नारीवाद लिपस्टिक फेमिनिज़म: क्या इसे नारी मुक्ति या सशक्तिकरण के रूप में देखा जाना चाहिए? 

लिपस्टिक फेमिनिज़म: क्या इसे नारी मुक्ति या सशक्तिकरण के रूप में देखा जाना चाहिए? 

पितृसत्ता अपने चंगुल से किसी को आसानी नहीं निकलने देती और वह कोई न कोई नियंत्रण का रास्ता खोज लेती है जैसा कि हम पितृसत्ता के नए चेहरे के रूप नवउदारवादी उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाव को नारीवाद पर देखते हैं जिसे 'लिपस्टिक नारीवाद' के नाम से जाना गया, जिसने 'माई बॉडी माई चॉइस' के मुद्दे को नए रूप में परिभाषित किया।

अमेरिका में हुए पहली और दूसरी लहर के नारीवादी आंदोलन ने विश्व भर में महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बड़े पैमाने पर इन नारीवादियों की कोशिशों से दुनियाभर में नारीवादी आंदोलन ज़ोर पकड़ने लगा और महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर आवाज़ उठाने लगीं। नारीवादी आंदोलन की पहली धारा में जहां महिलाओं को नागरिक के रूप में ‘वोट देने के अधिकार’ दिलाने के साथ ही विवाह और संपत्ति से जुड़े अधिकार मिले।

वहीं, दूसरी धारा (1960 के बाद) के नारीवादी आंदोलन में पितृसत्तात्मक पुरूष प्रभुत्व वाले समाज में, संस्थागत और सांस्कृतिक रूप से लैंगिकता के आधार पर हो रहे शोषण और भेदभाव जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया। महिलाओं के संदर्भ में ‘सेक्सिस्ट’ अवधारणा पर सवाल करते हुए पहली नारीवादी आंदोलन की लहर, दूसरी में ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ की धारणा के जरिए पारिवारिक संबंधों में मौजूद पितृसत्तात्मक राजनीति पर सवाल खड़े करती नज़र आती है। नारीवाद के दूसरे चरण का अंत आमतौर पर 1980 के दशक को माना जाता है।

1980 के बाद के दौर में नारीवादियों के बीच अलग-अलग मुददों पर असहमतियों के कारण ‘लैंगिकता और पोर्नोग्राफी’ जैसे मसलों पर नवीन विचारों और विभिन्न रायों से 1990 में नारीवादी आंदोलन की तीसरी धारा की शुरुआत हुई। रेबेका वॉल्कर जो एक अमेरिकी लेखक और नारीवादी थीं, उनके द्वारा मिस मैगज़ीन में लिखे एक लेख ‘Becoming the Third Wave(1992) में “I am not a Post Feminism Feminist. I am the Third Wave” वाक्य से थर्ड वेव फेमिनिज़्म की घोषणा मानी जाती है। जो अनीता हिल के यौन उत्पीड़न के मुद्दे से सुर्खियों में आया।

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पितृसत्ता अपने चंगुल से किसी को आसानी नहीं निकलने देती और वह कोई न कोई नियंत्रण का रास्ता खोज लेती है जैसा कि हम पितृसत्ता के नए चेहरे के रूप नवउदारवादी उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाव को नारीवाद पर देखते हैं जिसे ‘लिपस्टिक नारीवाद’ के नाम से जाना गया, जिसने ‘माई बॉडी माई चॉइस’ के मुद्दे को नए रूप में परिभाषित किया।

नारीवादी आंदोलन की तीसरी लहर में ‘माई बॉडी माई चॉइस’ मुख्य मुददों में से एक था। ये मुद्दे जो अवैध गर्भसमापन के विरोध में शुरू हुए थे जिसके अंतर्गत महिलाओं ने ये मांग रखी कि ये उनका अपना शरीर है बच्चे को जन्म देना है या नहीं ये उनका निर्णय होना चाहिए। अवैध गर्भपात और गर्भनिरोधक गोलियों के कारण महिलाओं के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लेकिन जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि पितृसत्ता अपने चंगुल से किसी को आसानी नहीं निकलने देती और वह कोई न कोई नियंत्रण का रास्ता खोज लेती है जैसा कि हम पितृसत्ता के नए चेहरे के रूप नवउदारवादी उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाव को नारीवाद पर देखते हैं जिसे ‘लिपस्टिक नारीवाद’ के नाम से जाना गया, जिसने ‘माई बॉडी माई चॉइस’ के मुद्दे को नए रूप में परिभाषित किया।

‘लिपस्टिक नारीवाद’ महिला सशक्तिकरण में महिला यौन शक्ति के साथ स्त्रीत्व यानी फेमिनिटी की पारंपरिक अवधारणाओं को साथ लेकर चलता है। इन नारीवादियों का मानना है कि मेकअप और सेक्सी कपड़े पहनने से आप किसी नारीवादी से कम नहीं हो जाते। इनका मानना है कि सौन्दर्यशास्त्र के दार्शनिक विचारों को अपनाते हुए कॉस्मेटिक मेकअप, कामुक आकर्षक कपड़े पहनकर मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से महिला को सशक्त बनाया जा सकता। लेकिन क्या इसे नारी मुक्ति या सशक्तिकरण के रूप में देखा जाना चाहिए? 

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Chimamanda Ngozi Adichie का मानना है कि कामुक-आकर्षक कपड़े पहनने,कॉस्मेटिक मेकअप करने और नारीवादी मूल्यों को धारण करने के बीच कोई संघर्ष नहीं होना चाहिए। ये महिलाएं अधिक सुंदर,अधिक सेक्सी दिखने को आत्मविश्वास और सफलता के रूप में देखती हैं। इस धारा की नारीवादियों का कहना है कि नारीवाद की दूसरी धारा के दौरान नारीवादियों ने पूरी तरह से महिलाओं की कानूनी और सामाजिक समानता पर ध्यान केंद्रित किया था और सेक्सुअलिटी को अपनाने से इनकार कर दिया। कुछ तो पुरुषों के विचार से भी घृणा करते थे और अक्सर उन शारीरिक विशेषताओं और व्यक्तित्व को अपना लेते थे जो स्त्रीत्व (फेमिनिटी) की परिभाषिक अवधारणा के दायरे में नहीं आती थीं। जबकि उनके अनुसार इन्हें अपनाकर भी नारीवादी हुआ जा सकता था।

लिपस्टिक नारीवाद ग्लैमरस व्यक्तित्व की उपलब्धि को महिला सशक्तिकरण और सफलता की कुंजी के रूप में देखता है जो कि केवल नवउदारवादी उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा देता है और एक पूरे राजनीतिक नारी मुक्ति आंदोलन को कमज़ोर करने का काम करता है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बढ़ावा देने और महिला शरीर का वस्तुकरण करने के लिए लिपस्टिक नारीवाद की आलोचना की जाती है, विशेष रूप से मीडिया यानी विभिन्न विज्ञापनों, धारावाहिकों और सिनेमा में किस तरह महिलाओं को ‘सेक्सुअल ऑब्जेक्ट’ के रूप में दिखाया गया है।

द आफ्टरमैथ ऑफ फेमिनिज़म‘ में एंजेला मैक रॉबी ने वर्तमान सांस्कृतिक ताकतों के महिलाओं पर पड़ते प्रभाव के प्रति चिंता व्यक्त की। उन्होंने नवउदारवादी उपभोक्ता संस्कृति के कारण होने वाले परिवर्तनों और महिलाओं पर होने वाले उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा कि उपभोक्तावादी संस्कृति नारीवाद को खत्म करने का काम कर रही है। यह उन महिलाओं में गलतफहमी पैदा करती है कि वे इसके (उपभोक्तावादी संस्कृति) फायदों से अधिक सफल और स्वतंत्र हैं जबकि यह उन्हें उसी पितृसत्तात्मक सामाजिक जेंडर की परिभाषिक सरंचना में वापिस ले जाने का काम करती है।

लिपस्टिक नारीवाद का असली खतरा मेकअप के तरीके, उसके पहनावे आदि पर नहीं है, बल्कि नवउदारवाद के साथ उसकी मिलीभगत है। वक्त के साथ-साथ परिवर्तन एक स्वभाविक क्रिया रही है और ये परिवर्तन हरेक युग में अपने पिछले युग से कुछ क्रांतिकारी बदलाव के साथ होता रहा है, फिर चाहे वह संज्ञानात्मक क्रांति (जानवर से मनुष्य बनने की समझ) रही हो, कृषि क्रांति हो या वैज्ञानिक क्रांति। लेकिन पितृसत्तात्मक मानसिकता हर युग में कुछ परिवर्तन के साथ मौजूद रही है। आज हम इन्हें नए नवउदारवादी उपभोक्ता संस्कृति के रूप में देख सकते हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से अपना नियंत्रण बनाए रखे हुए है। नारीवादी आंदोलन के संघर्ष के लगभग दो सौ वर्ष से अधिक हो चुके हैं लेकिन आज भी समानता और अधिकारों की लड़ाई जारी है।

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तस्वीर : सुश्रीता बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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