द स्टोनिंग ऑफ सोरया एम
तस्वीर साभार: WNG.org
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क्या आपने कभी सोचा है कि एक पति अपनी खुदगर्ज़ी में इस कदर आगे बढ़ जाता है कि वह अपनी पत्नी के किरदार पर हमला करने से पहले एक बार भी नहीं सोचता। इसी पितृसत्तात्मक सोच के इर्द-गिर्द रची गई है फिल्म ‘द स्टोनिंग ऑफ सोरया एम’ की कहानी। साल 1990 में लिखी गई फ्रांसीसी-ईरानी पत्रकार फ्रीडौने साहेबजम की किताब ‘ला फेमे लापिडी’ पर आधारित है। यह किताब ईरान में साहेबजम के निजी अनुभवों के आधार पर प्रकाशित हुई थी। उस किताब ने फिल्म ‘द स्टोनिंग ऑफ सोरया एम’ की कहानी की बुनियाद रूप में काम किया। यह किताब ईरान में महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा और बर्ताव के इर्द-गिर्द घूमती है। इस पुस्तक को अंतरराष्ट्रीय बेस्ट सेलर अवार्ड भी मिल चुका है।

फिल्म में जेम्स कैविज़ेल ने साहेबजाम की भूमिका निभाई है। शोहरेब अघदाशलू ने ज़हरा की भूमिका निभाई है, जो सोरया की चचेरी बहन होती है। मोज़ान मार्नो ने सोरया मनुचेरी का मुख्य किरदार निभाया है। नवीद नेगबान ने अली की मुख्य भूमिका निभाई है।

कहानी की शुरुआत सबसे पहले पहाड़ों में घूम रहे एक पत्रकार से शुरू होती है जिसकी गाड़ी खराब हो जाती है। वह इधर-उधर मदद के लिए टहल रहा होता है, तभी एक महिला की नज़र उस पर पड़ती है जो सोरया की चचेरी बहन होती है। महिला ने काला दुपट्टा ओढ़ा होता है और वह उस पत्रकार के पास जाती है। वह उससे पूछती है कि वह कौन है और यहां क्या कर रहा है। तब पत्रकार अपने बारे में सारी बातें उससे बताता है। महिला उसे अपने घर ले जाती है और तभी महिला उससे सोरया के साथ हुई घटना का ज़िक्र करती है जिसे सुनकर वह पत्रकार काफी हैरान रह जाता है।

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फिल्म दिखाती है कि परिवार में महिला का कोई अधिकार नहीं होता है और जब कोई पुरुष अपनी पत्नी से छुटकारा पाना चाहता है, तो यह उसके लिए कोई बड़ी मुश्किल नहीॆ होती। भ्रष्ट अधिकारियों की मदद से वह अपनी पत्नी से छुटकारा आसानी से पा लेता है। भ्रष्ट अधिकारियों की मदद से सोरया को आसानी से मौत की सज़ा दे दी जाती है।

सोरया की कहानी

यह कहानी है सोरया की जिसका पति अली एक मतलबी व्यक्ति होता है, जो हर वक्त गुस्से में रहता है। वह 14 साल की लड़की से दूसरी शादी करना चाहता है और अपनी पहली पत्नी सोरया से छुटकारा पाने के लिए और उससे शादी तोड़ने के लिए वह तरह-तरह की गलत योजनाएं बनाता रहता है। चूंकि वह दो पत्नियों को एक साथ रखने में सक्षम नहीं था और सोरया का दहेज वापस नहीं करना चाहता था इसलिए वह हमेशा सोरया के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचने की सोचता रहता है। अली को तब मौका मिलता है जब सोरया ने एक गांव के ही विधवा पुरुष के लिए खाना बनाना शुरू करती है, तभी अली के शैतानी दिमाग में अपनी पहली पत्नी से छुटकारा पाने के लिए एक मौका मिल जाता है। 

तस्वीर साभार: NYT

इसके बाद अली अपनी पत्नी सोरया पर चरित्रहीन होने का इलज़ाम लगा देता। भ्रष्ट अधिकारियों के उकसाने पर सोरया के पिता को भी उसके खिलाफ हो जाते हैं और आखिर में उसे दोषी ठहराया गया। सोरया को उस बात की सज़ा मिली जो उसने कभी किया ही नहीं था। सज़ा के तौर पर सोरया को उसकी कमर तक दफनाया गया, और उसे पत्थर मारकर मार डाला गया।

फिल्म के कुछ सीन काफी विचलित करनेवाले हैं। उदाहरण के तौर पर जब सोरया अपने बच्चों को अलविदा कहती है क्योंकि उसे मौत की सजा सुनाई गई है। अन्य बच्चे सोरया की सज़ा के लिए पत्थर इकट्ठा करते हैं, जिसमें उनका साथ गांव के सभी पुरुष दे रहे होते हैं।

यह फ़िल्म ईरान में महिलाओं के अधिकारों की स्थिति को दिखाता है। आज भी ईरान में महिलाओं की स्थिति और उनके अधिकारों की कोई बात नहीं करता है। हालांकि, फिल्म ईरानी क्रांति के वक्त को दिखाती है फिर भी फिल्म में औरतों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को बहुत कम उजागर किया गया है। फिल्म दिखाती है कि परिवार में महिलाओं का कोई अधिकार नहीं होता है और जब कोई पुरुष अपनी पत्नी से छुटकारा पाना चाहता है, तो यह उसके लिए कोई बड़ी मुश्किल नहीॆ होती। भ्रष्ट अधिकारियों की मदद से वह अपनी पत्नी से छुटकारा आसानी से पा लेता है। भ्रष्ट अधिकारियों की मदद से सोरया को आसानी से मौत की सज़ा दे दी जाती है।

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फिल्म के कुछ सीन काफी विचलित करनेवाले हैं। उदाहरण के तौर पर जब सोरया अपने बच्चों को अलविदा कहती है क्योंकि उसे मौत की सजा सुनाई गई है। अन्य बच्चे सोरया की सज़ा के लिए पत्थर इकट्ठा करते हैं, जिसमें उनका साथ गांव के सभी पुरुष दे रहे होते हैं। उसे सफेद कपड़ों में तैयार कर एक यात्रा निकाली जाती है। यात्रा उस जगह समाप्त होगी जहां उसे कमर के नीचे से दबाकर पत्थर मारा जाना होता है। यह सीन काफी भावनात्मक होता है और फिर वास्तविक पत्थरबाजी, ये सीन इतने भयानक हैं कि इसे देखना लगभग असहनीय है। सोरया अपनी कमर तक ज़मीन में दबी होती है और उसकी आंखों में आंसू भरे होते हैं। पहला पत्थर उसके पिता द्वारा चलवाया जाता है, उसके बच्चों से भी पत्थर मरवाए जाते हैं, उसका पति भी उसे पत्थर मारता है, उसके माथे से उसकी सफेद पोशाक पर बहता खून…. ये सीन बेहद क्रूर हैं, लेकिन इन्हें इतने विस्तार में दिखाया जाना बेहद जरूरी है। पत्थरों से बर्बर मौत की सजा, जो अभी भी कई देशों में होती है इसका इस दुनिया में होना ही एक क्रूर सच है।

फिल्म-तकनीकी स्तर पर, बेहद काबिले-तारीफ है। फिल्म को ऐसे सेट किया गया है वह बिल्कुल वास्तविक लगती है। देखनेवालों को यह नहीं लगेगा कि वे फिल्म देख रहे हैं। ऐसा महसूस होगा कि असल में सारे सीन उनकी आंखों के सामने चल रहे हैं। फिल्म की संरचना अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है। आपको फिल्म देखने में कहीं-कहीं ऐसा महसूस होगा कि यह एक अमेरिकी फिल्म है। यह इस फिल्म की एक कमी है।

ऑस्कर-नामांकित अभिनेत्री शोहरेब अघदाशलू इस फिल्म की जान हैं और एक्टिंग के ऐसे स्तर को हासिल करती हैं जिसे हम शब्दों में बयान नहीं कर सकते। नविद नेगबान ने भी अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से निभाया है। ‘स्टोनिंग ऑफ सोराया एम’ एक बेहद मुश्किल फिल्म है जो कोई रियायत नहीं देती है और आपकी भावनाओं पर एक हथौडे़ जैसा काम करती है।  क्या आप खुली आंखों से फिल्म के सभी दृश्यों को देख सकते हैं यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है। 

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तस्वीर साभार: WNG.org

मेरा नाम तलत परवीन है. मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. बोलने में थोड़ी सी हिचकिचाहट है लेकिन लिखने में पूरा जज़्बा है, अपनी बात बोलकर कम, लिखकर ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का हुनर है। खाने-पीने का तो वैसे ही शौक रखते हैं लेकिन घुमक्कड़ी में भी मज़ा आता है.

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