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सोजॉर्नर ट्रुथ 19वीं शताब्दी की एक ब्लैक उन्मूलनवादी, नागरिक और महिला-अधिकार कार्यकर्ता थीं, जो खुद बचपन से दास प्रथा के अधीन अपना जीवन व्यतीत कर रही थीं। आगे चलकर अपने साहस और मनोबल के दम पर वह खुद को दास प्रथा से आज़ाद करने में सफल रहीं और इस सामाजिक कुप्रथा के खिलाफ और मानवाधिकार के लिए आवाज़ उठाई। उनका जन्म इसाबेला बॉमफ्री के नाम से साल 1797 में पिता जेम्स और मां एलिज़ाबेथ बॉमफ्री के घर हुआ जो उस वक्त न्यूयॉर्क के डच-भाषीय प्रदेश उल्स्टर काउंटी में दास प्रथा के अधीन रह रहे थे। ट्रुथ छोटी उम्र से ही दास प्रथा की क्रूरता का शिकार हुई। एक दास के रूप में जीवन बिताते हुए उन्हें कठोर शारीरिक श्रम और हिंसक दंड का सामना करना पड़ा। लगभग नौ साल की बच्ची ट्रुथ को पहली बार भेड़ के एक झुंड के साथ जॉन नेली नामक व्यक्ति को 100 डॉलर में एक नीलामी में बेच दिया गया था। चार बार खरीदी और बेची गई ट्रुथ आखिरकार जॉन ड्यूमॉन्ट और उनकी दूसरी पत्नी एलिजाबेथ के घर न्यूयॉर्क के वेस्ट पार्क में दास के रूप में रहने लगी। यह उनके जीवन का बहुत मुश्किल समय था। ड्यूमॉन्ट की पत्नी एलिजाबेथ को ट्रुथ का वहां रहना पसंद न होने के कारण उन्हें परेशान करती थी। इसी दौरान, ट्रुथ की मुलाकात पड़ोस में एक दास के रूप में रह रहे रॉबर्ट नामक व्यक्ति से हुई जिनसे वह प्रेम करने लगी। लेकिन रॉबर्ट के मालिक को उनका रिश्ता स्वीकार नहीं था।

एक दिन अपने दासों का निरीक्षण करते समय उन्होंने रॉबर्ट को ट्रुथ के साथ पाया और सजा के तौर पर उन्हें बेरहमी से पीटा गया। कुछ ही दिनों में रॉबर्ट के मरने की खबर ने ट्रुथ को अंदर तक झकझोर दिया था। सोजॉर्नर ट्रुथ ने अपने से उम्र में बड़े थॉमस नामक दूसरे दास से शादी की और पांच बच्चों की मां भी बनी। साल 1799 में न्यूयॉर्क ने दास प्रथा के उन्मूलन के लिए कानून बनाना शुरू कर दिया था पर गुलाम बनाए गए लोगों को मुक्त करने की प्रक्रिया 1827 तक भी पूरी नहीं हुई थी। हालांकि ट्रुथ के आखिरी मालिक ड्यूमॉन्ट ने न्यूयॉर्क में दास प्रथा के खिलाफ कानून बनने के एक साल पहले ही उनके ‘अच्छे काम और वफादारी’ की शर्त पर उन्हें आज़ाद करने का वादा किया। लेकिन ड्यूमॉन्ट ने न सिर्फ अपना फैसला बदल दिया बल्कि ट्रुथ के हाथ में चोट लगने के कारण उन्हें ‘कम काम करने वाली दास’ घोषित कर दिया। इस अपमान और बेबसी में खुद को गलत साबित करने के लिए ट्रुथ ने और भी अधिक शारीरिक श्रम किया। साल 1826 के अंत में परिस्थितियों से तंग आ चुकी ट्रुथ को अपनी बेटी सोफिया के साथ पास के एक उन्मूलनवादी परिवार वैन वैगनर्स के पास भागना पड़ा। वह अपने अन्य बच्चों को साथ नहीं ले जा सकी क्योंकि उनके बच्चों को कानूनी तौर पर तबतक मुक्त नहीं किया जा सकता था, जबतक कि वे बीस वर्ष तक दास बनकर गुलामी न करे। ट्रुथ वहां न्यूयॉर्क में मुक्ति अधिनियम को मंजूरी मिलने तक रही। इस बीच, उन्हें अपने पांच वर्षीय बेटे पीटर को ड्यूमॉन्ट द्वारा अवैध रूप से अलबामा के एक व्यक्ति को बेचने की खबर मिली।

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बचपन से दास रह चुकी सोजॉर्नर ट्रुथ अपने बेटे को उन अमानवीय परिस्थितियों और दंडों से बचाना चाहती थी जिन्हें वह खुद झेल चुकी थीं। इसलिए उन्होंने अपने बेटे की आज़ादी के लिए पूरी ताकत झोंक दी। वह वैन वैगनर्स की मदद से इस मुद्दे को अदालत में ले गई। साल 1828 में, महीनों की कानूनी कार्यवाही के बाद, वह अपने बेटे को मुक्त करा पाई, जिसे अपने मालिक का दुर्व्यवहार को सहना पड़ रहा था। इस घटना ने ट्रुथ को किसी श्वेत व्यक्ति के खिलाफ अदालत में मुकदमा करने और जीतने वाली पहली ब्लैक महिला बना दिया। साल 1843 ट्रुथ के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। वैन वैगनर्स का उन के धार्मिक और आध्यात्मिक सोच पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने ईसाई धर्म को अपनाया और एक रविवार अपना नाम बदलकर सोजॉर्नर ट्रुथ रख लिया। साल 1844 में ट्रुथ नॉर्थम्प्टन एसोसिएशन ऑफ एजुकेशन एंड इंडस्ट्री नामक मैसाचुसेट्स की एक उन्मूलनवादी संगठन में शामिल हुई। यह संगठन महिलाओं के अधिकारों, धार्मिक सहिष्णुता के साथ-साथ शांतिवाद का समर्थक था। ट्रुथ वहां पुरुषों और महिलाओं के कपड़े धोने के काम की देखरेख करने लगी। वहां रहते हुए, वह विलियम लॉयड गैरीसन, फ्रेडरिक डगलस और डेविड रग्गल्स जैसे प्रसिद्ध कार्यकर्ताओं से मिली। ट्रुथ ने प्रभावी रूप से एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में अपनी यात्रा की शुरुआत की। उसी वर्ष उन्होंने अपना पहला गुलामी-विरोधी भाषण भी दिया।

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पढ़ी-लिखी न होने के कारण ट्रुथ ने मुंहजबानी अपने अनुभवों को अपने मित्र ऑलिव गिल्बर्ट को बताना शुरू किया और 1850 में विलियम लॉयड गेरिसन ने उनकी पुस्तक ‘द नैरेटिव ऑफ़ सोजॉर्नर ट्रूथ: अ नॉर्दर्न स्लेव’ निजी तौर पर प्रकाशित की। इस किताब ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई। 1851 में, ट्रुथ उन्मूलनवादी और प्रवक्ता जॉर्ज थॉम्पसन के साथ एक केंद्रीय और पश्चिमी न्यूयॉर्क में व्याख्यान दौरे में शामिल हुई। इसी साल, मई में उन्होंने ओहायो के एक्रोन में महिला अधिकार सम्मेलन में भाग भी लिया। सम्मेलन में उन्होंने महिलाओं के अधिकारों पर अपना प्रसिद्ध भाषण दिया, जिसे बाद में ‘एंट आई ए वुमन’ के नाम से जाना गया। उनके भाषण ने सभी महिलाओं के साथ-साथ ब्लैक लोगों के लिए समान मानवाधिकारों की मांग की। हालांकि मौजूदा हालात में महिलाओं और अमरीका में रह रहे ब्लैक लोगों के लिए वकालत करना खतरनाक और चुनौतीपूर्ण था लेकिन इससे भी मुश्किल था उस समाज में एक ब्लैक महिला का ऐसा करना। लेकिन उनके भाषण में इस बात का न तो कोई का दबाव था और न कोई घबराहट। ट्रुथ एक सशक्त वक्ता के रूप में मंच पर नज़र आई और बखूबी अपने वक्तव्य को रखा। उनके भाषण को सुनकर श्रोता चकित थे और यह मानने में हिचक रहे थे कि ट्रुथ एक समय तक सिर्फ डच भाषा बोलने वाली साधारण अशिक्षित महिला थी। अगले 10 वर्षों में, ट्रुथ हजारों लोगों के समक्ष आई।

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साल 1851 से 1853 तक ट्रुथ ने ओहायो एंटी-स्लेवरी बग्ल के संपादक, मारियस रॉबिन्सन के साथ काम किया और राज्य में अलग-अलग मंचों के माध्यम से इस विषय पर भाषण दिए। 1853 में, उन्होंने न्यूयॉर्क शहर के ब्रॉडवे टैबरनेकल में एक भीड़ को संबोधित किया जिसमें महिलाओं के मताधिकार की बात की। गृह युद्ध के दौरान, ट्रुथ ने केंद्रीय सेना में ब्लैक सैनिकों की बहाली में मदद की। 1864 में, ट्रुथ को वॉशिंगटन डीसी के नेशनल फ्रीडमैन रिलीफ एसोसिएशन द्वारा नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने अफ्रीकी-अमरीकियों के परिस्थितियों में सुधार के लिए लगातार काम किया। उसी वर्ष अक्टूबर में, गृह युद्ध के दौरान अभूतपूर्व राहत कार्य करने के लिए उन्हें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन से मिलने का मौका भी मिला। ट्रुथ के वाशिंगटन काल के दौरान ब्लैक लोगों के साथ भेदभाव और तिरस्कार का विरोध करने के लिए उन्होंने श्वेत लोगों के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली स्ट्रीट्कार को रोका और उसपर सवारी की। साल 1867 में, ट्रुथ मिशिगन के बैटल क्रीक में अपनी दो या तीन बेटियों के साथ रहने लगी। पर ट्रुथ ने कभी भी भेदभाव के खिलाफ और महिलाओं के मताधिकार के पक्ष में बोलना और काम करना नहीं छोड़ा। सोजॉर्नर ट्रुथ ने 26 नवंबर, 1883 को अपने घर में अंतिम सांस ली। ट्रुथ हमें एक ऐसी दुनिया की रचना की सीख दे गई हैं, जहां साहस और दृढ़ निश्चय से सही के लिए और अपने अधिकारों के लिए लड़ना जरूरी है। नस्लवाद के खिलाफ लड़ाई और महिलाओं की सशक्तिकरण में सोजॉर्नर ट्रुथ का नाम सदा उल्लेखनीय रहेगा।

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 तस्वीर साभार : History.com





कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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