क्लारा जेटकिनः जर्मनी की एक सशक्त आवाज़ और मार्क्सवादी कार्यकर्ता
तस्वीर साभारः Wikipedia
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हर साल आठ मार्च को महिलाओं की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों के जश्न के तौर पर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। एक सदी से ज्यादा वक्त से यह दिन मनाया जा रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह दिवस मनाने की पेशकश किसने की थी और क्या आप जानते हैं कि इस दिवस की जड़ें नारीवादी आंदोलन के बजाय श्रम आंदोलन में निहित हैं। जर्मन मार्क्सवादी चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता क्लारा जेटकिन के प्रस्ताव के बाद से साल 1911 में पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। क्लारा जेटकिन को ‘ग्रैंडमदर ऑफ जर्मन क्मयूनिज़म’ भी कहा जाता हैं।

क्लारा जेटकिन का जन्म 15 जुलाई 1857 को जर्मनी के सैक्ससोनी प्रांत के केमनिट्ज के पास विडेरौ में हुआ था। इनके पिता का नाम गॉटफ्राइड आइजनर था। वह एक स्कूल मास्टर और चर्च आर्गेनिस्ट थे। इनकी माँ का नाम जोसेफिन विटाले था। वह मूल रूप से फ्रांस से थीं। इनकी माँ बहुत पढ़ी-लिखी महिला थीं। क्लारा अपने माता-पिता की तीन संतानों में सबसे बड़ी थीं। साल 1872 में इनका परिवार लीपजिंग चला गया था। वहां इनकी स्कूली शिक्षा ‘लीपजिंग टीचर्स कॉलेज फॉर वीमंस’ में हुई थी। स्कूल के समय ही 1874 में इनका जुड़ाव जर्मनी के महिला और मजदूर आंदोलनों से हुआ।

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साल 1878 में क्लारा जेटकिन सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी से जुड़ी। इस पार्टी का बाद में नाम ‘सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी’ हुआ। 1878 में जर्मनी में बिस्मार्क के द्वारा समाजवादी गतिविधियों पर रोक लगाई हुई थी। 1882 में जेटकिन ज्यूरिख चली गई। इसके बाद वह पेरिस गई। जहां उन्होंने पत्रकारिता और अनुवादक की पढ़ाई की थी। पेरिस में प्रवास के दौरान उन्होंने ‘सोशलिस्ट इंटरनेशनल ग्रुप’ की स्थापना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उसके बाद उन्होंने अपने प्रेमी ओसिप जेटकिन का नाम अपना लिया। इन दोनो के दो पुत्र थे, जिनके नाम मैक्सिम और कॉन्स्टेंटिन थे। 1889 की शुरुआत में ओसिप जेटकिन गंभीर रूप से बीमार हो गए और उसी साल जून में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद जेटकिन अपने बच्चों के साथ स्टटगार्ट चली गई। वहां उन्होंने दूसरी शादी कलाकार जॉर्ज फ्रेडरिक जुंडेल से की थी।

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क्या आप जानते हैं कि यह दिवस मनाने की पेशकश किसने की थी और क्या आप जानते हैं कि इस दिवस की जड़ें नारीवादी आंदोलन के बजाय श्रम आंदोलन में निहित हैं। जर्मन मार्क्सवादी चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता क्लारा जेटकिन के प्रस्ताव के बाद से साल 1911 में पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। क्लारा जेटकिन को ‘ग्रैंडमदर ऑफ जर्मन क्मयूनिज़म’ भी कहा जाता हैं।

जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़ाव

जेटकीन की राजनीति में बहुत गहरी रूचि थी। क्लारा जेटकिन का राजनीतिक करियर सक्रिय तौर पर ओसिप जेटकिन से मिलने के बाद शुरू हुआ था। दोनों की शादी के बाद क्लारा ने शुरुआत में सोशलिस्ट पार्टी की कुछ मीटिंग में हिस्सा लिया। उन्होंने मार्क्सवादी विचारों के तहत महिलाओं की मुक्ति और समाज में सुधार के लिए अपना जीवन समर्पित करने का फैसला लिया। एसडीपी में जेटकिन के करीबी और विश्वासपात्र लोगों में से एक रोज़ा लक्जमबर्ग थीं।

तस्वीर साभारः Marx Memorial Library

साल 1880 में जर्मनी के राजनीतिक स्थिति के कारण जेटकिन को जर्मनी छोड़ना पड़ा। इस दौरान वह स्विटजरलैंड और फ्रांस में रहीं। लगभग एक दशक बाद जर्मनी लौटने के वह ‘सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जर्मनी’ न्यूजपेपर फॉर वीमेंस की एडिटर बनीं। 1892 से 1917 तक वह इस पद पर बनी रहीं। उन्होंने जर्मनी में ‘सोशल डेमोक्रेटिक वीमंस मूवमेंट’ की स्थापना की। 1907 में वह एसपीडी के स्थापित नए दफ्तर ‘वीमेंस ऑफिस’ की प्रमुख नेता बनीं।

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महिला अधिकारों के लिए लड़ाई

जेटकिन की महिला राजनीति में बहुत गहरी रुचि थी। वह महिलाओं के लिए समान अधिकार और मताधिकार आंदोलन में बहुत सक्रिय थीं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस बनाने में भी प्रमुख योगदान दिया। 1907 में उन्होंने पहले अंतरराष्ट्रीय महिला कॉफ्रेंस में हिस्सा लिया। 1910 के अगस्त महीने में, डेनमार्क के कोपेनहेगन में ‘सोशलिस्ट सेकेंड इंटरनेशनल’ की आम बैठक से पहले एक अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस बैठक में वार्षिक ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया।

तस्वीर साभारः The Leipzig Glocal

अमेरिकी समाजवादियों के काम से प्रेरित होकर जेटकिन और अन्य लोगों ने प्रस्तावित किया कि हर साल एक विशेष महिला दिवस मनाया जाएगा। हालांकि, उस सम्मेलन में निश्चित तारीख तय नहीं की गई थी। 17 देशों की 100 महिलाओं का दल महिलाओं के लिए समान अधिकार और वोट के अधिकार के लिए बनाए इस विचार से सहमत हो गया। अगले ही वर्ष 1911 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को पहली बार ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड में मनाया गया था। जेटकिन पूंजीवादी नारीवाद की अवधारणा के खिलाफ थीं। वह मानती थीं कि यह मजदूर वर्ग की एकता को खत्म करने का एक हथियार है।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जेटकिन ने कार्ल लीब्रेख्त, रोज़ा लक्जमबर्ग, लुईस काहलर और अन्य एसपीडी के नेताओं के साथ बर्गफ्रिडेन की पार्टी की नीति को खारिज कर दिया। यह सरकार के साथ एक समझौता था कि युद्ध के दौरान किसी भी प्रकार की हड़ताल से बचेंगे। 1915, बर्लिन में जेटकिन ने युद्ध विरोधी गतिविधियों में ही ‘इंटनेशनल सोशलिस्ट वीमंस एंटी वॉर कॉफ्रेंस’ का आयोजन किया। युद्ध विरोधी राय रखने के कारण उन्हें कई बार गिरफ्तार भी किया गया। 1916 में उन्हें प्रोटेक्टिव कस्टडी में ले लिया गया हालांकि बीमारी के कारण उन्हें छोड़ भी दिया गया।

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काम और उपलब्धियां

साल 1916 जेटकिन स्पार्टासिस्ट लीग और इंडिपेंटडेंट सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी, जर्मनी की सह-संस्थापक बनीं। जनवरी 1919 में, गत वर्ष नवंबर में जर्मन क्रांति के बाद, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ जर्मनी की स्थापना के बाद जेटकिन उससे जुड़ी। 1920 से 1933 तक रैहस्टैग में उन्होंने पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। 1920 में महिलाओं के सवाल पर लेनिन का इंटरव्यू किया। 1924 तक वह कम्यूनिस्ट पार्टी के केंद्रीय दफ्तर की सदस्य रहीं। 1927 से 1929 तक वह पार्टी की केंद्रीय कमेटी की सदस्य रही।

मृत्यु के बाद 1949 में क्लारा जेटकिन जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में एक बहुत प्रसिद्ध नायिका बनीं। वहां हर बड़े शहर में उनके नाम पर एक सड़क का नाम रखा गया। यहीं नहीं रूस में भी एक प्रमुख सड़क उनके नाम पर हैं।

1921 से 1933 तक दस साल वह कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कार्यकारी समिति की भी सदस्य रहीं।  1925 में वह जर्मन वामपंथी संगठन ‘रोटे हिल्फ’ की अध्यक्ष चुनी गई। अगस्त 1932 में, वह वरिष्ठता के आधार पर रैहस्टाग की अध्यक्ष के रूप में उन्हें लोगों को संबोधन करने का मौका मिला। उन्होंने अपने भाषण में मजदूरों को फासीवाद के खिलाफ एकजुट होने का आग्रह किया। क्लारा जेटकिन को ऑर्डर ऑफ लेनिन (1932) और ऑर्डर ऑफ रेड बैनर (1927) मिला था।

एडोल्फ हिटलर और नाजी पार्टी का शासन लागू होने के बाद 1933 में रैहस्टाग आग के बाद जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। जेटकिन निर्वासन में सोवियत संघ चली गई जहां उन्होंने अंतिम सांस लीं। 1933 में, लगभग 76 वर्ष की उम्र में मॉस्को के पास, आर्कान्जेल्सकोय में उनकी मृत्यु हो गई थी। उनकी राख को क्रेमलिन वॉल नेक्रोपोलिस में रेड स्कॉयर के पास रखा गया था। उनके अंतिम दर्शन के लिए पूरे यूरोप से कम्यूनिस्ट नेता आए थे। मौत के बाद 1949 में क्लारा जेटकिन जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में एक बहुत प्रसिद्ध नायिका बनीं। वहां हर बड़े शहर में उनके नाम पर एक सड़क का नाम रखा गया। यहीं नहीं रूस में भी एक प्रमुख सड़क उनके नाम पर हैं।

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तस्वीर साभारः Wikipedia

स्रोत:

The Guardian

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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