन्वेंशन से हुई थी। इस दौरान महिलाओं की समानता के लिए करीब 300 महिलाओं और पुरुषों ने रैली निकाली थी। इस दौरान अमेरिका में शहरी औद्योगिक उदारवादी और समाजवादी राजनीति का माहौल था। फर्स्ट वेव ऑफ फेमिनिज़म के केंद्र में समान अवसर की मांग के साथ कानूनी असमानताओं को समाप्त करना, ख़ासकर वोट का अधिकार पाना था। नारीवाद की पहली लहर को इस मामले में सफलता भी मिली। साल 1920 में अमेरिका ने अपने संविधान में 19वां संशोधन करते हुए महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया। हालांकि, नारीवाद का पहला चरण अधिकतर श्वेत महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने तक ही सीमित रहा था।
दिलचस्प बात यह है कि फर्स्ट वेव ऑफ फेमिनिज़म के दौरान किसी को पता ही नहीं था कि कोई ‘वेव’ भी चल रहा है। ‘फर्स्ट वेव’ शब्द पहली बार 1968 में यानि दूसरे चरण के दौरान न्यू यॉर्क टाइम्स की एक पत्रकार मार्था लेयर द्वारा उनके एक लेख ‘ द सेकंड फेमिनिस्ट वेव: व्हाट डू वीमेन वॉन्ट’ में गढ़ा गया। पहली बार स्थापित पितृसत्ता के खिलाफ़ आधुनिक नारीवादी आंदोलन की बुलंद आवाज़ बनी थीं, क्रिस्टीन दी पिज़ान (1434), मैरी वॉल्सटॉनक्राफ्ट (1797), जेन ऑस्टेन (1817) को ‘फोरमदर्स’ (Fore mothers) कहा जाता है। इसके अवाला सांस्थानिक और ढांचागत शोषण के खिलाफ विद्रोह छेड़ने वालों में सुसान बी एंथोनी (1820- 1906), एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन (1815- 1902), लूसी स्टोन (1818-1893), ओलम्पिया ब्राउन, फ्रांसिस विलार्ड (1839- 1898) और वर्जिनिया वुल्फ़ का नाम महत्वपूर्ण है। आज हम ऐसी ही पांच विद्रोही महिलाओं के जीवन और काम से परिचित होंगे जिन्होंने नारीवाद की पहली लहर को दिशा दी।
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1. वर्जिनिया वुल्फ़

“ज़िन्दगी से मुंह मोड़कर आपको शांति नहीं मिल सकती।” विडम्बना देखिए कि ये शब्द उस मशहूर नारीवादी लेखिका के हैं जिसने खुद ‘शांति’ के लिए अपनी ज़िन्दगी से मुंह मोड़ लिया था, जिसे आखिरी बार एक नदी के किनारे अपने ओवरकोट की जेब में पत्थरों को भरते देखा गया था। इसके 20 दिन बाद एक मृत शरीर मिला और घर से पति के नाम लिखा एक पत्र मिला जिसने पूरी दुनिया को रुला दिया। इस पत्र को लिखा था दुनिया में अपने नारीवादी रुख और बेहतरीन लेखन के लिए मशहूर हुईं वर्जिनिया वुल्फ़ ने। 25 जनवरी 1882 में लंदन के मशहूर इतिहासकार और लेखक सर लेस्ली स्टीफन और जूलिया स्टीफन के घर में पैदा हुईं वर्जिनिया ने उपन्यास, बायोग्राफी, शार्ट स्टोरी ड्रामा आदि कई विधाओं में लिखा। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि सबसे ज्यादा चर्चा उनके सुसाइड नोट की हुई।
13 साल की उम्र में मां और 22 साल की उम्र में पिता को खो देनेवाली वर्जीनिया ने जीवन में बहुत अवसाद देखे थे। बचपन में अपने ही सौतेले भाइयों द्वारा प्रताड़ना का सामना करनेवाली वर्जीनिया का मानसिक स्वास्थ्य ताउम्र सही नहीं रहा। बावजूद इसके वर्जीनिया की लेखनी ने नारीवादी आन्दोलन को दिशा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘मिसेज डॉलवे’ और ‘द लाइट हाउस’ जैसी रचनाएं आज भी मील के पत्थर हैं। ‘अ रूम ऑफ वन्स ओन’ ने तो दुनियाभर में खलबली ही मचा दी थी। इस किताब में एक लेस्बियन औरत का भी जिक्र है। वह कहती हैं, ‘ऐसा भी हो सकता है कि एक औरत दूसरी औरत के प्रति आकर्षित हो जाए’ वर्जिनिया ने अपनी इसी किताब में आरोप लगाया था कि‘लेखन से दूर रखने की साजिश के तहत ही औरतों को निजी धन और एक निजी स्थान से हमेशा दूर रखा गया। अगर ये दोनों चीजें अगर औरतें हासिल कर लेती हैं, तो वे लेखन की दुनिया में मजबूत कदम रखेंगी।’
2. फ्रांसिस विलार्ड

महिलाओं के अधिकारों के लिए ताउम्र आवाज़ उठाने वाली फ्रांसिस विलार्ड एक प्रभावशाली नेत्री थीं। उनका जन्म 28 सितंबर, 1839 को न्यूयॉर्क में हुआ था। फ्रांसिस विलार्ड की मां मैरी थॉम्पसन हिल विलार्ड ओबर्लिन कॉलेज में पढ़ी थीं। यह उस वक्त के लिए बहुत बड़ी बात थी। फ्रांसिस के पिता भी अच्छी नौकरी में थे। फ्रांसिस विलार्ड ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद लगभग 10 वर्षों तक विभिन्न संस्थानों में पढ़ाया था। बाद में वह नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय में महिलाओं की पहली डीन भी बनीं। इसके बाद फ्रांसिस ने 1879 से 1898 तक महिला क्रिश्चियन टेम्परेंस यूनियन का नेतृत्व किया था। साथ ही महिला मताधिकार के लिए कई व्याख्यान दिए जिसने नारीवादी आंदोलन को दिशा देने का काम किया। फ्रांसिस विलार्ड का निधन 17 फरवरी, 1898 को न्यूयॉर्क शहर में ही हुआ था।
3. लुसी स्टोन

लुसी स्टोन का जन्म 13 अगस्त, 1818 को अमेरिका के ग्रामीण मैसाचुसेट्स में हुआ था। यह स्टोन फ्रांसिस और हैना मैथ्यू स्टोन के नौ बच्चों में से एक थी। माता-पिता किसान थे और दादा अमेरिकी क्रांति में एक देशभक्त कप्तान। लुसी स्टोन कॉलेज की डिग्री हासिल करने वाली पहली मैसाचुसेट्स महिला थीं। पहले तो स्टोन शादी के खिलाफ थी, लेकिन बाद में उन्होंने एक व्यवसायी हेनरी ब्लैकवेल से शादी कर ली। हालांकि, शादी के बाद भी उन्होंने अपने अपने पति का सरनेम अपने नाम के साथ नहीं लगाया। उनका कहना था, “मेरा नाम मेरी पहचान है।” ये उस वक्त एक क्रांतिकारी कदम था। हेनरी दास-विरोधी और महिला अधिकारों के समर्थक थे। लुसी स्टोन ने 1850 में राष्ट्रीय महिला अधिकार सम्मेलन आयोजित करने में मदद की थी और कई अन्य महिला अधिकार सम्मेलनों के आयोजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लुसी स्टोन की मृत्यु 18 अक्टूबर 1893 को कैंसर से बोस्टन शहर में हुआ। अपनी बेटी के लिए उनके अंतिम शब्द थे “दुनिया को बेहतर बनाओ।”
4. मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट

लैंगिक समानता और लैंगिक न्याय पर बात करने वाली मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट पहली महिला विचारकों में एक थी। मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट का जन्म 27 अप्रैल 1759 को स्पिटलफ़ील्ड्स, लंदन में हुआ था। माँ एलिजाबेथ डिक्सन और एडवर्ड जॉन वोलस्टोनक्राफ्ट के सात बच्चों में मैरी दूसरे स्थान पर थी ।उनके पिता एडवर्ड जॉन वोलस्टोनक्राफ्ट किसान पृष्ठभूमि से आते थे। महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना मैरी का प्रमुख उद्देश्य था। साल 1792 में मैरी वोल्स्टोनक्राफ्ट की पुस्तक “ए विंडीकेशन ऑफ़ द राइट्स ऑफ वूमेन” आई। अपनी किताब में मैरी ने महिलाओं को उनके अधिकार से वंचित रखने पर सवाल उठाया और पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अधिकारों की मांग की। यह किताब महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने में श्रेष्ठ साबित हुई। मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट का कहना था कि यदि महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर प्राप्त होंगे तो राजनीतिक जीवन और सामाजिक जीवन में से लैंगिक भेदभाव समाप्त किया जा सकता है।
5. सुज़ैन बी एंथोनी

सुज़ैन बी एंथोनी एक अमेरिकी समाज सुधारक और महिला अधिकार कार्यकर्ता थीं। इनका जन्म 15 फरवरी 1820 को मैसाचुसेट्स में हुआ था। जब सुज़ैन 6 साल की थी तब उनका परिवार न्यूयॉर्क चला गया था। उनके पिता डैनियल किसान और फिर एक कपास मील के मालिक थे। सुज़ैन ने मात्र 17 साल की उम्र में गुलामी-विरोधी याचिकाएं एकत्रित कीं। 1856 में, वह अमेरिकी एंटी-स्लेवरी सोसायटी के लिए न्यूयॉर्क राज्य की एजेंट बन गई। जब महिलाओं के पास वोट देने का अधिकार नहीं था, तब उन्होंने सन् 1872 के राष्ट्रपति के चुनाव में वोट डालकर विरोध प्रकट किया। उन्हें कानून का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह कहती थी, “मैंने तो केवल नागरिक होने के नाते अपने अधिकार का प्रयोग किया है। यह अधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका के हर नागरिक को उसके राष्ट्रीय संविधान ने प्रदान किया है, जिसे नकारने का अधिकार किसी राज्य को नहीं है।”
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About the author(s)
My name is Shweta. I am from Delhi. I studied Journalism at Jamia Millia Islamia and currently pursuing a PhD in Diaspora Studies. I am interested in writing and reporting on issues related to women and marginalized communities.

