डिजिटल इंडिया की वे औरतें जो आज भी एक फ़ोन करने के लिए मर्दों पर आश्रित हैं!
तस्वीर साभार: Quartz
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अमिनी गाँव की रहनेवाली सत्रह वर्षीय आरती को कोरोनाकाल में अपनी पढ़ाई में काफ़ी नुक़सान हुआ, जिसकी वजह थी ऑनलाइन पढ़ाई के लिए उसके पास मोबाइल फ़ोन का न होना। हालांकि, ऐसा नहीं है कि उसके घर में मोबाइल फ़ोन नहीं है, बल्कि उसके तीनों भाई के पास अपना-अपना मोबाइल फ़ोन है। उससे छोटे भाई के पास भी अपना स्मार्टफ़ोन है। चूंकि आरती लड़की है इसलिए उसको अपना फ़ोन रखने की इजाज़त नहीं है। इन दिनों आरती एक संस्था में वालंटीयर का काम कर रही है, जिसके लिए उसे अपने गाँव से दूर दूसरे गाँव में जाना पड़ता है। ऐसे में जब उसने अपने परिवार से मोबाइल फ़ोन की मांग की तो उसके पिता ने साफ़ कहा, “जब तुम्हारी शादी हो जाएगी तो अपने ससुराल में मोबाइल चलाना।”

मुस्लिमपुर गाँव में रहनेवाली नसीमा बानो मोबाइल फ़ोन को लेकर बताती हैं, “सिलाई के काम में मेरी दिलचस्पी है और नयी-नयी चीजें बनाना मुझे पसंद है। कई बार बच्चों ने मुझे ऑनलाइन वीडियो से सिलाई से जुड़ी कई चीजें बनाना सिखाया और मैं इसकी मदद से नयी-नयी चीजें भी बनाने लगी। अब धीरे-धीरे मुझे छोटे-मोटे ऑर्डर मिलने लगे हैं और जिसके लिए मोबाइल की ज़रूरत महसूस होने लगी है। जब घर में इसके लिए बात की तो बेटों और पति ने कहा कि उम्र भर कभी मोबाइल नहीं चलाया तो अब इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।

नसीमा बानो

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रूपापुर गाँव की रहनेवाली रेणू से जब मोबाइल फ़ोन को लेकर बात की उन्होंने बताया, “मेरे घर में पहला फ़ोन मेरे पति के लिए था। कई सालों तक फ़ोन उन्हीं के पास रहता और जब भी मुझे किसी से बात करनी होती तो उनसे मांगना पड़ता। पर आज जब मैं काम करने लगी हूं तो मैंने फ़ोन लिया पर अगर इसके लिए पति पर निर्भर होती तो शायद मुझे कभी फ़ोन नहीं मिलता।”

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अब हम लाख कहे कि हमारे घर में किसी भी तरह का कोई लैंगिक भेदभाव नहीं है, पर सच्चाई यही है कि आज भी जब मोबाइल फ़ोन की बात है तो घर में पहला फ़ोन पुरुष के हाथ में दिया जाता है। गाड़ी की बात आती है तो साइकिल से लेकर मोटर साइकिल तक की पहली चाबी पुरुषों के हाथ जाती है। नौकरी और शिक्षा के अवसर की बात आती है तो पुरुषों को ही इसके लिए आगे किया जाता है।

ये तीनों महिलाएं आज के समय की है। वह समय जब हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं। ऑनलाइन क्लास, कोर्स और रोज़गार का दौर जब ज़ोरों पर है। डिजिटल इंडिया के समय की ये महिलाएं किसी को एक फ़ोन करने के लिए आज भी पूरी तरह पुरुषों पर आश्रित हैं। इस दौर में भी शहरों से चंद किलोमीटर दूर रहने वाली लड़कियों और महिलाओं के स्थिति यह है कि उन्हें आज भी मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल के लिए अपने घर के पुरुषों पर आश्रित होना पड़ता है। मोबाइल फ़ोन आज के समय की ज़रूरत है, सूचनाओं के प्रसार और जुड़ाव के लिए ये एक अच्छा माध्यम है। लेकिन जब महिलाओं को इससे दूर किया जाता है तो महिलाओं की न केवल जागरूकता बल्कि उनके जुड़ाव पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ता है।

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जब भी मैं गाँव में महिलाओं के साथ मीटिंग करने जाती हूं तो वहां मोबाइल फ़ोन का न होना महिलाओं की गतिशीलता और उनकी भागीदारी को प्रभावित करता हुआ दिखाई पड़ता है, क्योंकि महिलाओं के पास अपना कोई मोबाइल फ़ोन नहीं होता है। वे अपने पति या बेटे के मोबाइल पर आश्रित होती हैं। ऐसे में जब उन्हें मीटिंग या और भी सूचना देनी होती है तो उनके घर के पुरुषों को फ़ोन करना पड़ता है। इस सूचना को महिलाओं तक पहुंचाना ग़ैर-ज़रूरी काम होता है, जिसकी वजह से उन तक सूचना पहुंच ही नहीं पाती है।

मोबाइल फ़ोन आज के समय की ज़रूरत है, सूचनाओं के प्रसार और जुड़ाव के लिए ये एक अच्छा माध्यम है। लेकिन जब महिलाओं को इससे दूर किया जाता है तो महिलाओं की न केवल जागरूकता बल्कि उनके जुड़ाव पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ता है।

अब साफ़ है, जब महिलाओं के पास सही समय पर सूचना नहीं पहुंचती है तो उनकी भागीदारी पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। धीरे-धीरे उनका जुड़ाव भी प्रभावित होने लगता है। इतना ही नहीं, अक्सर मीटिंग में शामिल होनेवाली महिलाओं और किशोरियों के साथ जब मोबाइल फ़ोन पर चर्चा होती है तो ये सामने आता है कि उनके घर में पुरुषों के पास ही ये होता है और महिलाओं को किसी से बात करने या इंटरनेट के किसी भी काम के लिए पुरुषों पर आश्रित होना पड़ता है।

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हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जॉन एफ कैनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट के साल 2018 में हुए एक अध्ययन में भी यह पाया गया कि भारत में मोबाइल फ़ोन को लेकर लैंगिक भेदभाव का स्तर साफ़ दिखाR पड़ता है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मोबाइल फोन स्वामित्व में 33 प्रतिशत का लिंग अंतर है, जिसकी वजह से असमानता बढ़ रही है। वहीं, केनेडी स्कूल के एक शोध केंद्र, एविडेंस फॉर पॉलिसी डिजाइन की तरफ़ से किए गए अध्ययन में यह पाया गया कि मज़बूत सामाजिक मानदंड, रीति-रिवाज और व्यक्तिगत मान्यताओं ने पहले से ही फोन के स्वामित्व और संचालन के लिए आर्थिक चुनौतियों का सामना करने वाली महिलाओं के लिए और बाधाएं पैदा की हैं। 

ये आकंडें क़रीब चार साल पहले के हैं और इस बीच कोरोना महामारी के दौरान ऑनलाइन का दौर तेज़ी से तो बढ़ा। इसमें महिलाओं की भागीदारी कितनी है यह एक बड़ा सवाल है। कहने को तो भले ही हम डिजिटल इंडिया की बात कर रहे है पर इस डिजिटल इंडिया में महिलाओं का हिस्सा कितना है ये कह पाना मुश्किल है। मोबाइल फ़ोन आज के समय में सूचना का साधन है, जिसके ज़रिए एक-दूसरे जुड़ाव और काम का विकास किया जा सकता है। लेकिन जब इसे महिलाओं की पहुंच से दूर किया जाता है तो ये महिलाओं के विकास और उनकी गतिशीलता को बाधित करती है।

अब हम लाख कहे कि हमारे घर में किसी भी तरह का कोई लैंगिक भेदभाव नहीं है, पर सच्चाई यही है कि आज भी जब मोबाइल फ़ोन की बात है तो घर में पहला फ़ोन पुरुष के हाथ में दिया जाता है। गाड़ी की बात आती है तो साइकिल से लेकर मोटर साइकिल तक की पहली चाबी पुरुषों के हाथ जाती है। नौकरी और शिक्षा के अवसर की बात आती है तो पुरुषों को ही इसके लिए आगे किया जाता है। कुल मिलाकर किसी भी तरह के विकास, समाज में अपनी पहचान, जानकारी और संसाधन तक पहुंच की बात पर आज भी पुरुषों की ही प्राथमिकता है, जिसको दूर किए बिना डिजिटल इंडिया तो दूर हम लोकतांत्रिक और मौलिक अधिकारों को सुरक्षित करने वाले इंडिया तक की कल्पना नहीं कर सकते हैं।

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लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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