कस्तूरबा गांधीः दृढ़ इच्छाशक्तियों के व्यक्तिव वाली एक स्वतंत्रता सेनानी| #IndianWomenInHistory
कस्तूरबा गांधीः दृढ़ इच्छाशक्तियों के व्यक्तिव वाली एक स्वतंत्रता सेनानी| #IndianWomenInHistory
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भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली एक स्वतंत्रता सेनानी थीं कस्तूरबा गांधी। अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठानेवाली कस्तूरबा जब तक ज़िंदा रहीं, एक के एक बाद आंदोलनों और सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेती रहीं। उनके बारे में मौजूद सारी जानकारियां उनकी इच्छाशक्ति और धैर्य के साथ एक सशक्त महिला की छवि को दिखाती हैं। उन्हें सब लोग प्यार से ‘बा’ पुकारते थे।   

शुरुआती जीवन

कस्तूरबा गोकुलदास कपाड़िया का जन्म 11 अप्रैल 1869 में काठियावाड़ के पोरबंदर नगर में हुआ था। उनके पिता का नाम गोकुल दास माखनजी था। उनके पिता एक कपड़ा व्यापारी थे। उनकी माँ का नाम वेराज कुंवर बा था। उनके दो भाई थे। कस्तूरबा का बचपन एक समृद्ध परिवार में बीता था। कस्तूरबा के पिता की करमचंद्र गांधी से अच्छी दोस्ती थी। दोनों ने मिलकर तय किया था कि कस्तूरबा की सगाई करमचंद्र के बेटे मोहनदास से हो जाए। उस समय छोटी उम्र में शादी होना आम बात थी। कस्तूरबा और करमचंद दोंनो की उम्र में छह महीने का फासला था। कस्तूरबा मोहनदास से छह महीने बड़ी थीं।

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अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठानेवाली कस्तूरबा एक के एक बाद आंदोलनों और सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेती रहीं। उनके बारे में मौजूद सारी जानकारियां उनकी इच्छाशक्ति और धैर्य के साथ एक सशक्त महिला की छवि को दिखाती हैं।

दोंनो के परिवारों ने मिलकर सात साल की उम्र में उनकी सगाई कर दी। साल 1882 में जब दोंनो की उम्र तेरह साल हुई तब उनकी शादी कर दी गई। शादी के बाद वह पति के घर राजकोट रहने चली आई। शादी के शुरुआती समय में उनके पति गांधी, कस्तूरबा को नियंत्रित करना चाहते थे। वह चाहते थे कि कस्तूरबा उनकी पसंद के अनुसार रहे मगर गांधी के प्रयासों का कोई फल नहीं निकला।

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इतिहासकार विनय लाल लिखते हैं, “कस्तूरबा ने कभी भी अपने पति की इच्छाओं को आसानी से स्वीकार नहीं किया। गांधी की आत्मकथा में उनके फैसले लेने की स्वतंत्रता और दृढ़ता के परिणाम भी देखने को मिलते हैं। जब शादी के पहले दो दशकों में उन्होंने, उन्हें अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश की तो उनके साथ उनकी तीखी असहमति थी।”

तस्वीर साभार: News 18

शादी से पहले कस्तूरबा ने कोई स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। मोहनदास ने खुद उन्हें प्रारंभिक शिक्षा देना तय किया। कस्तूरबा बहुत ही जिज्ञासु और चीजों को जल्दी सीखती थीं। गांधी ने खुद स्वीकारा है कि उनकी पत्नी में उनसे ज्यादा व्यावहारिक समझ थी। वह लोगों को उनसे ज्यादा समझ लेती थी। कस्तूरबा के चार बेटे थे। साल 1888 में उनके बड़े बेटे हरिलाल का जन्म हुआ था। इसी साल उनके पति कानून की पढ़ाई के लिए पहली बार विदेश गए थे वह भारत में ही रह गई थीं। मोहनदास 1893 में वकालत की प्रैक्टिस के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गए थे। 1896 वह अपने दो बेटों के साथ दक्षिण अफ्रीका में रहने चली गई थी। 1901 में वह अपने परिवार के साथ अफ्रीका से वापस आ गए थे। 

कस्तूरबा की हिम्मत और प्रोत्साहन एक पूरी मिसाल थी। वह हर कदम पर महात्मा गांधी के लिए एक हौसला बनीं। दक्षिण अफ्रीका हो या भारत न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए कस्तूरबा हमेशा उनके साथ मजबूती से बनी रहीं। कस्तूरबा गांधी ट्रांसवाल, दक्षिण अफ्रीका में गांधी द्वारा आयोजित अहिंसात्मक प्रदर्शन में शामिल होनेवाली पहली प्रदर्शनकारी में से एक थीं। यह प्रदर्शन दक्षिण अफ्रीका के ट्रांसवाल में औपनिवेशिक सरकार की सभी गैर-ईसाई शादियों को अवैध घोषित करने के फैसले के बाद किया गया था।   

इतिहासकार विनय लाल लिखते हैं, “कस्तूरबा ने कभी भी अपने पति की इच्छाओं को आसानी से स्वीकार नहीं किया। गांधी की आत्मकथा में उनके फैसले लेने की स्वतंत्रता और दृढ़ता के परिणाम भी देखने को मिलते हैं। जब शादी के पहले दो दशकों में उन्होंने, उन्हें अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश की तो उनके साथ उनकी तीखी असहमति थी।”

सामाजिक आंदोलन में सक्रियता

कस्तूरबा की सामाजिक आंदोलन और राजनीति में जुड़ने की शुरुआत दक्षिण अफ्रीका से हो गई थी। साल 1904 में उन्होंने डरबन के नज़दीक फीनिक्स सेटेलमेंट स्थापित करने में मदद की थी। 1913 में दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के साथ गलत व्यवहार के खिलाफ होने वाले प्रदर्शन में हिस्सा लिया जिसके लिए 23 सितंबर 1913 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। उन्हें तीन महीने के कड़े परिश्रम की सजा सुनाई गई थी। जेल में रहते हुए उन्होंने शिक्षित महिलाओं को अन्य अशिक्षित महिलाओं को पढ़ने और लिखने के लिए प्रेरित किया। 

कस्तूरबा और गांधी ने अपने परिवार के साथ साल 1914 में भारत लौटने के लिए दक्षिण अफ्रीका छोड़ा। 9 जनवरी 1915 में भारत वापिस आने से पहले इंग्लैंड की यात्रा की। भारत लौटने के बाद उनकी सामाजिक आंदोलनों में सक्रियता बहुत ज्यादा बढ़ गई। हालांकि, दक्षिण अफ्रीका में ही उन्हें स्वास्थ्य से जुड़ी बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। मगर दृढ़ इच्छाशक्ति वाली कस्तूरबा की विरोध-प्रदर्शनों में भागीदारी बढ़ गई थी।

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कस्तूरबा पैदल या बैलगाड़ी से गांव-गांव जाकर लोगों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए सजग करती थी। वह महिलाओं को भी धरने-प्रदर्शन में शामिल होने के लिए कहती थी। उन्होंने महिलाओं को शराब की दुकान के सामने धरना देने, कताई करने और खादी पहनने का आग्रह किया।

सत्याग्रही कस्तूरबा 

वह लगातार सत्याग्रह में भाग ले रही थीं। 1917 में जब गांधी चंपारण में नील के किसानों के साथ काम कर रहे थे उसी समय कस्तूरबा महिलाओं के कल्याण के लिए अनुशासन, स्वास्थ्य, सफाई और लिखाई-पढ़ाई के लिए काम कर रही थी। साल 1922 में खराब स्वास्थ्य होने के बावजूद उन्होंने गुजरात के बोरसाड सत्याग्रह में भाग लिया। हालांकि, उन्होंने 1930 के ‘नमक आंदोलन’ में हिस्सा नहीं लिया था। इससे अलग वह लगातार आंदोलन और विरोध- प्रदर्शनों से जुड़ी रही। इसी वजह से उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और जेल में डाला गया। 1939 में राजकोट की महिलाओं ने ब्रिट्रिश शासन के खिलाफ आंदोलन किया। उनको गिरफ्तार कर एक महीने का एकांत कारावास की सजा मिली।   

कस्तूरबा ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन,’ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ और अन्य आंदोलनों मे फ्रंट-लाइनर थीं। जब गांधी को हिरासत में लिया गया तो वह अक्सर आंदोलनों में नेतृत्व की भूमिका में आ जाती थीं। अपर्णा बसु लिखती हैं कि उन्होंने एक बार ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में बड़ी भीड़ को संबोधित भी किया था। उन्होंने लंबे समय तक साबरमती आश्रम को चलाया।  

कस्तूरबा पैदल या बैलगाड़ी से गांव-गांव जाकर लोगों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए सजग करती थीं। वह महिलाओं को भी धरने-प्रदर्शन में शामिल होने के लिए कहती थीं। उन्होंने महिलाओं को शराब की दुकान के सामने धरना देने, कताई करने और खादी पहनने का आग्रह किया। कस्तूरबा उस समय देश में खादी का चेहरा बनीं। वह स्वदेशी श्रमिकों को उनके देश और मातृभूमि के लिए उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित किया करती थीं।

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तस्वीर साभार: HT

कस्तूरबा एक पत्नी के रूप में

कस्तूरबा अपने पूरे जीवन में महात्मा गांधी के साथ खड़ी रहीं। उन्होंने गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया। उन्होंने अपने घर के दरवाज़े पूरे देश और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए खोल दिए थे। जब गांधी जेल में थे और उन्होंने उपवास रखा। कस्तूरबा उन चीजों को छोड़ने से नहीं हिचकी जो उन्हें बहुत पसंद थीं। उन्होंने अपने गहने, अच्छा खाना और अपने धार्मिक लाभ तक त्याग दिए थे।

कस्तूरबा गांधी को श्रद्धाजंलि देते हुए गांधी ने कहा था, “हर स्थिति में वह मेरे से आगे खड़ी थी। उसने मुझे जगाए रखने और मेरी इच्छाएं पूरी करने में मेरी मदद की। वह मेरे सभी राजनीतिक झगड़ों में मेरे साथ खड़ी रहीं और कभी भी कदम उठाने में नहीं हिचकी। हालांकि, आज के शब्दों के अनुसार वह अशिक्षित थी लेकिन मेरे अनुसार वह सच्ची शिक्षा की आदर्श थी।” 

अंतिम विदाई

‘भारत छोड़ाे आंदोलन’ में हिस्सा लेने के लिए अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ उन्हें भी गिरफ्तार किया गया। उन्हें पुणे के आग़ा ख़ान पैलेस में कैद किया गया। उस समय तक उनकी सेहत पूरी तरह खराब हो गई थी। कैद में बंद कस्तूरबा गांधी को जब लगा की उनका अंतिम समय नजदीक है उन्होंने उसी कैंप में बंद महात्मा गांधी से मिलने की इच्छा जताई। 22 फरवरी 1944 में उन्होंने महात्मा गांधी की गोद में आखिरी सांस ली और इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 

अपनी मौत से पहले उन्होंने कहा था, “मेरी मौत पर शोक मत मनाना। यह आनंद का अवसर होना चाहिए।” 23 फरवरी 1944 को आगा ख़ान पैलेस में उनका अंतिम संस्कार किया गया था। महात्मा गांधी चिंता की जब तक आग नहीं बुझी थी तब तक वहीं बैठे रहे थे। इंडिया टुडे में प्रकाशित लेख अनुसार जब किसी ने बीच में महात्मा गांधी से चलने को कहा था तो उन्होंने जवाब दिया था, “यह साझा जीवन जीने के 62 साल की अंतिम विदाई है। मुझे दाह संस्कार समाप्त होने के अंतिम समय तक यही रहने दो।” 

कुछ समय बाद कस्तूरबा गांधी को श्रद्धाजंलि देते हुए गांधी ने कहा था, “हर स्थिति में वह मेरे से आगे खड़ी थी। उसने मुझे जगाए रखने और मेरी इच्छाएं पूरी करने में मेरी मदद की। वह मेरे सभी राजनीतिक झगड़ों में मेरे साथ खड़ी रहीं और कभी भी कदम उठाने में नहीं हिचकी। हालांकि, आज के शब्दों के अनुसार वह अशिक्षित थी लेकिन मेरे अनुसार वह सच्ची शिक्षा की आदर्श थी।”

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तस्वीर साभारः Hindustan Times

स्रोतः

  1. Wikipedia
  2. Britannica.com
  3. Mkgandhi.org
  4. Quint
  5. India Today

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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